Thursday, 16 October 2025

हेमिंग्वे का बिल्लियों वाला घर!

 हेमिंग्वे के जन्मस्थान इलिनॉय जब जाना हुआ तब मालूम  हुआ की   उनका एक घर फ्लोरिडा में भी है जहाँ उन्होंने कई महत्वपूर्ण किताबें लिखीं। तब बहुत अफ़सोस हुआ की ओह! फ़्लोरिडा जा कर भी वहाँ तक नहीं पहुचीं। यहाँ तक पहुँचने में क़रीब पाँच साल बीत गए…  सबसे शुरुआती बार, साल 2014 मैं इनके इस घर के दूसरे मोड़ से गुज़र चुकी थी पर तब मालूम नहीं था की कोई हेमिंग्वे यहाँ रहते थें। जब तक इन्हें पढ़ा फ़्लोरिडा दूर थी।

हेमिंग्वे जब फ्लोरिडा आए तो रहने के लिए उन्होंने की वेस्ट को चुना। समंदर से थोड़ी दूर, लम्बें पेड़ों और खूब सारी बिल्लियों से घिरा यह घर बहुत सुंदर है। तीन तरफ़ से बड़े शीशे की बनी खिड़कियों के बीच इनका बाथरूम मुझे बहुत पसंद आया। मानों गुनगुने बाथटब में लेटे, आसमान को निहारते कितने किस्से बुने जा रहे होंगे। 

हालाँकि मुझे इस घर में एक चीज खटकी, यहाँ संगीत का कोई स्थान ना। वहीं जन्मस्थान पर सुंदर सा एक पियानों रखा था। शायद समय के साथ रुचि बदल गई हो। वैसे, यहाँ सिनेमा की खूब बातें थीं। कई वाल पर हीरो-हीरोइन के साथ इनकी तस्वीरें फ्रेम थीं। 

इनके इस घर में लिखने के लिए एक अगल से दूसरा कॉटेज भी है। जहाँ सिर्फ़ लिखने के कुछ सामान और एक टेबल चेयर था। 

घर के आलवा आस-पास ठीक-ठाक जगह है तो अब इसमें एक बुक स्टोर खुल गया है। एक जगह को सजा कर प्राइवेट इवेंट के नाम कर दिया गया है। यहाँ कहीं भी शादी करने का खूब चलन है। साथ ही बिल्लियों की एक छोटी सी सिमेट्री भी जिसपर से गुजरने के बाद मुझे आख़िरी पत्थर पर गुदा,” कैट सिमेट्री” दिखा। अफ़सोस के साथ मैंने दिवंगत बिल्लियों की आत्मा से माफ़ी माँगी। 

हेमिंग्वे अब रहे नहीं। लोग आते हैं उन्हें यहाँ ढूँढने… हर तरह के लोग। 

चलते-चलते यह बता दूँ की अब यह घर एक म्यूजियम है। टिकट का दाम 19 डॉलर है। साथ ही यह स्ट्रॉलर या व्हीलचेयर फ्रेंडली नहीं हैं। हाँ, अगर बिल्लियों से एलर्जी है तो बिल्कुल मत जाए। 

Thursday, 6 March 2025

 

छह मार्च को “गेब्रियल गार्सिया मार्ख़ेज” का जन्मदिन है। इस नोबेल प्राइज विजेता लेखक को मैंने पहली बार कॉलेज के दिनों में जाना। हुआ यूँ कि कॉलेज की मेरी प्रिय दोस्त और इनका जन्मदिन एक ही तारीख़ को पड़ता है। और मेरी प्रिय दोस्त इस बात को बड़ा इठला कर उन दिनों सबको बताती। उन दिनों आधे दोस्तों को तो उसी ने बताया होगा इस स्पैनिश लेखक के बारे में। वैसे कमाल की बात यह रही कि उसने फ़्रेंच भाषा में डिप्लोमा किया था पर जाने कहाँ से उसे उस वक़्त स्पैनिश मार्खेस के बारे में मालूम था। 


मैं तो बिहार के सिवान ज़िले एक ब्लॉक बसंतपुर से गई थी, पुणे पढ़ने। मैंने तो सिर्फ़ प्रेमचंद, रेणु, हजारी प्रसाद द्विवेदी, सुभद्रा कुमारी चौहान, महादेवी वर्मा, अमृता प्रीतम आदि की कुछ किताबें या कहानियाँ पढ़ रखी थी। हाँ, अंग्रेज़ी में भी कुछ कहानियाँ सिर्फ़, “रस्कीन बॉण्ड” की पढ़ रखी थी। पर उपन्यास तब कोई नहीं पढ़ी थी। ऐसे में मार्ख़ेस को पढ़ते हुए मैं बहुत चकित होती कि दुनिया में कोई ऐसा भी देश है भारत के अलावा जहाँ भूत-प्रेत में विश्वास है। 

ख़ैर धीरज की कमी और पात्रों के नाम ने तब किताब पूरी नहीं होने दी और किताब दोस्त को वापस कर दी गई। 

अमेरिका आने के बाद जब लाइब्रेरी में कुछ दिनों काम किया तब इस किताब की देख कर फिर से पढ़ने की इक्षा जागृत हुई। किताब घर ले आयी पर इस बार भी इतनी बोझिल -पेचीदा और पात्रों के नाम की मिलावट ने इसे पूरा ना होने दिया और किताब लौटना का दिन आ गया।

एक दिन प्रिंस्टन यूनिवर्सिटी गई तो वहाँ इस किताब पर कोई चर्चा होने वाली थी, ऐसा बैनर लगा था नोटिस बोर्ड पर। फिर एक बार इस किताब का भूत चढ़ा मुझ पर। इस बार मैंने सोचा की किताब खरीद ही ली जाए और आराम-आराम से पढ़ी जाए बिना लौटने की तारीख़ को ध्यान में रखते हुए। 

किताब मैंने पहली बार “थ्रेफ्ट बुकस” से ली। यानि सेकेंड हैंड किताबों की ऑनलाइन दुकान। इस स्टोर के बारे में लाइब्रेरी में काम करने वाली एक लड़की से ही मालूम हुआ। अच्छी बात यह हुई कि जहाँ किताब स्टोर या अमेजन पर $ 15-25 के बीच मिल रही थी, थ्रेफ्ट बुक्स से $4.99 में मिल गई। थ्रेफ्ट बुक्स ने सबसे पुरानी एडिशन मुझे भेजा था। किताब से अजीब सी ख़ुशबू आ रही थी, पन्ने भी ज़र्द पीले। कवर का कोना मानों सात समुंदर लांघ आया हो… मुझे ऐसा लग रहा था कि जादू की दुनिया की यह किताब, सच में सौ साल पुरानी तो नहीं… रिश्तों की उलझ से यह क़रीब तार-तार सी ही दिख रही थी। मन उचट रहा था इसे देख कर ही। 

कई बार होता है ना, कुछ चीजें बहुत इम्तेहान लेती हैं। उसी इम्तेहान और शुरुआती कुछ ऊह-पोह के बाद किताब पटरी पर आ गई और फिर 383 पन्नों की एक जादुई किताब पूरी हुई।

वन हंड्रेड ईयर्स ऑफ़ सॉलिट्यूड” नामक यह किताब आपकी धर्य की परीक्षा लेती है। पर एक बार आप पास हुए तो इसके जादू से बंध जाते हैं। 

Thursday, 27 February 2025

पातालेश्वर शिव मंदिर

जंगली महाराज रोड यानी “जे एम रोड” पुणे के व्यस्तम इलाके में से एक है। लोगों की चहल-पहल से सजी यह सड़क नाम है, रंग-बिरंगे दुकानों का, स्वादिष्ट भोजनों का, बालगंधर्व रंगमंदिर का, संभाजी पार्क का और जंगली महाराज मंदिर का। 

इन सब से इतर यह नाम है, “पातालेश्वर मंदिर” का। कमाल की जगह है यह। एक बार को यक़ीन नहीं होता कि शहर के व्यस्ततम इलाक़े के बीच इतना सुकून भरा है।  

महादेव का यह मंदिर इस भीड़भाड़ वाले इलाक़े में होते हुए भी सुकून से भरा है। बरगद के पेड़ों की आड़ में, ज़मीन के गर्भ में बैठा यह अद्भुत मंदिर है। जंगली महाराज मंदिर से ठीक सटे पीछे की तरफ स्थित यह मंदिर एक बार को लगता ही नहीं की जे एम रोड़ में है। इतनी शांति, इतना सुकून की मन बस आने को ही ना करे। 

यह मंदिर ज़मीन के नीचे है शायद इसलिए इसे पातालेश्वर मंदिर कहा गया।

16 स्तंभों पर खड़ा यह मंडप सिर्फ़ एक पत्थर को काट कर बना, अनोखे शिल्प का उदाहरण देता है। कहते हैं कि इसका निर्माण पांडवों ने किया है। मगर इतिहासकारों का मत है कि 8वीं शताब्दी के आसपास इसे राष्ट्रकूट वंश के राजाओं ने बनवाया है। 
आर्केओलॉजी के विशेषग्यों के अनुसार यह  मंदिर क़रीब 400 साल से भी ज़्यादा पुरानी है और सन् 1977 में यह खुदाई के दौरान मिली।

इस मंदिर के पुजारी के अनुसार इसे, “पशुपथ संप्रदाय” के लोगों ने बनाया है। क्योंकि गुफाओं में शिवालय बनाने की शुरुआत इसी संप्रदाय ने शुरू की थी। उन्होंने यह भी बताया कि इसकी संरचना अजंता- एलोरा- एलिफेंटा की गुफाओं से मिलती-जुलती है।

इतनी जानकारी पा कर मन शांत नहीं होता। थोड़ा और पढ़ने पर, ढूँढने पर मालूम होता है कि पांडव तो हिमालय के गाँवों तक छाए हुए हैं। सोचती हूँ, कहाँ कुरुक्षेत्र, कहाँ काम्यकवन, कहाँ महाराष्ट कहाँ हिमालय… यही होता है जब आदमी ना घर का ना घाट का। 
वैसे भी उन्हें वनवास में जीना था और करने को था क्या ? घूमते रहे, रुकते रहे, छिपते रहे, मंदिर बनाते रहें और राजस्थान से महाराष्ट्र पहुँच गए। महाराष्ट्र में उनकी बनायी कई मंदिरें हैं। 

पतालेश्वर मंदिर में एक संग्रहालय भी है। इसे गिनीज बुक ऑफ रिकॉर्ड्स में स्थान भी मिला है। ऐसा पुजारी ने ही बताया था। हम कुछ देरी से पहुँचे थें। तब तक संग्रहालय बंद हो गया था। और अफ़सोस के साथ, हम इसका मुख्य आकर्षण वह चावल नहीं देख पाए जिस पर लगभग 5000 अक्षर अंकित हैं। 

इस मंदिर के पुजारी मिलनसार और समझदार है। समय लगभग हो जाने पर भी किसी को भगाते नहीं आराम से बाहर जाने को कहते हैं। 
मंदिर सुबह 8.00 बजे से शाम 5.30 बजे तक खुला रहता है। आम मंदिरों की तुलना में यहाँ भीड़ बहुत कम देखने को मिली। इसका कारण बहुत कम लोगों का इसे जानना भी हो सकता है। मैं ख़ुद सालों पुणे रह कर भी इसे कहाँ जान पायी थी ?  वह तो माँ और उसके भोलेनाथ…  

भारत यात्रा के दौरान मैं “त्र्यंबकेश्वर और घुश्मेश्वर/ घृष्णेश्वर ज्योतिर्लिंग” के दर्शन को भी गई। लेकिन जो सुकून यहाँ मिला वह इनसब में नहीं पाया। 



Friday, 26 January 2024

राम !

“राम निरंजन न्यारा रे, अंजन सकल पसारा रेऽऽऽ … आहा, राम निरंजन…”

अमीन चाचा झूम-झूम कर गा रहे थे। आस-पास खड़े लोग उनका मज़ाक़ उड़ाते हुए कह रहे थे-“ ई अमीन साहेब नू, कहीं आपन नाच-गान शुरू कर देनी।”

हमारी कोलोनी रंग-बिरंगी थी। तरह-तरह के फूल-फलों, जीव-जंतु, जात-कुजात, हिंदू-मुस्लमान, सुंदर-कुरूप, बाल-गोपाल सब से लदी-फदी। सब एक साथ रहते। एक दूसरे से खूब हँसी-मज़ाक़ करते। 

अमीन चाचा, जाति से अहीर होने के बावजूद जनेव पहनते। खूब पूजा-पाठ करते। धार्मिक किताबें पढ़ते। खाने से पहले भगवान को भोग लगाते। एक भी एकादशी या कोई व्रत-उपवास नहीं छोड़ते। कई बार लोग मज़ाक़ में कह भी देते- “बे महाराज, रऊरा त बाभन होखे के चाहीं।” 

अमीन चाचा, क़िस्सों की खान और मैं उनकी चेली। जब वे इस भजन को गा कर झूम रहे थे, हम कुछ बच्चें भी अपना खेल छोड़ इस नाटक का हिस्सा हो लिए। जब उनका झूमना ख़त्म हुआ तो मैंने इसका अर्थ पूछा।  हँसते हुए वे बोले- “ जाओ-जाओ खेलों अभी प्रियंका, रात को आराम से इसका अर्थ बताऊँगा।”

हर रात खाने के बाद अमीन चाचा, 100 कदम चलते और हम कॉलोनी के बच्चों को भी चलने को कहते। इसी बीच क़िस्से-कहानी, गीत-भजन कुछ पढ़ाई की बातें,कुछ दुनिया के क़िस्से साथ चलते रहते । 

अब जिस भजन पर झूमते अमीन चाचा को देखने के लिए कॉलोनी में भीड़ लगी थी और कॉलोनी के जिस वाक्या ने उन्हें यह भजन गाने पर मज़बूर किया। वह वाक्या यह रहा , 

हुआ यूँ था कि हमारी कोलनी के एक घर की सीढ़ी टूट गई। सीढ़ी क्या, घर में घुसने को तीन-चार ईंट जोड़ी पैयदान। उनमें से दूसरे नंबर वाली सीढ़ी से सीमेंट की एक परत निकल गई। ईट साफ़ दिखाई देने लगा और साफ-साफ दिखाई देने लगा उसपे उकेरा ''राम'' नाम। उस  परिवार वालों की मुश्किल कि राम के नाम पर पैर धर के उतरे कैसे ? हालाँकि इसी पायदान पर पैर रगड़ -रगड़ वे बरसों उतरते -चढ़ते रहें थें।  तय हुआ की इन चुन्नू -मुन्नू सीढ़ियों को फान  कर घर में घुसा जाए। अब सरकारी मकान की मरम्मत अपने पैसा से कौन करवाये ? अगले साल फ़ंड आएगा तब बन ही जाएगा।

घर के लोग राम को फान -फान कर घर में घुसते रहें।  कॉलोनी के बच्चों का तो यह खेल बन गया था। बहाना ढूंढते रहते सब उस घर में प्रवेश पाने की।  

ऐसे में एक दिन उस परिवार की मालकीन का पैर इस कूद-फान के फेर में मुचक गया। तब वक़्त था की कोई छींक भी दे तो मोहल्ला उमड़ पड़ता देखने और मदद करने को। 

ऐसे में मिलने, हाल -चाल जानने वाले तबियत से इतर कुछ ईंट तो कुछ राम नाम का भेद मिटाने का उपाय भी बताते जातें। कुछ लोगों ने कहा- “अरे महाराज,  तबतक ईंटे को मिट्टी से लीप दीजिए।” 

कुछ ने कहा- “यह ईंटा ही उखड़वा डिज़ाइये और सब बराबर कर दीजिए।” 

कुछ ने कहा- “भगवान के नाम पर पैर रख के उतरते थे, ऐसा तो होना हो था।”

किसी ने कहा- “कोई बात, भगवान कहाँ नहीं, फिर कितना ईंटा निकलवाइयेगा ? यह सब वहम है, विश्वास रखिए।”  

किसी ने कहा- “अब तक तो पैर रख कर उतर ही रहे थे, क्या अहित हुआ ? भगवान सब माफ़ कर देते हैं। ज़्यादा सोचिए मत।”

 यही सब हो-हल्ला को सुनकर अमीन चाचा अपने रौ में बह निकले। एक क़िस्सा सबको सुनाया और कबीर का यह भजन झूम-झूम कर गाने लगे थे। 

उनका क़िस्सा यह था-  अपने काम के सिलसिले में, नहर की नापी-जोखी में उसके किनारे की कच्ची सड़क की नापी कर रहे थे। नहर के किनारे नेटूआ(एक अति पिछड़ा समुदाय ) सब झोपड़ी बना लिया था। ईंटाकरण पर ही बकरी-बासन सब होता था उनका। एक औरत उसी सड़क पर गोबर के उपले पाथ रही थी। अमीन साहब ने देखा तो हँसते हुए कहा- “का हो, गणेश जी के माथे गोबर पाथ देलू …” उस ईंटाकरण वाली सड़क के ईट पर गणेश गुदा था। उस भोली महिला ने कहा-“ का करीं साहेब, इहे भगवान के मर्जी त हमार का दोष ?”

ख़ैर, रात के भोजन के बाद टहलते हुए उन्होंने भजन का अर्थ बताया- “प्रियंका, कबीर साहब कहते हैं- “ यह समस्त संसार माया का ही पसारा है। माया रहित राम सारे जगत से परे, भिन्न है।” 

राम के नाम पर लात रखने से पाप लग जायेगा बताओ ? और राम को उखाड़ फेकने पर या उसपर सीमेंट पोतने से पाप नहीं लगेगा ? बच्चा, राम कहाँ नहीं ? सब मन का माया है… माया!” 

बीते दिनों मैंने इतना राम का नाम सुना जितना कभी नहीं सुना होगा। मुझे अमीन चाचा याद आये, याद आए कुमार गंधर्व, कबीर, कौशल्या के राम, माणिक वर्मा और शर्मा बंधु के गाए भजन। 

अब देखिये ना,  कहाँ मैं आपसे अपने जीवन का एक क़िस्सा साझा कर रही थी और इसी भजन की अगली लाइन ध्यान में आती, 

“ अंजन विद्या, पाठ-पुराण, अंजन घोकतकत हि ग्यान रे!” 

अर्थात्मा- “माया ही विद्या, पाठ और पुराण है।  यह व्यर्थ का वाचिक ज्ञान भी माया ही है।” 

और इसी माया और व्यर्थ का वाचिक ज्ञान के मोह में फँसी तपस्या एक दिन एक आइलैंड पर पहुँच जाती है। जहाँ उसे किसी देवी-देवता की उम्मीद ना थी। वहाँ उसे राम-सीता की मूर्ति दिखती है। यह अचरज से भरा अनुभव था। 

नोट- मैक्निक आइलैंड अमेरिका के सबसे खूबसूरत स्थानों में से एक है। एक ऐसी जगह जहाँ पेट्रोल-गैस से चलने वाला कोई वाहन नहीं। कोई भी दूरी आपको, पैदल, साइकिल या घोड़े गाड़ी से तय करनी होती है। अमेरिका के इस हिस्से में किसी दुकान पर राम की मूर्ति बिकना सच में माया ही था।  

Thursday, 16 November 2023

मालिनी राजूरकर !

6 सितंबर 2023 को कृष्णाअष्टमी थी। कृष्ण भजन के साथ जाने कब ऑटो प्ले से, “ होली खेलने को चले कन्हाई…” बजने लगा। मेरे साथी ने टोका भी,  “आज होली नहीं, जन्माष्टमी है तपस्या।”

मुस्कुरा कर मैंने कहा- “कुछ भी है, कृष्ण तो हैं।”

राग देश में ‘मालिनी राजूरकर’ जी की आवाज़ में मेरे घर में गूंज रही थी…और इधर मुझ अनजान को यह ख़बर तक ना थी कि आज ही मालिनी जी इस दुनिया को विदा कर गई…

शायद उन्हें मालूम हो कि झट से किसी की मौत पर तपस्या कुछ व्यक्त नहीं कर पाती चाहे वह कितना भी प्रिय हो। मुझे इस दुःख- दुविधा से बचाने के लिए चुपचाप दुनिया को विदा कर देना है…

सादगी और कला को समर्पित एक बेहद उम्दा कलाकार जाते-जाते अपनी स्वर की कृति हम नादानों के लिए छोड़ गई और साथ ही दान कर गई अपना शरीर हैदराबाद के उस्मानिया मेडिकल कॉलेज को। 

मैंने कई बार इनके बारे में लिखा है और हर बार मुझे भारत सरकार से इस बात की नाराज़गी रही की उन्हें कोई सम्मान भारत सरकार की तरफ़ से नहीं मिला जबकि उनके स्तर के कलाकार कम ही होते हैं। 

सरकार की क्या ही दुहाई दूँ, मैं ख़ुद इनके प्रति कहाँ पूरी तरह सुध में  थी…जब मन किया इन्हें सुन लिया, मिलने की आस लगा रखी पर कभी कोई प्रयास ही नहीं किया मिलने का… इतनी बेख़बर या बुरी हूँ कि मुझे इनकी मृत्यु की जानकारी 3 महीने बाद मिली…

 जबकि यह वह मालिनी राजूरकर रही, जिनकी संगीत की लिस्ट मेरी हिंदुस्तानी संगीत की प्ले लिस्ट में सबसे ऊपर है। ऐसा कभी नहीं होता जो महीने-दो महीने में मैं इन्हें ना सुन लूँ। हद तो यह कि मैंने दुर्गा पूजा के नव दिनों में भी इनकी गायी, “दुर्गा माता दयानी देवी” सुनी और तब भी यह ख़बर ना मिली। 

 बेख़बर, बेसुध, मैं दिवाली की सफ़ाई के साथ सुन रही थी, “ अब तो कहूँ ना जा रे, ये पिया मोरा…” और इसी के साथ याद आया सुनने को , “ काहे अब तुम आए हो मेरे द्वारे…” 

यु ट्यूब कई बार प्ले लिस्ट से गानो को जाने क्यों हटा देता है और खीजती मैं, सर्च करने लगे मालिनी राजूरकर , राग केदार। मुझे तभी यह ख़बर दिखी और मैं चौंक गई… तीन महीनें बीत गए … 

ग्लानि इतनी की शब्दों में बता नहीं सकती… आँखें नम थी और मैं यूँ ही जाने क्या-क्या सोचने लगी सब काम छोड़ कर… 

शायद इसे ही कहते है, कोई तुम्हारे बीच से चुपचाप उठ कर चला गया और तुम्हें ख़बर भी नहीं हुई… 

कैसी प्रेमी रही तुम तपस्या…

मुझे माफ़ कर दें, मालिनी राजूरकर जी। 

मुझे विश्वास है आप दूसरी दुनिया में भी अपनी सादगी और संगीत को समर्पित होंगी। गन्धर्वों के बीच होकर भी किसी कोने में अपने टप्पा से सबको मोहित कर रही होंगी। गा रही होंगी मुझे देख कर  अपनी प्यारी सी हँसी के साथ, 

“ऐसा तो मोरा सइयाँ निपट अनाड़ी भये”

Tuesday, 11 April 2023

एक खूबसूरत शहर “टूसोन” 

टूसोन,  एरिज़ोना राज्य का एक खूबसूरत शहर है। पहाड़ों के बीच बसा यह शहर मुझे कुछ-कुछ कोलोराडो, डेनवर की याद दिला रहा था। दोनों के बीच मुख्य अंतर मौसम और आर्किटेट का है। टूसोन गरम जगह है और डेनवर का मौसम अधिकतर ठंढा रहता है। हाँ डेनवर में हरियाली और कई छोटी-बड़ी नदियाँ दिख जायेंगी वहीं टूसोन मरूभूमि पर बसा है। टूसोन में स्पेनिश कल्चर का बड़ा प्रभाव दिखता है और डेनवर अमेरिका के आम शहर सा दिखता है।

टूसोन के रंग-बिरंगे घर, उन्में भी ज़्यादातर पीला-नारंगी मुझे अपनी ओर खींच रहे थे। मुझे इन रंगो से खास लगाव है। मेरा बचपन इन्हीं रंगों की कालोनी में बड़ा हुआ। 

यहाँ के म्यूज़ियम, चर्च,  दुकानें और घर , खूबसूरत स्पैनिश कॉलोनियल आर्किटेक्चर का बेहतरीन नमूना है। 

डाउनटॉउन थोड़ा तंग लगा मुझे पर बहुत ही खूबसूरत। तंग लगने का कारण जहाँ -तहाँ रोड बनने के लिए बैरिकेट। एक बार तो हमे समझ ही नही आया और गलत लेन में घुस गए। वह तो ग़नीमत रही कि उधर से कोई गाड़ी नही आ रही थी। गलत साइड से आगे बढ़ने के सिवा कोई चारा ना था। पीछे गाड़ी जा नही सकती थी। भगवान की कृपा रही की कोई गाड़ी नही आ रही थी। थोड़ी दूर पर हमें एक कट दिखा जो एक दुकान की तरफ़ जाता था। हम उधर ही मुड गए। गलत लेन में होने से थोड़ी घबराहट तो हो ही रही थी पर डर तब लगा जब बगल से एक पुलिस वाला गुजरा। हमे लगा कि अब तो पका फ़ाइन लगेगा पर वह आगे बढ़ गया। शायद रोड कंस्ट्रक्शन की  वजह से लोगों से यह भूल हो जा रही होगी, यह वह पुलिस वाला जानता होगा। 

ख़ैर, हम उस दुकान के आगे थोड़ी देर रुके। फिर जहाँ जाना था उसका मैप फिर से देखने लगे। स्पेनिश नाम होने की वजह से ऐड्रेस  ठीक से मिल नही रहा था। 

थोड़ी देर बाद, जी पी एस, “पीमा काउंटी कोर्टहाउस” दो मिनट की दूरी पर दिखा रहा था। हम चल पड़े… फिर पार्किंग और रोड की जाल में उलझ कर झल्ला उठे।

 मैंने उदास हो कर कहा- “ रहने दीजिए। चलते हैं, ऑल्ड टूसोन”

“अरे रुको भी , जब यहाँ तक आ गए हैं तो देख ही लो” कहते हुए साथी ने एक जगह कार पार्क की और कहा- “ गाड़ी वापस उस घनचक्कर में ले जाने की हिम्मत नही, तपस्या। तुम भाग कर जाओ, वह रहा पीमा। दो मिनट का वॉकिंग डिस्टेंस है।”

“अरे चलिए ना आप भी, जल्दी आ जाएँगे।” 

“नही, मैं गाड़ी में ही हूँ। यह पार्किंग आम पब्लिक की नही लग रही है। गाड़ी कहीं टो ना हो जाए। वैसे भी मुझे कॉर्ट हाउस में कोई रुचि नही।”  

रुचि तो मुझे भी नही पर इसकी बनावट देखनी थी। इसके ठीक पीछे का खूबसूरत बाग , ‘एल पर्सिडियो’ देखना था। इससे वॉकिंग डिस्टेंस पर स्थित आर्ट म्यूज़ियम देखना था। पर मैंने सिर्फ़ पीमा और एल पर्सिडियो देखा। वह भी भाग-भाग कर। मुझे साथी को अकेले छोड़ आने का मलाल हो रहा था। 

इसके बाद हम निकल पड़े, ‘ओल्ड टूसोन’ की तरफ़। यहाँ हमें देखना था एक थियेटर, ‘टीकेट्रो कारमेन’  एक ऐसा थियेटर जिसका बरसों का इतिहास रहा और सैकड़ों नाटक हुए यहाँ पर आज यह बंद है। बंद दरवाज़े की कुछ तस्वीर ली। आसपास थोड़ा पैदल-पैदल घूमे और चल पड़े , “मिशन सन ज़ेवियर डेल आइक” चर्च की तरफ़। 

मिशन सन ज़ेवियर डेल आइक, चर्च यहाँ से क़रीब बीस मिनट की दूरी पर है। हल्का पीला-सफ़ेद और ईंट के रंग से गढ़ा यह खूबसूरत भवन, बार- बार मेरी आँखों की चमक के साथ होठों के कोने को बड़ा करते जा रहा था।  खूबसूरती आँखों में भरती मैं आगे बढ़ रही थी कि तभी इसके एक गेट के पार एक कैक्ट्स दिखा। अकेला कैक्ट्स गेट के पार मानो मुक्त भाव से खड़ा था। थोड़ी देर मैं रुकी रही कि आगे चलने का वक्त हो आया। 

अंतिम ठिकाने पर हमें चार बजे से पहले पहुँचना था। अलरेडी ढाई बज गए थे और वह जगह यहाँ से क़रीब एक घंटे की दूरी पर था। जगह थी, एक आर्ट गैलरी। 

यहाँ के प्रसिद्ध आर्टिस्ट , “डी ग्रेजिया” की यह आर्ट गैलरी है। इसका नाम “गैलरी इन द सन म्यूज़ियम” है। सामने पहाड़ और उसके पीछे यह गैलरी उफ़्फ क्या सुंदर नजारा था … 

मन कह रहा था, टूसोन में मुझे एक और दिन मिलना चाहिए था पर लौटने की तारीख़ तय थी। 

इस शहर की कुछ तस्वीरें, 

पीमा कॉर्टहाउस 
पार्क 

थियेटर ,
चर्च 




जैमिनी रॉय !

अमेरिका में रहने के हिसाब से हम भारतीय डाउंटाउन को कम ही प्रीफ़र करते हैं। इसका पहला कारण महँगें घर और दूसरा सुरक्षा। वैसे इसका एक तीसरा कारण यह भी है कि भारतीय किराना दुकान, मंदिर आदि जगहें भी डाउनटाउन से कई शहरों में दूर पड़ती हैं। पर इन सबके बावजूद अपने भारत जैसी चहल-पहल आपको डाउनटाउन में ही ज़्यादा दिखेगी। अगर कोई भारतीय यहाँ पहली बार आया और अपटाउन में रहने को मिल गया उसे तो उसे लगेगा यह किस सुनसान शहर में आ गया। 

ऐसे में मुझे एक बार डाउनटाउन में रहने का मौक़ा मिला। जगह थी, स्टैमफ़ोर्ड, कनेक्टिकट। पहली बार मैं किसी नव मंजिलें बिल्डिंग में यहाँ रह रही थी। नीचे उतरते ही बाज़ार, चमक-धमक। वॉकिंग- जॉगिंग करते लोग और ऐसे में दिल्ली की याद कि हाँ, यह जगह कुछ-कुछ हमारे भारत सा है। रोज़मर्रा के जीवन में रौनक़ है।

हम घूमते-फिरते कई बार मुख्य बाज़ार के गोलंबर तक पहुँच जाते। यहाँ शाम को खूब चहल-पहल होती। एक छोटा सा पार्क उससे घिरे कई खाने-पीने की दुकानें। खुले में फूलों की डाली से सजी कुर्सियाँ और उनके ऊपर झिलमिल रौशनी की छत जिससे आसमान झांकता, मुझे यह सब बड़ा सुंदर लगता। मैं वही पार्क के बीच किसी बेंच पर बैठ जाती।

पार्क के आस-पास कई छोटी-छोटी दुकानें हैं। इसके ठीक सामने एक सिनेमाघर है। कुछ दुकानों की दूरी पर ही एक खूबसूरत पुस्तकालय। उसके बग़ल में बैंक और कोने में एक चर्च। वैसे कनेक्टिकट के छोटे से डाउनटाउन में तीन-चार खूबसूरत छोटे-छोटे चर्च हैं। 

एक शाम यूँ ही घूमते हुए मुझे कुछ पेंटिंगस दिखी, बैंक और पुस्तकालय के बीच। 



कनेक्टिकट डाऊनटाउन में कुछ -कुछ जगहों पर लोहे की पत्तर जैसा बॉक्स बना हुआ है। हर कुछ महीनों में लोकल या इंटरनेशनल आर्टिस्ट यहाँ अपनी कला का नमूना लगाते रहते हैं। 



हाँ, तो उन पेंटिंग को देख कर मैं चहक पड़ी, “अरे! यह तो किसी भारतीय की कला लग रही है।” पेंटिंग देख इतना तो मालूम हो गया की मधुबनी आर्ट है पर कलाकार का नाम नही मालूम था मुझे। मैं इन पेंटिंग को देख कर बहुत ख़ुश थी। इनकी तस्वीरें ली और घर आकर गूगल की मदद से ऑर्टिस्ट का नाम पता करने लगी। 



कुछ देर बाद ली गई तस्वीर से मिलती-जुलती कुछ तस्वीरें गूगल पर मिली तब जा कर मालूम हुआ कि ये पेंटिंग , “जैमिनी रॉय” की है। उस दिन मैंने इन्हें पहली बार जाना। 

अप्रैल में इनका जन्मदिन बिता है यह आज मुझे यह ध्यान आया। जन्मदिन बीत गया तो क्या ? क्या कभी किसी कलाकार की कला बीतती है …





Friday, 7 April 2023

जन्मशताब्दी, कुमार गंधर्व !

 


आज से कुमार गंधर्व की जन्मशताब्दी वर्ष शुरू होने जा रही है।   “शिवपुत्र सिद्धरामैया कोमकाली” जिन्हें बचपन में उनकी गायन के लिए कुमार गंधर्व की उपाधि मिली और फिर वे समय के साथ “पंडित कुमार गंधर्व” हो गए। 

समय ने करवट ली और क्षय रोग से पीड़ित यह गंधर्व छह वर्ष तक गा नही पाए। पर जब किसी चीज में आत्मा बसती है ना ना तो वह लौट कर किसी भी रूप में आपके पास आती हीं है। इन्होंने ने अपनी एक नयी गायन शैली बना ली। 

कबीर का चिंतन और पंडित कुमार गंधर्व की गंभीर आवाज एक अलग ही आध्यात्म की अनुभूति। एक ऐसी दुनिया जहाँ से आप वापस आना ना चाहो। कबीर जहाँ स्वतंत्र चिंतक रहें वही दूसरी ओर पंडित जी बिना किसी घराने के बंधक। क्या अलौकिक मिलाप हुआ इनका… 

मैंने इन्हें पहली बार कब सुना उसका क़िस्सा बताती हूँ। 

पुणे की सुबह थी। मैं और मेरी दोस्त कैफेटेरिया में नस्ता कर रहे थें। रेडियो पर एक गीत बज रहा था और प्रशंसा(मेरी दोस्त) भावुक हो रही थी। यार तपस्या, इस गीत से बचपन की कितनी यादें जुड़ी हैं। हमारी सोसाइटी में एक आजोबा(दादा) थें। वे रोज सुबह मुहल्ले के बच्चों को दौड़, सूर्यनमस्कार को इकट्ठा करते। इसके बाद कुछ संस्कार-ज्ञान की बातें बताते। सुबह उठने में हम आलस करते पर वह छोटे से टेप रिकॉर्ड पर यही गीत बजाते हर बिल्डिंग के गेट पर थोड़ी देर रुकते और मम्मी जबरन हमे उठा कर नीचे भेज देती कि- हे उठ गे,  काकू, थामले आहे। 

तब मैं पुणे में नई थी। मराठी भी बहुत कम समझ पाती। मैंने कहा, मुझे तो कुछ समझ नही आ रहा और हँसने लगी। उसने मुझे तब इसका अर्थ बताया और कहा, यह भी शुद्ध ट्रांसलेशन नही। यह भाव भर है। इसका ट्रांसलेशन मैं ठीक से कर नही पाऊँगी हिंदी में। 

आज इस गाने को सुनकर और थोड़ा प्रशंसा को याद कर मैं अपने हिसाब से इस गीत का अर्थ पोस्ट के अंत में लगा दूँगी।वह भी भाव भर ही होगा… 

कुछ सालों बाद मैं और भाई दिल्ली में रहने लगे। तब भाई मेरा सरोद बजाना सीख रहा था। वह गीत-संगीत के कई क़िस्से बताता। बाबा अलाउद्दीन के तो जाने कितने क़िस्से… इसी बीच उसने कुमार जी के बारे में भी बताया पर उस वक़्त तो मैं किसी और दुनिया में मशगूल रहती थी। इस तरह की संगीत की ना तो समझ थी और ना ही सुनने की ईक्षा। भाई को भी कभी चिढ़ाती तो कभी लड़ती कि, क्या यह दिन भर आ -आ बजाते रहते हो ? 

धीरे -धीरे चिढ़ते -चिड़ाते,  मुझे भी मालूम नही कब "हिंदुस्तानी क्लासिकल "अच्छा लगने लगा। हालाँकि अभी भी इसमें मेरा ज्ञान काफी कम है पर मैं इसे अब घंटों सुन सकती हूँ। 

वो क्या है ना ,दावा कड़वी होती है पर असर तो करती ही है। यही हाल है हिंदुस्तानी क्लासिकल का। दिमाग और मन का टॉनिक है यह।

कुमार जी, उनके निर्गुण और गायन को आपने सुना ही होगा। मैंने भी पहले इस पर कई बार लिखा है। आज उसी मराठी गीत को साझा करती हूँ जिससे पहली बार इन्हें जाना। अपनी दोस्त को भी याद कर रहीं हूँ, जिसके साथ बहुत खूबसूरत पल गुजारे। मैं इस पल उसे कितना मिस कर रही हूँ और वह कमबख़्त जर्मनी में खर्राटे ले रही होगी। ख़ैर आप सुनिए यह मराठी गीत। और हाँ, कुमार जी का कितना सुंदर साथ दिया है वाणी जयराम जी ने। 

* गीत के भाव कुछ यूँ है, “ किसी से प्रेम का जो ऋण बंधा वह जन्मों जन्म तक चलता है। हर जन्म में हँसना, रोना, सुख-दुःख की गहरी फुसफुसाहट हो तो भी हमे उस ऋण को चुकाने, जन्म लेना हीं पड़ता है। वह सुंदर प्रेम में नाराज़ हो जाती और कभी उसके बिना मिलती भी नही। नाराज़गी में भी जब वह मुस्काती तो कितनी सुंदर लगती। नाराज़ होना, मुस्कुराना फिर नाराज़ होना कितना सुंदर है, मोहक है। इसी मुस्कुराने और नाराज़ होने के लिए जन्मों जन्म मिलता है हमें। 



Wednesday, 1 March 2023

प्रेम का महीना !

 “Love each other or perish.”

यह कथन है , “डब्लू एच ऑडेन” की लेकिन इसे पहली बार मैंने जाना,  tuesdays with morrie” किताब को पढ़ कर। तब से यह लाइन मन में घर कर गयी। 

महरौली में तब डेरा था। भाई-भईया के साथ साकेत पीवीआर में सिनेमा देखने गई थी। फ़िल्म के बाद मोमोज़ ऑर्डर हुए ही थे कि मेरी नज़र वहीं थोड़ी दूर पर लगे बुक स्टॉल पर गई, ‘150 रुपए में दो किताब।’ मैं आई के साथ मैं गई और दो किताबें ले आयी। 

पहली किताब मेरी जानकारी की, “द हंगरी टाइड” दिख गई पर दूसरी कौन सी लूँ, समझ ना आए। ऐसे में दुकानदार ने एक किताब देते हुए कहा, “मैडम, मेरे कहने से यह ले जाइए।” 

लड़के की तरफ़ देख कर मैंने पूछा , “आपने पढ़ी है ?”  

अरे मैडम, “हम तो ग्राहक के डिमांड से समझ जाते है कि कौन सी किताब कैसी है” और वह मुस्कुरा उठा। साथ ही बोला- आप ले जाइए इसे, नहीं पसंद आए तो दो दिन में बदल ले जाइएगा पर किताब नई जैसी चाहिए। 

मैंने हँसते हुए रुपए उसकी तरफ़ बढ़ाया, कहा- “आप बिना MBA किए मार्केटिंग के गुण जानते हैं।” 

वह किताब , “ tuesdays with morrie ” थी। बाद के दिनों में मैं कुछ एक बार उस स्टॉल पर गई। वही डेढ़ सौ में दो किताब ले आती। भाई मेरा मज़ाक़ उड़ाता कि सौ-डेढ़ सौ की किताब के फेर में 80 रुपए ऑटो का लगा देती है। पर उसे कौन समझाए कि मैं एक उम्मीद से जाती थी। उम्मीद यह कि, मेरा ऑटो का भाड़ा बर्बाद नहीं होगा।  अगर मेरी पसंद की किताब नहीं भी मिली तो वह लड़का ज़रूर कोई अच्छी बुक मुझे सुझाएगा। 

तब कितनी सहजता से लोगो पर विश्वास हो जाता। कभी किसी को यह नहीं कहा- तुम क्या हो ? तुम क्यों सलाह दे रहे हो ? 

यह शायद कुछ परवरिश थी तो कुछ ग़ालिब के उस शेर का असर, “हर एक बात पे कहते हो की तुम कि तू क्या है…” आज भी कोई बात बुरी लगी तो जबाब चुप्पी होती है।

वैसे ग़ालिब के समय में ही एक और शायर हुए, “हैदर अली  आतिश ” उनका कहना है , 

 “दोस्त हो जब दुश्मन-ए-जाँ तो क्या मालूम हो

आदमी को किस तरह अपनी कज़ा मालूम हो।” 

इनकी जन्मतिथि-पुण्यतिथि मालूम तो नहीं पर ऐसा लगता है कि इनका भी फरवरी से कोई सम्बन्ध होगा।  वैसे आदमी को कुछ मालूम हो या ना हो पर यह ज़रूर मालूम होना चाहिए कि, “ दुख और एकांत किसके साथ बाँटना है।” 

हम बात से भटक रहें हैं पर क्या करें, यह जो फ़रवरी, प्रेम का महीना है, वह जाने वाली है। इसी महीनें में ग़ालिब दुनिया से विदा हुए तो जगजीत सिंह आए। प्यार को समझाने वाले ऑडेन इसी 21 तारीख़ को जन्म लिए और आज फिर साकेत जाने का मन हुआ… बहुत सी किताबें पढ़नी बाक़ी है… दुनिया की समझ बाक़ी है।  

नोट- आज ग़ालिब के साथ आतिश को मिलाया है। ग़ालिब पर नसीरुद्दीन शाह की एक बहुत अच्छी सीरियल है। ना देखी हो तो ज़रूर देखें।



किताब की दुकान !


इन दिनों पुस्तक मेला, किताबों, दोस्तों,  पाठक और सेल्फ़ी के बीच लेखकों को देखती हूँ तो जाने क्यों यह खयाल दिमाग़ में आता है, “पुराना कोट पहनें और नई किताब खरीदें” 

अब पुराना कोट और नई किताब पर हर किसी का अपना मत हो सकता है। वैसे किताबों की दुनिया विशाल है…पर एक दो नए कोट तो होने ही चाहिए। पुराने कोट से मुझे नोचनी होने लगती है…

तो चलिए,  मैं पुरानी किताबें(नई जैसी) ख़रीदिए वाली जगह पर ले कर चलती हूँ। जगह यानि इस दुकान का नाम ‘गुडविल स्टोर’ है। यह एक नॉन प्रॉफ़िटेब संस्था द्वारा चलाई जाती है। इस स्टोर की कमाई का हिस्सा अयोग्य को योग्य बनाने के काम जाता है। मसलन किसी शारीरिक विकलांगता, पढ़ाई पूरी ना होना, किसी नशे आदि से मुक्ति के बाद नया जीवन शुरू करने की चाहत आदि-आदि जैसे व्यक्तियों को इस संस्था द्वारा काम मिलता है। 

गुडविल स्टोर के बारे में पहली बार मुझे जानकारी तब हुई जब टेक्सस(ह्युस्टन) से न्यू जर्सी मूव हो रही थी। घर के कुछ सामान जो थोड़े ख़राब हो गए थे, उन्हें यहाँ डोनेट करने को एक मित्र ने बताया। पहली बार यहाँ डोनेशन को गई तो डायरेक्ट सामने वाली गेट से भीतर चली गई पर वहाँ तो देखा बाक़ायदा एक छोटा सा सुपर मार्केट बना हुआ था। मैं चौंक गई। काउंटर पर जाकर पूछताछ की तो मालूम हुआ कि आप यहाँ से समान भी ख़रीद सकते है और वह भी काफी कम क़ीमत पर। डोनेशन वाली चीज़ें ही ठीक और साफ़  करके बेची जाती है। जैसे दिल्ली का सरोजनी या लाजपतनगर का मार्केट। बाक़ी डोनेशन के लिए बैक डोर पर जाना होता है। 

अच्छी बात यह कि आपको डोनेशन के बदले एक स्लिप मिलती है। इसमें आपकी दी हुई चीज़ों की क़ीमत आंकी जाती है। और उतनी क़ीमत का आप टैक्स में छूट पा सकते हैं। 

यह सब जानकारी लेने के बाद मैं स्टोर का एक चक्कर लगाने लगी। यहाँ कपड़े-जूते से लेकर घर के समान, बच्चों के खिलौने और किताबों के साथ मूवीज़ के कैसेट भी बहुत कम क़ीमत पर मिल रहे थे। किताबों का सेक्शन देख कर तो मेरा मन खुश हो गया। जो किताबें बार्नेस एंड नोबल, अमेजन या दूसरे बुक स्टोर पर $15-20 में मिलती वह यहाँ सिर्फ़ $1.99- 2.99 की। और किताबें भी नई सी। हाँ, यह है कि किताबों की संख्या थोड़ी कम होती है और हर बार आपकी पसंद की किताब नहीं मिलती। 

न्यू जर्सी के प्रिंसटन में यह स्ट्रोर दूर था घर से, वही हाल फिलिडेल्फिया और कनेक्टिकट में पर जब से इंडियाना मूव हुई यहाँ जाना फिर से शुरू हो गया।  कारण यह कि यहाँ यह स्टोर “पटेल ब्रदर्स( किराना दुकान) के बगल में ही है। पर कोरोना ने वह भी सिलसिला तोड़ दिया। 


Friday, 2 December 2022

कला !!

 कुथी जांदा चंद्र माँ, कुथी जांदे तारे हो

ओ अम्मा जी कुठी जांदे दिलां दे प्यारे हो…

एक बेटी अपनी माँ से पूछती है, “माँ ये चाँद, तारे कहाँ जाते हैं, ओ मेरी माँ दिल के क़रीब लोग कहाँ जाते हैं…” 

इंद्रधनुष सी माँ-बेटी की बातों का रहस्य वे ही जाने… वे ही जाने अपने जने का दुःख और आँसू से भरी मुस्कान का सुख… बेटी के नाज़ुक कंधों की मालिश कर धीरे-धीरे गुनगुनाती, “तुम्हें कोयल नहीं बया पक्षी बनाना है… ओ मेरी हिम्मती बेटी तुम्हें अपना घोंसला ख़ुद बनाना है… जुगनुओं की चमक और आस-नीरस की बदली में सदा मेरी बात याद रखना, “तुम मेरी बेटी हो ,तुम कहाँ जाओगी और मैं कहाँ जाऊँगी तुमसे अलग…याद रखना जब प्रसव की घड़ी हो तो उस वक़्त बिल्कुल नहीं डरना…मुझे याद करना और देखना एक साथ खिले दो इंद्रधनुष… जिसके एक सिरे पर मैं तुम्हें दूसरा सिरा थमा कर साथ रंग बिखेरने को इशारा करती हूँ…तुम और हम दो कहाँ…  दो पहाड़ जैसे मन टूट रहे है… आँखों के झरने के बीच एक बाधा है बना ली है दोनों ने कि दोनों को डर है वे एक दूसरे को डूबा ना दें… भोर की बेला और उन टूटते पहाड़ो के बीच माँ धीरे-धीरे गा रही है…विदाई हो रही है…

छुपी जांदा चन्द्रमा छुपी जांदे तारे हो,

हो धीये भला नाइयों छुपदे दिलां दे प्यारे हो,

दिस्तों आज मेरी शादी की सालगिरह नहीं फिर भी आपका आशीर्वाद सर आँखों पर। कई यादों के बीच कल मैंने “कला” फ़िल्म देखी। बड़ी उदास सी फ़िल्म है… बर्फ सी ठंढी, चुभने वाली। सोचती हूँ क्या बितती होगी उन बेटियों पर जिनकी उपेक्षा उनकी माँ ही करती है। कैसी होता होगा उस माँ का मन और उसका जीवन जो अपनी अजन्मी को मार देती है… कितना बोझ होता होगा या फिर नहीं कि उन्होंने पंडित को जन्म दिया एक बाई को नहीं… 

इस उदास फ़िल्म में सबसे सुंदर इसका संगीत और दूसरा कुछ बातें जो जानते हुए भी रिवीज़न किया जा सकता है।जिनमें से दो मुख्य ,

* वक्त सबका पलटता है बस उस वक्त तक मेहनत और धीरज से काम लेना चाहिए। 
*प्रेम ही अंत है… 


Sunday, 27 November 2022

टी गार्डेन !

 नैनीताल आने से पहले हमने यह नही सोचा था कि यहाँ टी गार्डेन भी होगा। नैनी झील में नाव की सवारी के दौरान नाविक मुकेश ने ही इसके बारे में बताया था। कहा था, गोलू महाराज के मंदिर से होते हुए चाय बाग़ान चले जाना।

  गोल्जू महाराज के दर्शन के बाद शाम की चाय का लगभग वक्त हो ही आया था। हम निकल पड़े नैनीताल के भवाली में, “श्यामखेत  टी गार्डेन” की ओर। मंदिर से यह ज़्यादा दूर नही है। यहाँ पहुँच कर हमने टिकट लिया। पर पर्सन टिकट का मूल्य, 40 रुपया है। 

 यह बागान सैनिक स्कूल घोड़ाखाल की जमीन पर है। जिसे टी बोर्ड ने 30 साल के लिए लीज पर लिया हुआ है।बाग़ान 155 हेक्टेयर में फैला हुआ है पर इसका अधिकांश हिस्सा लोहे की पतली जाली द्वारा घेर दिया गया है। पर्यटन के लिए एक ही हिस्सा खुला है। यहाँ चाय की पत्तियाँ तोड़ना भी मना है। बाग़ान में एक दो स्टाफ़ घूमती रहती हैं थोड़ी बहुत जानकारी देने के साथ कॉस्ट्यूम लेने को कहती हैं। महिलाओं के एक-दो कपड़े है जिन्हें पहन कर आप तस्वीरें ले सकती हैं। पर हमने कोविड को ध्यान में रखते हुए मना कर दिया। थोड़ी देर उनसे चाय की बात की और घुस पड़े चाय के बाग़ान में। कुछ तस्वीरें ली और फिर बाग़ान में ही स्थित एक रेस्टोरेंट जा घुसे। सोचा यहाँ तक आए है तो शुद्ध चाय पिया जाए। बाग़ान में इकलौता चाय की दुकान होने से चाय की क़ीमत भी ज़्यादा थी। पर साज-सज्जा सुंदर थी। इसकी बालकनी में बैठ कर चाय बाग़ान निहारते हुए चाय पीना अच्छा लगता। और हमने चाय मँगा ली। 

सच कहूँ तो मुझे चाय बिल्कुल पसंद नही आयी। बड़ा तेज स्वाद लगा। फिर अदरक वाली चाय की बात ही कुछ और। पर मुझे छोड़ कर बाक़ी तीन लोगों को चाय ठीक ही लगी। 

चाय के साथ थोड़ी देर और बैठा जा सकता था पर जाना था कैंची धाम और रास्ता थोड़ी दूर था। हम निकल पड़े चाय के बाग़ान को विदा करते हुए।

Wednesday, 23 November 2022

कैची धाम !

 पिछले पोस्ट में हमलोग, “न्याय के देवता” के दर्शन को गए थे। आज मैं आपको लेकर चलती हूँ, “कैंची धाम” नीम करौली बाबा के आश्रम। 


यहाँ चलने से पहले जान ले कि बाबा का असली नाम नीम करौली नही “लक्ष्मीनारायण शर्मा” था। वैराग के दिनों में देश भ्रमण के दौरान वे जिला फर्रुखाबाद के गाँव नीब करौरी पहुँचे। ग्रामवासी चाहते थे कि बाबा यहीं रहें। उन्होंने उनकी साधना की सुविधा के लिए जमीन के नीचे एक गुफा बना दी। बाद के बरसो में बाबा ने इस गुफा की ऊपरी भूमि पर हनुमान मन्दिर बनवाया जिसकी प्रतिष्ठा में उन्होंने एक महीने का महायज्ञ भी किया। लक्ष्मीनारायण अब, ‘लछमन दास बाबा’ बन गए थे और उनके आराध्य पवन पुत्र हनुमान थे। कुछ लोग यह भी कहते है कि वे हनुमान जी के अवतार थे या हैं।  


इस “नीब करौरी” गाँव में अठारह वर्ष रहने के बाद बाबा ने इस गाँव को हमेशा के लिए त्याग दिया पर इसके नाम को स्वय धारण कर लिया। तब से इन्हें नीम करौली बाबा कहा जाने लगा। 


कुछ लोग कहते है कि यही वह नीम करौली स्टेशन था जहाँ बाबा ने ट्रेन रोक दी थी और इसी कारण उन्हें नीम करौली कहा जाने लगा। 


सच्चाई जो हो पर अब नीम करौली बाबा भ्रमण करने के दौरान उत्तराखंड के कैंची धाम पहुँचे। 

कुमाऊं की पहाड़ियों के गर्भ में स्थित यह स्थान उन्हें इतना भाया की यही रम गए और यहाँ कैंची धाम की स्थापना की। उनका यह आश्रम अपने नाम के अनुरूप दो पहाड़ियों के बीच स्थित है जो रूप में कैंची जैसी आकार बनाती है। 


बाबा के बारे में पहली बार मैंने किसी अख़बार में पढ़ा था। इनके चमत्कार की कहानी छपी थी, कि कैसे इन्होंने ट्रेन को रोक दिया था। बाल मन बड़ा चकित हुआ और सोचने लगा कि बाबा ने यह कैसे किया होगा ? उस वक्त कई कल्पनाएँ उपजी मन में…


फिर कई सालों बाद फेसबुक के सीईओ मार्क जुकरबर्ग जब कैंची धाम आए तो मालूम हुआ कि यहाँ कभी एप्पल के पूर्व सीईओ स्टीव जॉब्स भी आ चुके हैं। कई और दूसरे लोग भी पर मेरी उत्सुकता उनके ट्रेन रोकने और उनके काले कम्बल में ही रही। 


अब यह नियति ही कहिए कि दिल्ली में रहते हुए भी कभी नैनीताल जाना ना हो पाया और ना जा पायी कैंची धाम। 


ख़ैर हम जब कैंची धाम पहुँचे, संध्या आरती हो रही थी। इससे पहले जिसने मंदिर में प्रवेश पा लीया उसने पा लिया था। मंदिर शाम के सात बजे तक ही खुला रहता है। हम पाँच -सात मिनट देरी से पहुँचे थे। कुछ लोग गेट से ही प्रणाम कर लौट रहे थे। तो कुछ सामने नदी को निहार रहे थे, तस्वीरें ले रहे थे।  हमें मंदिर की तरफ़ जाते देख एक व्यक्ति ने कहा, “मंदिर बंद हो गया है।”

यह सुन कर मैं निराश हो गई। भाई ने संतावना दी, “कोई बात नही यही से प्रणाम कर लो। अब क्या कर सकतें हैं।” 


गेट के पास से प्रणाम करते हुए मैं मन ही मन सोच रही थी, “ ओह, टी-गार्डेन बेकार ही गई। क्या हनुमान जी, यहाँ तक आ कर भी दर्शन नही हो पाएगा…”


तभी मंदिर का गार्ड घूमते हुए गेट तक आया। मैंने बेवक़ूफ़ सा सवाल किया, “मंदिर बंद हो गया है क्या?”


उसने कहा, “ रुको मैं साइड का गेट खोल देता हूँ पर जल्दी जल्दी भीतर घुसो वरना और लोगों को भी भीतर लेना होगा। मंदिर बंद हो चुका है।”


आप अंदाज़ा नही लगा सकते उस वक्त मेरी ख़ुशी का… मैं दौड़ कर शतेश और भाई की पत्नी को बुलाती हूँ जो प्रणाम कर मंदिर के पास वाली नदी को निहार रहे थे। भाई बग़ल की बेंच पर बैठा कुछ मनन कर रहा था, पूछ बैठा क्या हुआ ? 


जल्दी चलो जल्दी, वे हमारे लिए गेट खोल रहे हैं। तभी गार्ड ने आवाज़ दी, “जल्दी करो जल्दी” और फटाफट दर्शन करके वापस आ जाओ। हाँ भीतर फोटो लेना मना है। उसे धन्यवाद करते हुए फटाफट हम भीतर घुसे। 


कैंची धाम के प्रांगण में हनुमान जी की प्रतिमा के आगे आरती हो रही थी। थोड़ी देर रुक कर वहाँ प्रणाम किया और गार्ड के आदेशानुसार जल्दी ही नीम करौली बाबा, शिव परिवार, राम दरबार, सिद्धि माता और बाबा के ध्यान स्थान का दर्शन किया। हाँ, मंदिर में प्रवेश करते ही वैष्णो देवी का स्थान है जहाँ कीर्तन हो रहा था। 


वापस लौटते वक्त भी हमने गार्ड को कई बार थैंक यू कहा। दिन के वक्त आओ तो यहाँ समय बिता सकते हो के साथ उसने गेट बंद कर लिया। पर अब जाने कब जाना होगा… 


दो और छोटे क़िस्से इस धाम से जुड़े रह गए है जो अगली बार लिखूँगी। फ़िलहाल कैंची धाम आश्रम जाना चाहे तो नैनीताल पहुँचे। शहर से भवाली क्षेत्र में 18 किमी दूर यह स्थित है। यहाँ आप ड्राइव कर या टैक्सी कैब से जा सकते है। 


Thursday, 17 November 2022

बहरूपिया !

इंसान की शक्ल में बहरूपिया तो खूब दिख जाते है पर रूप धरे बहरूपिया को देखे ज़माना हो गया। इनसे बचपन की कई यादें जुड़ी है जो बीते दिनों एक दोस्त की भेजी तस्वीर देख कर पुलग उठी। 

याद आता है बच्चों का चिल्लाना - अरे ! बहरूपिया आया है-बहरूपिया आया है… इनके पीछे बच्चों की एक छोटी सी झुंड चकित-हर्षित भाव से मंडराती रहती। ठीक से याद नही पर शायद मंगलवार और शनिवार को ये रूप धर के आते। हम बच्चों को इंतज़ार होता कि आज ये क्या रूप धरेंगे…मालूम होता ये इंसान है फिर भी भगवान का रूप धरे इन बहरूपिये को देख कई बार लोग या बच्चे हाथ जोड़ लेते। ख़ास कर बजरंग बली का रूप तो खूब जमता। 

याद आती है वह शाम जब तर-तरकारी ख़रीदने  बाज़ार जाती। कभी हनुमान तो कभी राम बन ये, एक थाली लिए दुकान-दुकान घुम रहे होते। कुछ दुकानदार इन्हें पैसे देते तो कुछ बिस्कुट-नमकीन-भुजा या मिठाई। इसके बाद बाज़ार से सटे हमारी कोलोनी का नम्बर आता। घर -घर से कभी आटा तो कभी चावल मिल जाता इन्हें। हाँ, बाद के दिनों में आटा-चावल की महंगाई पर इनकी कला हल्की पड़ी और घर के लोग भी एक-दो रुपया दे कर विदा कर देते। जाने इनके मन में उस पल क्या भाव होता पर इनके चेहरे पर उस वक्त उस धरे रुप का ही भाव होता। मर्यादापुरुषोत्तम राम थोड़ा सा आटा देख मुस्कुरा रहे होते… राम भक्त हनुमान एक सिक्का पा कर, जय श्री राम-जय श्री राम पुकार रहे होते… माता काली बच्चों के पीछे पड़ने पर क्रोध में जीभ लपलपा रही होती… दो पैरों वाला शेर बच्चों को देखते चार पैर का बन दौड़ा मारता… और फिर एक दिन उसने धरा किसी सती का रूप… लोग इसके रूप में उतनी रुचि नही दिखा रहे थे। कुछ  दुकानदार पूछ बैठे, “रे आज का बनल बाड़ीस ?”

“सती अनुसुइया”

लोग हँस रहे थे… पर बहरूपिया अपना खेल दिखाता रहा… ठेला गाड़ी खिंचता रहा… महिलाओं ने उस दिन अच्छी दान-दक्षिणा दी। यह उस फ़िल्म का असर था जो पिछले एक महीना से अभिषेक टाकीज़ में चल रहा था। 

“सती अनुसुइया”

धीरे-धीरे रूप धरने वाले बहुरुपिया मरने लगे… आम आदमी उनकी जगह लेने लगा। 




Tuesday, 8 November 2022

मुझे चाँद चाहिए !!

मुझे चाँद चाहिए उन पाँच किताबों में से एक है जिन्हें मैंने बीते दिनों एक साथ पढ़ना शुरू किया था। यह किताब मैं ऑनलाइन पढ़ रही थी। 516 पृष्ठ की किताब कई बार ऑनलाइन पढ़ना आँखों को तकलीफ़ देता इस वजह से दूसरी एक किताब पेपर बैक की साथ-साथ पढ़ रही थी। 
इस किताब के लेखक सुरेंद्र वर्मा अपनी इस किताब की शुरुवात प्रसिद्ध रोमन सम्राट जूलियस सीजर यानि कालिगुला की पंक्तियों से की है। 

यह किताब वर्षा यानि सिलबिल की कहानी है जो महत्वकांक्षी और थोड़ी विद्रोही स्वभाव की है। इस किताब की सबसे अच्छी बात मुझे जो लगी वही इनके महिला पात्रों की मित्रता। हमेशा पुरुष मित्रता पर क़िस्से लिखी जाते हैं, फ़िल्में बनती है। लेकिन इस बार इस किताब के ज़रिए दिव्या और वर्षा की मित्रता पढ़ने को मिली। एक मित्र तो ऐसा होना ही चाहिए। और मुझे अफ़सोस है कि इस कदर हमराज़ मेरा कोई नही हो पाया…

इस किताब में एक और मित्रता की कड़ी है। वर्षा और शिवानी। दोनों ही हर्ष से प्रेम करतीं है और प्रेम में उसकी बातें कुछ यूँ होती है, 
वर्षा उदास-सी मुस्कुराई, 'मैंने तकिए के नीचे हर्ष की तसवीर रखी है। बिस्तर पर जाने के बाद उसी से उल्टी-सीधी बातें करती हूँ। मैंने प्रेम की निजी परिभाषा बनाई है। बताऊँ?'

'हूँ?' शिवानी कौतुक से मुस्कुराई।

'जब किसी की स्मृति नींद ला देने में समर्थ होने लगे तो इसे व्यावहारिक रूप से प्रेम कहा जा सकता है।'

शिवानी उदास चपलता से मुस्कुराई - 'और जब किसी की स्मृति से नींद उड़ने लगे तो, क्या यह भी प्रेम की उतनी ही सार्थक परिभाषा नहीं होगी...?

प्रेम में डूबी दो स्त्रियाँ, प्रेम की ही वजह से एक दूसरे की सखी बन जाती है यह जानते हुए भी कि दोनों का प्रेमी एक ही है। यह मुझे स्वीकारने में वक्त लगा पर लम्बी कहानी है तार ऐसे लेखक ने जोड़े की बाद में ठीक ही लगा। 

इस किताब में एक और अलग सी बात है। लोग वर्षा को समझने में हर्ष को भूल जाते है पर इस किताब में हर्ष ही है जो वर्षा के प्रति एकनिष्ठ है। उसे कई मौक़े मिलते है पर वह ना अपनी कला से समझौता करता है ना अपने प्रेम से। 

वही वर्षा का किरदार मानसिक रूप से मज़बूत होते हुए भी भावनात्मक रूप से कई बार कमजोर पड़ जाता है। चाहे कमल को लेकर उसका पहला प्यार हो या फिर हर्ष, हर्ष से कुछ दूरी हुई तो सिद्धार्थ से प्रेम या कह सकते है कुछ समय के लिए भावनात्मक लगाव। 

वर्षा का मानना है कि चेखव को भी कभी सम्मानित नही किया गया था और वह इस मामले में उनसे अधिक भाग्यशाली थी। इस तरह यह किताब नकारत्मकता में भी उम्मीद और साहस की तरह लिखा गया है। 




 

Tuesday, 11 October 2022

हेमिंग्वे !

 



“मनुष्य ध्वस्त हो सकता है परन्तु पराजित नहीं” 

यह कथन नोबेल पुरस्कार विजेता उपन्यासकार “अर्नेस्ट हेमिंग्वे” ने अपनी किताब ‘द ओल्ड मैन एंड द सी’ में लिखा है। 

हेमिंग्वे को पहली बार मैंने इसी किताब से जाना था। उस साल साहित्य का नोबेल पुरस्कार बॉब डिलन को मिला था। मैं उनके गाने सुन रही थी और इसी बीच गूगल न्यूज़ में अर्नेस्ट हेमिंग्वे की कोई खबर दिखी। वैसे मैंने इनके बारे में थोड़ा बहुत पढ़-सुन रखा था पर कोई रुचि नही जगी थी इनमें। इनकी कोई किताब या इनकी लिखी कहानी भी नही पढ़ी थी अब तक। पर उन दिनों नोबेल के हल्ला के बीच सोचा क्यों ना इस नोबेल विजेता की कोई किताब पढ़ी जाए। अगले दिन लाईब्रेरी पहुँची और वहाँ से उठा लाई, द ओल्ड मैन एंड द सी। 

किताब में एक बूढ़े मछुआरे की निराशा, अकेलेपन, साहस के बारे में रोचक तरीक़े से लिखा गया है। 

लेकिन दोस्तों लिखना, उपदेश देना, किसी की मृत्यु की आलोचना( हेमिंग्वे के पिता ने भी आत्महत्या की थी। जिसे इन्होंने पलायनवाद कहा था) करना आसान है पर उसे खुद जीना शायद बहुत मुश्किल। तभी तो इन्होंने कहा है, 

“दुनिया सभी को तोड़ती है लेकिन टूटी हुई जगहों पर कुछ लोग ज़्यादा मज़बूत हो जातें हैं।”

“कुछ” लोग 

सभी नही। और ना ही यह कथन कहने वाला इंसान। 

हेमिंग्वे ने खुद को गोली मार कर आत्महत्या कर ली। 

अर्नेस्ट मिलर हेमिंग्वे एक अमेरिकी लेखक और पत्रकार थे। उनका जन्म 21 जुलाई, 1899 को ‘इलिनोइस के ओक पार्क’ में हुआ था और 2 जुलाई, 1961 को केचम, इडाहो में उनका निधन हो गया। जीवन यात्रा इनकी मुश्किल और निराशा की कहानी है। 

मेरा संयोग यह रहा की मैं उस शहर ( इडाहो ) गई जहाँ इनकी मृत्यु हुई थी। मैं वहाँ गई जहाँ इन्होंने अपने जीवन का अधिकांश समय बिताया (की वेस्ट ) यहाँ भी एक बड़ा म्यूज़ियम है इनके घर का। पर मैं जा पाई सर्फ़ इनके जन्मस्थान (ओक पार्क) 

तो आज हम चलते है, हेमिंग्वे के जन्मस्थान। एक घर जहाँ उनका जन्म हुआ। आज यह जगह एक म्यूज़ियम है। यहाँ इनकी बुक रीडिंग क्लब भी है। इस घर रूपी म्यूज़ियम का टूर 45मिनट का है। दो फ़्लोर के इस घर को बहुत सुंदर तरीक़े विक्टोरियन स्टाइल से रखा गया है। एक -एक चीज़ को गाइड क्रिस बड़ा प्रेम से दिखलाते है। हेमिंग्वे के प्रति उनका प्रेम उनकी आँखों में, उनकी बातों से झलकता है। जब क्रिस इनकी मौत की बात करते हैं, एक पल को उनका गला रुंध जाता है…16 लोग उन्हें चुपचाप देख रहें होते हैं और वे कुछ रुक कर कहते है, द एंड… आप लोगों को कुछ पूछना हो तो पूछ सकते हैं। 

मैं क्या पूछती ? मैं तो बस एक इंसान में प्रेम देख रही थी… और फिर ज़्यादा कुछ पढ़ा भी तो नही इनका लिखा। 

नोट- घर रूपी म्यूज़ियम का टिकट ऑनलाइन लेने से आप अपना स्लॉट बुक कर सकते हैं। टिकट वहाँ जा कर भी ले सकते हैं पर हो सकता है आपको अगली टूर का इंतज़ार करना पड़े। टिकट का दाम 20 डॉलर पर अडल्ट है। पार्किंग रोड साइड है पर जगह मिल जाती है। और हाँ, इतना अच्छा टूर गाइड मुझे याद नही कब मिला था किसी म्यूज़ियम का। सच में यहाँ लोग किसी भी काम को बड़ा मन से करते है। 


Friday, 7 October 2022

अटका आँसू !

डूबते सूरज की तरह डूब रहे मन का हाल वह दहलीज़ क्या जाने जिसके पार समुंदर ना था। बर्फ़ से भारी, जमे चार पैर घिसट रहे थे खुद को। समय की गति धीमी… इतनी धीमी की घड़ी के काटें तक रुक गए। बहती आँखों के बीच जम गया था मन और उसी बीच एक बूँद खून के आँसू…

वह एक बूँद आँसू ना जाने देह में कहाँ भटक रही है। एक बूँद जो अटक गई है मन में या कभी दिमाग़ में, गले के नाल को निचोड़ कर छाती के पर या सुखी आँखों के परदे के भीतर। 

वह कौन सी घड़ी थी जब देह का रक्त सिर्फ़ लाल रंग था… रंग जो जाने कैसे झक पीला हो गया और फिर नारंगी…अचानक नीला… हे परमेश्वर! इस नीले का रंग मिलता है आसमाँ से जो फटने के पहले गरजता है, चमकता है, बरसता है… भीतर धड़कनों की मरोड़ उठी, एक आह देह का रोआ-रोआ बन पसर गई और सब शून्य हो गया। 

थावे मंदिर !

 नवरात्रि की बिहार और बंगाल में अलग ही रौनक़ होती है। माता के आने की तैयारी इतने धूम-धाम से होती है की नव दिन कैसे बीत जाते है मालूम ही नही चलता। जब मैं छोटी थी तो इस दस दिन का कितना इंतज़ार होता। स्कूल की छुट्टी से लेकर दस दिन माता के लिए फूल तोड़ना, घर में हो रहे रामायण पाठ को कई बार सुनना। भाग कर पंडाल तक जाना और उसमें बन रही मूर्तियों को देखना। ओ, आज हाथ बन गया, अरे सिर लगा दिया है, उफ़्फ़् मुख को ढँक दिया अब सप्तमी का इंतज़ार करना होगा। 

दुर्गा की पूजा घर-घर होती। कोई मंदिर जाता तो कोई घर पर ही पूजा -पाठ कर लेता। मेरी माँ घर पर पूजा पाठ करने वाली में से है। लोग इन दिनों थावे खूब जाते। माता के दर्शन करके आते और वहाँ की बातें बताते। मैं चकित होकर इन क़िस्सों को सुनती। सोचती की काश मैं भी थावे जाती…

तो चलिए आज हम थावे चलते हैं और रास्ते में थावे वाली मईया का क़िस्सा भी सुनते चलते हैं। 

 चेरो वंश के राजा मनन सिंह खुद को मां दुर्गा का बड़ा भक्त मानते थे। एक बार उनके राज्य में अकाल पड़ गया। उसी दौर में थावे में माता रानी का एक भक्त रहषु भगत था। रहषु पर माँ की कृपा थी। वह आकल से पीड़ित लोगों को माँ के चमत्कार से निकला अन्न देता था। वह घास को बाघ से दौनी करवाता और उससे चावल निकलने लगते। यह बात राजा तक पहुंची लेकिन राजा को इस बात पर विश्वास नही हुआ। वह रहषु के विरोध में उसे ढोंगी कहने लगा और उसे अपने दरबार में बुलाया। राजा ने रहषु से कहा कि अगर ऐसा है तो तुम मां को यहां बुलाओ। इस पर रहषु भगत ने राजा से कहा, राजा, यदि मां यहां आईं तो आपका राज्य को बबार्द कर देंगी लेकिन राजा नहीं माना। 

रहषु भगत के आह्वान पर देवी मां कामाख्या से चलकर पटना और सारण के आमी होते हुए गोपालगंज के थावे पहुंची और रहषु भगत का मस्तक चिर कर अपना सिर हाथ भर दिखाया की राजा के सभी भवन गिर गए। सारे लोग मर गए और राजा भी मर गया।  

 थावे वाली देवी के मंदिर को सिद्धपीठ के तौर पर माना जाता है। यहाँ हर साल हज़ारों भक्त आते है माता के दर्शन को। पहले तो माता के मंदिर में प्रवेश आसानी से मिल जाता था पर अब भीड़ की वजह से गेट के बाहर से ही इनका दर्शन करना पड़ता है। या फिर आपका कोई जुगाड़ हो तो शुक्रवार- सोमवार को छोड़ आप भीतर जा कर माँ का दर्शन कर सकते हैं। 

यहाँ भीड़ की एक बड़ी वजह शादी-विवाह भी है। लोग यहाँ शादी-विवाह, देखा-देखौकी के लिए भी आते है। मंदिर परिसर अब पहले से काफ़ी संयोजित ढंग से बन गया है। कभी बिहार जाए तो एक बार माता के दर्शन को ज़रूर जाए। यहाँ का प्रसिद्ध पीडिकिया खाए और पेड़ों से घिरे तालाब के किनारे कुछ पल बैठे। साथ ही एक छोटा पार्क भी है पर बिहार के पार्क के बारे क्या ही कहना…



Monday, 3 October 2022

गढ़देवी मईया !

भारत देश सच में चमत्कारों और क़िस्सों का देश है। आज अष्टमी के दिन माता गौरी की पूजा के बाद कुछ कथाएँ याद आई और एक रोचक बात भी। 

आपने सुना होगा या पढ़ा होगा, राजा दक्ष प्रजापति ने एक यज्ञ का अनुष्ठान किया था। उस यज्ञ मे बिना बुलाये उनकी पुत्री सती भी अपने पति से जिद्द करके वहाँ पहुंची, लेकिन वहाँ अपने पति भगवान शिव का कहीं स्थान नहीं देखकर, वह यह अपमान सहन नहीं कर पाई और यज्ञशाला के हवन कुंड में कूदकर अपने प्राणों की आहुति दे दी। 

इसके बाद वियोगी-क्रोधित महादेव, सती के शव को कंधे पर उठाकर तांडव करने लगे। उनका यह रौद्र रूप देख समस्त ब्रह्मांड भयभीत हो गया। प्रलय की स्तिथि हो गई। यह देख देवता गणों के आग्रह पर भगवान विष्णु ने प्रिया वियोग से भगवान शिव का ध्यान भटकाने के लिए सुदर्शन चक्र से आकाश में ही सती के शव के कई टुकड़े कर दिए। और फिर इनहि सती का जन्म “माता गौरी पार्वती” के रूप में हिमालय के यहाँ हुआ। 

कथा तो हो गई पर जो रोचक बात रही वह यह की, सती के शव के टुकड़े जब हुए तो उनके खून के छींटे बिहार के मढ़ौरा में भी पड़े। जहां बाद में “गढ़ देवी मंदिर” की स्थापना हुई। 

लोक कथा यह भी है कि शक्ति पीठ मंदिर थावे, जिसके बारे में पिछले पोस्ट में बताया था कि माता के भक्त “रहसू भगत” के बुलावे पर माता कौड़ी कामाख्या से चलकर जगह-जगह विश्राम करते हुए थावे पहुँची थी।  इस दौरान माता ने थावे पहुंचने से पहले मढ़ौरा के इसी गढ़देवी मंदिर के पावन स्थल पर विश्राम किया था। यहीं वजह है कि यहां माता की दो-दो पिंडिया स्थापित हैं और यह स्थल भी सिद्ध शक्तिपीठ के रूप में जाना जाता है। 

वैसे तो छपरा ज़िला के मढ़ौरा के गढ़ देवी मंदिर का इतिहास बहुत पुराना है और सालो भर यहाँ भक्तों का भीड़ लगी रहती है। यहाँ का प्रांगण पहले की तुलना में थोड़ा बड़ा और साफ़-सुथरा हुआ है। हाँ, यहाँ आने पर आपको एक और रोचक चीज़ देखने को मिलेगी,

वैसे तो सभी मंदिरों के मुख्य दरवाजे पूरब की ओर होती है, लेकिन मढौरा के गढदेवी मंदिर में पूजा करने वाली मुख्य मंदिर का गेट पश्चिम की तरफ है। कहते हैं यह भारत देश का पहला मंदिर है, जहाँ पूजा करने वाली गेट “पश्चिम” की तरफ है। 

इसके बारे में यह सुना है कि जब अंग्रेज यहां आये तो मढौरा में उद्योग लगाने की इच्छा से यहां की मन्दिर और मान्यताओं से अंजान थे। वे मंदिर को अनदेखा कर यहाँ आस-पास काम करने लगे पर वह कार्य सफल नही होता। ऐसे में अंग्रेज अफ़सर परेशान-परेशान। 

एक रात एक अंग्रेज को माता ने सपने में मंदिर के पास कार्य कराने से मना किया। अंग्रेजों ने इसे मानने से इंकार किया और यह सन बातें बकवास बताई। लोगों की आस्था और मज़दूरों का विश्वास देख फिर उस अफ़सर ने कहा, “यदि तुम्हारी माता स्वयं शक्ति है तो चमत्कार करें।” और फिर मंदिर का जो गेट खुद ब खुद सुबह होने से पहले पूरब से पश्चिम हो गया। सुबह अंग्रेजों ने यह देखा तो उनके होश उड़ गए और उन्होंने माता से माफ़ी माँग वहाँ से थोड़ी दूर हटकर मढौरा में चीनी मिल, मोर्टन मिल, सारण इंजीनियरिंग और डिस्ट्रिल वाटर की चार फैक्ट्रियां स्थापित की। 

बिडंबना यह की बिहार सरकार इन चारों फैक्टरियों में से किसी को भी बाद के समय बचा नही पाई। मंदिर के सिवा ये सब अब खंडहर है… 

Sunday, 29 May 2022

रिले !!

 सम्मान क्या होता है, कैसे दिया जाता है यह व्यक्ति और समाज के ऊपर निर्भर करता है। कई बार इंटरनेशनल बुकर प्राइज़ भी लोगों के लिए मायने नही रखती तो कई बार बच्चों की कविता लिखने वाला कवि भी इतना सम्मान पाता है की उसके शहर को उसके नाम से रंग दिया जाता है। 

अमेरिका के क़रीब 43-44 स्टेट घुम चुकी हूँ। पर किसी लेखक के प्रति इतना सम्मान इंडियापोलिस में ही देखने को मिला। जबकि अमेरिका को महान बनाने में कई बेहतरीन लेखक का नाम जुड़ा है। 

आज हम चलते है, “जेम्स व्हिटकॉम्ब रिले” के घर। एक ऐसे कवि जिन्होंने बच्चों की कविताएँ लिख कर अमेरिका में खूब नाम कमाया और एक समय में सबसे ज़्यादा बिकने वाले लेखक के रूप में शुमार हुए। वह अलग बात है कि बाद के दिनों में इंडिनापोलीस से लेखक “कर्ट वोनगुट” और “जॉन ग्रीन” नाम  विश्व पटल पर ज़्यादा प्रचलित हुआ। लेकिन, आप कभी इंडीयनापोलिस आए तो आपको रिले ही रिले दिखेंगे। इनके नाम म्यूज़ियम, बच्चों के हॉस्पिटल, कुछ प्री स्कूल दिख जाएँगे। यहाँ तक की आम दुकानें जैसे कार शॉप, जेनरल स्टोर, लाइब्रेरी का कुछ भाग और शहर की कुछ दिवार भी रिले नाम से रंगे मिले जाएँगे। जब मैं यहाँ पहली बार आई थी तो लगा कि यह रिले क्या है जो हर तरफ़ दिख जाता है। यह कोई स्टोर चेन जैसा कुछ है क्या ? और फिर एक दिन शिकागो जाने के रास्ते में यह नाम फिर दिखा तो फटाफट गूगल किया। मालूम हुआ यह तो यहाँ के एक कवि का नाम है।

 मैं चकित थी कि “एडगर ऐलन पोय” का घर हम बोस्टन में ढूँढते रहे पर मिला नही। इलिनॉस (शिकागो) के लेखक हेमिंवे के नाम एक स्ट्रीट और उनका घर म्यूज़ियम के रूप में है। सिल्वीया प्लाथ बॉस्टन में जहाँ जन्मी, वहाँ अब एक हॉस्पिटल है। ऐसे ही मार्क ट्वीन फ़्लॉरिडा में जन्में यह मुझे फ़्लोरिडा से आने के बाद मालूम हुआ। न्यू यॉर्क की तरफ़ तो कई लेखक रहे पर उनमें से कई की जानकारी बाद में हुई। अल्बमा जाना हुआ तो वहाँ रोकेट सेंटर और मोंटोगामेरी घूमना हुआ। पर बाद में मालूम हुआ की उसी मोंटग़ेमेरी में To Kill a Mockingbird" के लेखक हार्पर ली का जन्म हुआ था। 

ख़ैर दुनिया में इतनी सारी बातें हैं, क़िस्से हैं कि एक इंसान की बस की बात नही। कोई किसी को नही जानता इसमें कोई बुराई नही और ना किसी के काट देने से किसी की कृति नष्ट हो जाएगी। लाख नकार दें पर उसका अंश मात्र कहीं ना कहीं रहेगा ही इस ब्रह्मांड में। 

तो चलिए आज तस्वीरों के ज़रिए घूमते है होसियर कवि, रिले के घर। और हाँ, जिसने भी कहा है पर सच कहा है, “ जिसने बच्चों का मन जीत लिया उसने दुनिया जीत ली”  

नोट- यहाँ हम कोरोना काल में गए थे। उस वक्त इनके घर रूपी म्यूज़ियम में मरम्मत का काम चल रहा था पर हमें इनके छोटे से कैम्पस में घूमने की आज्ञा मिल गई थी।