Monday, 2 July 2018

अष्टयाम !!!!

अष्टयाम :-

घर जब आई थी तो घूमने फिरने के साथ पूजा -पाठ भी होता रहा ।माँ कि इक्षा थी कि मेरे आने के बाद अष्टयाम करवाए ।
अष्टयाम का वैसे तो मतलब आठ पहर होता है ।यानि कि चौबीस घंटे में तीन -तीन घंटे का एक पहर ।
पर साहित्य के दृष्टिकोण से यह एक कविता का रूप है ।जैसे कविता के ही द्वारा किसी व्यक्ति विशेष ,देवगण का गुणगान करना ।

धार्मिक दृष्टिकोण से अष्टयाम दिन के किसी भी शुभ समय से प्रारम्भ कर ,अगले दिन उसी समय तक भजन -कीर्तन ,पूजा पाठ आदि के द्वारा सम्पन्न होता है ।वैसे तो अमूमन लोग अष्टयाम चौबीस घंटे का हीं करवाते है पर ,कहीं -कही लोग नव दिन का भी भजन -कीर्तन रखते है ।

चौबीस घंटे तक भगवान का भजन -कीर्तन करने के लिए मंडली बुलाया जाता है ।इसमें चौबीसों घंटे बिना रुके राम और कृष्ण का नाम गा कर जपा जाता है ।

“हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे “

मंडप में सारे भगवान विराजमान होते है ।सबकी पूजा होती ।श्रिंगार ,भोग ,संध्या आरती और रामायण पाठ सब साथ में चलता रहता है ।बस भजन में प्रमुख राम और कृष्ण होते हैं ।

ऐसे तो अष्टयाम कई बार देखा सुना है पर इस बार का अष्टयाम कुछ अलग था ।अलग इस मायने में कि ,मैंने आजतक कोई “महिला मंडली “ को गाते नही सुना था ।बहुत से लोगों के लिए भी ये नया था ।कारण ज़्यादातर पुरुष मंडली ही होते है ।

हुआ यूँ था ,मेरे जन्मदिन के अवसर पर इसका आयोजन करने का भाई ने सोचा ।दिन आठ मार्च ,महिला दिवस तो सोचा गया क्यों ना इस बार महिला मंडली हीं बुलाया जाये ।हमने इनके बारे में एक चाचा जी सुना था ।
पर कुछ कारणवश आठ को अष्टयाम नही हो पाया फिर भी मंडली हमने महिलाओं की हीं बाँधी।

महिला मंडली के साथ कुछ पुरुष ढोलक ,झाल अपने वाद्ययंत्र के साथ थे ।महिलायें और पुरुष दोनो “थारु” समाज से थे ।ये लोग नेपाल के तराई क्षेत्र के आस -पास रहते है ।
सबसे विशिष्ट बात ये कि ,इस समाज में महिलाओं को विशेष सम्मान दिया जाता है ।मंदिर में पूजा -पाठ कराने से लेकर घर की ज़िम्मेदारी तक थारु महिलायें बख़ूबी निभाती है ।
सुना था बहुत कर्मठ स्वभाव होता है इनका और सच में देख भी लिया ।
मंडली के लोग ईसकॉन को मनाने वाले थे यानी कृष्ण प्रेमी ।शाकाहारी ,बिना लहसन प्याज़ का ख़ुद से पकाया भोजन करने वाले ।बहुत ही सीधे -साधे लोग थे ।उनके बच्चे पढ़ने में इतने होशियार जाने जंगल के किस स्कूल में शिक्षा लेते थे या फिर शांत दिमाग़ का असर था ।

अष्टयाम बहुत ही अच्छे ढंग से सम्पन्न हुआ ।मैं थोड़ा काम में रहने कि वजह से कई चीज़ें देख ना पाई ।अगर भगवान की इक्षा हो तो फिर इस इस मंडली से मिलने का अवसर मिलेगा ।
आपलोग भी थोड़ा भक्तिमय हो जाय ।आपके लिए कुछ अंश ।
वैसे माँ कहती हैं ,इस यज्ञ की ध्वनि जहाँ तक जाती है ,वहाँ तक का वातावरण शुद्ध हो जाता है ,जागृत हो जाता है ।

Monday, 18 June 2018

चम्पारण भितिहारवा आश्रम!!!!

आज आपसबको चम्पारण लेकर चलती हूँ।
आज की यात्रा शुरू करें, इससे पहले कुछ ऐसी बातें जो हमारी आज़ादी से जुड़ी है।

आज़ादी की चाह किसे नही होती ? एक सोने के पिंजड़े में क़ैद पक्षी भी आज़ाद होना चाहता है, जबकि उसे उस पिंजरे के अंदर सब कुछ मिल रहा होता है। फिर हमारे पूर्वज तो इंसान ठहरे भला। भले शारीरिक-आर्थिक कमज़ोर ही सही पर उनकी चेतना तो काम कर रही थी।
ऐसे में अंग्रेजों के ज़ुल्म  कोई कब तक सहता? क्रांति की शुरुआत तो बहुत पहले 1857 में हीं हो गई थी, पर इसके बाद अबतक कोई ऐसा बड़ा आंदोलन नही हुआ था जिससे गोरों की नीव हिल जाए। लोगों में ये विश्वाश आ पाए कि हम मुक्त हो सकतें है।

साल 1894,”मोहन दास करमचंद गांधी “ अफ़्रीका में रंगभेद मिटाने में लगे हुए थे। वहाँ सफलता मिलने के बाद उन्हें अफ़्रीका छोड़ना पड़ा। वे भारत वापस आ गए।

इधर भारत का एक राज्य, ख़ासकर उस राज्य का एक भाग “चंपारण “ अंगरेजो के ज़ुल्म से कंकाल हुआ जा रहा था।चंपारण की ज़मीन पर किसान लाल रक्त से नीला फल उगा रहे थे ।
तीनकाठिया प्रथा के तहत “नील की खेती” ज़बरन किसानो पर थोप दी गई थी। साथ ही पचासन तरह के टैक्स देना उनकी मजबूरी हो गई थी। ऐसे में नील का नीला ज़हर पीना ही उनका जीवन बन गया था। श्याद यही से ज़हर को नीला रंग मिला होगा ।

ख़ैर, ऐसे में चंपारण की धरती को एक चाणक्य मिला। वैसे तो इनका नाम इतिहास के पन्नो में बस आ भर जाता है ,लेकिन अगर ये ना होते तो गांधी को शायद महात्मा बनने के लिए और भटकना होता ।
राजेंद्र प्रसाद , मौलाना मझरुल हक़, बृजकिशोर प्रसाद को एक ऐसे आंदोलन से जुड़ने का मौक़ा नही मिलता  जिसमें पहली बार अहिंसा हथियार बनने जा रही थी।

ये चाणक्य थे “राजकुमार शुक्ल” मैंने इन्हें चाणक्य इसलिए कहा क्योंकि ये चाणक्य की तरह ही तो थे। भले स्वभाव से भोले पर एक बार सपथ ले ली कि, अंगरेजो से अपने फ़सल का, अपने जले हुए घर का , अपने लोगों का , अपनी मिट्टी का बदला लूँगा तो लूँगा। चाहे उसके लिए जो करना पड़े।

राजकुमार शुक्ल, गांधी के पीछे लग कर उन्हें चंपराण बुला ही लाए। यहाँ के लोगों पर ज़ुल्म देख कर गांधी यही रुकने का फ़ैसला कर बैठे।
गांधी ने पश्चमी चंपारण के  “भितिहारवा “  में अपना आश्रम बनाया। कस्तूरबा को भी कुछ दिनो बाद यहाँ बुला लिया।जब तक चंपरण से नील की खेती बंद नही हुई , गांधी यहीं रहे और आज ये जगह “सत्याग्रह की जन्मभूमि” बनी ।
गांधी के आश्रम का नाम “भितिहारवा आश्रम” पड़ गया।

तो अब इतिहास से निकल कर वर्तमान में आती हूँ। आज इसी भितिहारवा आश्रम आपलोगो को लेकर चलती हूँ। सरकार द्वारा आश्रम की रोगनपट्टी हुई है। देखरेख को कुछ कर्मचारी भी है। हाँ , लोगों तक इसकी पहुँच आज भी कम हीं है तभी तो पर्यटन के नाम पर सिर्फ़ हमलोग और एक और परिवार पहुँचा था यहाँ।

कैसे पहुँचे :- भितिहारवा गांधी आश्रम बेतिया से कुछ 50/55 किलोमीटर तथा नरकटियागंज से 15/16 किलोमीटर की दूरी पर है। यहाँ आप अपनी सवारी या नरकटियागंज से ऑटो से पहुँच सकते है। वन वे रोड है जो लगभग ठीकठाक हालत में है।
आश्रम से थोड़ी दूर पर चाय -पानी की एक छोटी सी गुमटी है। भोजन वैगरा की कोई व्यवस्था नही है और ना हीं रहने की कोई व्यवस्था है।

तो हमेशा की तरह  मेरी वहीं पुरानी लाइन , अगर कोई मित्र चंपरण भ्रमण की इक्षा रखता हो। यहाँ  जाना चाहते हों तो मेरे घर पर रुक सकते है। बाक़ी घूमना -फिरना आपकी अपनी ज़िम्मेदारी।

देखने योग्य :- इतिहास महसूस कीजिए फिर सब कुछ हीं सुंदर और देखने योग्य लगेगा ।

मेरे साथ सबसे अच्छी बात ये हुई ,मैंने तभी पुष्पमित्र जी की किताब जब “नील का दाग़ मिटा “पढ़ी थी ।इस किताब की वजह से ये आश्रम लगा कल की ही तो बात है ।
किताब बहुत ही सरल भाषा में लिखी गई है ।एतिहासिक होने के बावजूद आप कहीं ऊब महसूस नही करतें ।हाँ कुछ जगह लगता है कि एक हीं बात बार -बार कही जा रही हो पर शायद यही लेखक की मंशा हो कि पाठक श्याद पुरानी बात भूल ना जा रहें हो आगे बढ़ने के क्रम में ।इतिहास जो है ।

नोट:-सोमवार को आश्रम बंद रहता है ।

Wednesday, 6 June 2018

संवेदनाओं का मरना !!!

कभी -कभी उदासी बिना वजह आपको उदास कर जाती है।जैसा की आज मुझे कर रही है।आज फिर मेरे एक दोस्त के माता -पिता यहॉं आए और मेरी जलन मेरी उदासी का कारण बन रही है।जलन का अब क्या कर सकतें है। नाम तपस्या होने से धीर नहीं आ जाता।

कैसी विडंबना है हम ग्रामीण परिवेश के लोगों की ,खास कर बिहार से आने वालों युवाओं की ,जो हमारे  माता -पिता हमारे लिए ऊँचा  आसमान देखते है और खुद धरती का साथ नहीं छोड़ते।
बचपन से हमें डॉक्टर, इंजीनियर ,सरकारी अफसर बनाने का ख़्वाब देखते है ।अपने उन्ही ख़्वाबों  के बीज हमारे अंदर बोने लगते है ।इस ख़्वाब में हमने उन्हें कई बार जलते देखा है।उनकी वो जलन हमें आज तक जलाती है ।
ओह ! मेरी वजह से माँ ने तकलीफ सही ।पापा ने अपना सारा जीवन झोक दिया।
फिर उनके जलन को राहत कैसे मिले ,इसमें हम जलने लगे।उनके सपने पूरी करने लगे।
ना उन्हें मालूम था ना हमें की इन सपनो की कीमत क्या होगी ? उनके  सपने ने वो सब कुछ दिया जो वो मेरे लिए चाहते थे  ,पर कीमत क्या थी ?
दुरी  विछोह …

कई बार कुछ ज्ञानी दोस्त ज्ञान देतें है ,अरे भाई कोई बिज़नेस कर लो ,।मुर्गीफार्म खोल लो , खेती करो ।रेस्टॉरेंट चलाने के बारे में सोचो ।ब्यूटी पार्लर ,कोचिंग सेंटर फ़लाना ढामकान नए स्टारअप अपने शहर में रह कर कर सकते हो ।पैसा कमा सकते हो ।माँ -बाप भी साथ रह सकतें है ,तुम भी ख़ुश माँ -बाप भी ।
भाक साला यहाँ मेरे माँ -बाप ने इतना त्याग मुर्गीफारम के लिए किया है क्या ? ज्ञानी बनते हो कि खेती में काफी संभावना है ।मेरे माँ -बाप ने कभी खेत में ठीक से काम करवाया मुझसे ? क्या अब वो देख पायेंगे मुझे खेतों में झुलसते ?और हमसे होगा क्या ?
 गिन कर तो हम तीन बार भवें बनवाए ,पार्लर क्या ख़ाक खोलेंगे ?
और रही बात कोचिंग की तो कभी बिहार आओ ,आँखे फट जायेंगी तुम्हारी ।ज्ञान देते हो ।

हमें भी ज्ञान आता है पर …
सब छोड़ कर वापस वहां तक जाना उफ्फ्फ ,फिर से अपने बच्चे को इस सपने के जाल में झोकना है
हम जहाँ से है वहॉं इंजीनियर तो बहुत हैं पर ,ढंग की कोई कम्पनी नहीं ।अब ऐसे में वो जो सपने कभी माँ बाप से होते हुए मेरे हो गए उन्हें छोड़ कर कहाँ जाऊँ ?

लोग कहते है कि हमारी सवेंदना मर रही है ।हम निर्मोही हो रहे है ।
पर ,क्या सिर्फ हम ही सवेंदनहीन हो रहे है ?
क्या आप (माँ -बाप ,सगे सम्बंधी )मोह में हैं ?

हाँ आप तो हैं मोह में ,अपनी धरती से ,अपने गांव से ,हमारे घर से ।
हमें उड़ने का ख्वाब दिखा कर ,हमें निर्मोही बना कर आप कहते हैं कि ,सिर्फ हमारी संवेदनाये मर रही है ।
क्या आप कभी ये नहीं सोचते कि जो बीज हमने अपने बच्चे में बोया उसको पेड़ बनाने में ,उसपर फल लाने में कितने उसके अपने दूर हो गए ,कितने उसके सपने मर गए ।
क्या आपको नहीं लगता कभी हमको भी अपना कम्फर्ट ज़ोन छोड़ कर उड़ना चाहिए ।अपने बच्चों के पास होना चाहिए ।

संवेदनाए दोनों की मर रही है इंतज़ार में ……

Thursday, 24 May 2018

माँ!!!

हम दोनो को धड़कने एक साथ चल रहीं थीं।धड़धड़ -धड़धड़ -धड़धड .......
एक पल को तुम्हें सीने से लगाए मैं सोच में पड़ गई कि कहीं ये मेरा भ्रम तो नही ।ये कैसे हो सकता है ?
मैंने थोड़ी देर के लिए अपनी साँसे रोक ली और फिर से हम दोनो की धड़कने गिनने लगी ।इतने में मेरी साँसे फूलने लगी ।मैंने ज़ोर से एक साँस बाहर हवा में फेंकी और दूसरी अपने अंदर भर ली ।
इस क्रम में तुम थोड़ा हिले और फिर मुझसे लिपट कर सो गए ।मुझे अपनी हरकत पर हँसी आ रही थी ।भला साँस बंद करने से भी धड़कने रूकती है ।काउंटिंग शुरू ही करनी थी तो कुछ और सोच लेती ।

ख़ैर पागल लड़कियों का कुछ भरोसा नही होता ,अनुलोम -विलोम तो होता नही साँसो की गिनती चाहतीं हैं ।
मेरा दिमाग़ अब भी गुना भाग में लगा है ऐसे कैसे एक साथ धड़क -धड़क -धड़क ।हमदोनो की प्लस रेट तो अलग है ।
मेरी प्रति मिनट साठ से अस्सी के बीच होगी और तुम्हारी  एक सौ तीस -एक सौ चालीस के बीच ।ऐसा कैसे हो रहा है ।एक पल को तो इन गिनती के चक्कर में मेरी साँसे भारी होने लगीं थी ।

फिर मैंने इन साँसो के खेल से ध्यान हटाया ।सोचा हो सकता है मैं इसके प्रेम में हूँ श्याद इसलिए मेरी धड़कने तेज़ चल रहीं है ।इसके साथ चल रहीं है ।मेरी एक -एक धड़कन इसके साथ चलना जो चाहती है ।

क्या ?

हाँ सही तो सुना आपने ।मेरी एक -एक धड़कन इसके साथ चलना जो चाहती है ।
चाहे भी क्यों ना माँ जो हूँ मैं इसकी ।
“माँ “
मेरे सत्यार्थ की माँ ,मेरे इशु की माँ ,मेरे मीर मस्ताना मेरे राजा ,सोनू ,मोनु ,जान सबकी माँ ।बस माँ ।

हवा में इतने ऊपर लटके तुम्हें अपने सीने से लगाया जाने मैं क्या -क्या सोच रही थी ।था भी तो नही कुछ करने को ।गोद में तुम सामने टँगी तुम्हारी फ़ोल्डेबल क्रिब आसपास बेसुध पड़े सहयात्री ।

जाने कब आँखे मूँदे -मूँदे ,सोचते -सोचते तुम्हारे जन्म तक पहुँच गई ।तुम्हारा अचानक आ जाना हम तीनो के लिए कोस्टर राइड जैसा था ।ख़ुशी ,चिंता ,विश्वास ,उल्लास और प्रेम ।
तुम्हारे घर आने के बाद डॉक्टर का हर कुछ दिन पर कॉल आता कि सब ठीक है ना ।मैं कैसी हूँ ? डिप्रेसन की समस्या तो नही हो रही ?मेरा जबाब होता -ना।सब ठीक है ।

डिप्रेसन ? और वो भी तुम्हारे होने पर ?
हाँ ,डिप्रेसन ।श्याद मुझे हुआ हो और मालूम ना चला हो ।श्याद लाखों माताओं को होता हो और मालूम ना चलता हो ।

डॉक्टर ग़लत तो नही पूछती थी ।क्यों ना हो डिप्रेसन ?
अब तक जो दो दिल धड़क रहें थे वो फिर से एक हो गया ।जो अंदर भरा हुआ था वो ख़ाली हो गया ।जो मेरे ख़ून से सींचा जा रहा था ,जो मेरी साँसो से चल रहा था ।जो एक नाम के अंबेलिकल कॉड से जुड़ा था ,आज उसी कॉड से अलग होते समय दर्द इतना जैसे मेरा मर जाना ।

दुःख तो होता होगा ।बहुत होता होगा ।ऐसा जैसा किसी के जाने का दुःख ।तभी तो श्याद गाँव में रिवाज है बारह दिन तक कुछ ना करने का ,छूत लगने का ।पर श्याद तुम्हारे होने के असीम ख़ुशी और सुख में हम वो जाने का दुःख भूल जातें है ।
सच तो ये भी है ,ये जाना तुम्हारे साथ बहुत कुछ लेकर आता है ,ख़ुशी के आँसू ,असीम प्यार ,ढेर सारा आशीर्वाद और जीवन का चक्र ।

Tuesday, 22 May 2018

आज बात हॉलैंड की ।एक मिनट रुकिए मैं यूरोप वाले हॉलैंड की बात नही कर रही ।अमेरिका में भी एक हॉलैंड है ।है ये अमेरिका में पर इसकी ख़ूबसूरती यूरोप के हॉलैंड जैसी हीं है ।ऐसा मेरे एक दोस्त जो यूरोप हो आए है उन्होंने ने बताया ।

बात करते है इस हॉलैंड की तो जब यूरोप से डच लोग (नीदरलैंड के लोग )अमेरिका आए तो अपनी सुबिधा और प्रकृति अनुसार अमेरिका के अलग -अलग भाग में बस गए ।वैसे तो डच अमेरिका के हर भाग में थोड़े -बहुत संख्या में मिल जायेंगे पर किसी -किसी भाग में इन्होंने अपनी कॉलोनी बना ली है ।मतलब वहाँ इनकी संख्या ज़्यादा है ।आपको याद होगी मेरी वर्जिन्या ट्रिप ।

इसे ऐसे समझे ।जैसे हम भारतीय अमेरिका आ गए ।मैं बिहार की तो मैं और दूसरे बिहार के लोग साथ मिलकर अमेरिका के किसी एक भाग में जा बसते है ।ऐसे तो भारतीय अमेरिका के हर प्रांत में है पर इनकी संख्या न्यू जर्सी ,टेक्सस और कैलिफ़ोर्नीया के कुछ भाग में ज़्यादा है ।

हाँ तो फिर आते है हॉलैंड की तरफ़ ।ये मिशिगन राज्य में लेक मिशिगन के किनारे बसा हुआ है ।छोटी जगह है पर हर तरफ़ फूल हीं फूल ।ट्युलिप के फूल हॉलैंड की पहचान है इसलिए यहाँ ज़्यादातर ट्युलिप हीं आपको दिखेंगे ।मई महीने में यहाँ ट्युलिप फ़ेस्टिवल भी होता है ।जिसे देखने काफ़ी लोग आते हैं।

हमलोग भी पहुँच गए इस फ़ेस्टिवल में ।इंडीयाना मेरे ठिकाने से कुछ तीन साढ़े तीन घंटे की दूरी पर हॉलैंड शहर है ।दो दिन के लिए हम भी पहुँच गए वहाँ ।एक दिन में भी आप घूम कर आ सकते हैं पर ठीक से घूम नही पाईएगा ।भागमभाग हो जाएगी।

हमलोग क़रीब डेढ़ दो बजे यहाँ पहुँचे।अड्रेस “वेलधीर टूलिप गार्डन “का ही डाला था ।एंट्री फ़ी दस डॉलर पर पर्सन ।तीन छोटे -छोटे विंड्मिल और ट्युलिप से भरा खेत ।सत्यार्थ ने तो ऊधम मचा दी ।
फूल तोड़ने पर ढाई सौ डॉलर फ़ाइन था ।लगभग एक घंटे रुकने के बाद जैसे तैसे बाहर आए तो सत्यार्थ बाबू अपना एक जूता गिरा चुके थे ।
बाहर कुछ गिफ़्ट शॉप थे ,जिसमें लकड़ी के बने टूलिप और जूते बिक रहे थे ।साथ ही चीनीमिट्टी के ख़ूबसूरत बर्तन भी ।

यहाँ से फिर डाउंटाउन को निकले ।शाम को फ़ायर वर्क्स और कुछ प्रोग्राम थे जो बाद में मौसम ख़राब की वजह से कैसिल हो गए ।मौसम जो ख़राब हुआ कि हमलोग भाग कर होटेल आ गये ।हल्की धूप थी पर वो कँपाने वाली हवा की मत पूछिए ।सत्यार्थ की तो आँखो से पानी आने लगा था ।

दूसरे दिन मौसम अच्छा था ।सुबह हल्की बारिश हुई थी पर ठंड कम थी ।आज हमलोग  “विंड्मिल आईलैंड गार्डन “गए ।हॉलैंड की दूसरी पहचान विंड्मिल और लकड़ी के जूते भी हैं
एंट्री फ़ी यहाँ भी दस डॉलर पर पर्सन ।ट्युलिप से भरे बाग़ में दो विंड्मिल लगे थे ।एक विंड्मिल तो पुराना होने के बावजूद आज भी काम कर रहा था ।उसका अलग से आधे घंटे का टूर था ।अंदर जाने पर इसकी मदद से कैसे अनाज की कुटाई ,छटाई और पिसाई होती है एक महिला गाइड बताए जा रही थी ।
इसके बाद हम डाउंटाउन आ गए ।कुछ एक घंटा यहाँ बिताने के बाद हमलोग “हॉलैंड स्टेट पार्क “जो कि लेक मिशिगन के किनारे है वहाँ गए ,”हॉलैंड हॉर्बर लाइट “देखने ।ये इस शहर का पहला लाइट्हाउस है ।लाल रंग के होने के कारण इसे “बिग रेड “नाम से भी पुकारते है ।

और इस तरह हॉलैंड की यात्रा सम्पन्न हुई ।यात्री अपने घर को लौट आए ।
कुछ तस्वीरों के ज़रिए आप की भी यात्रा शुरू होती है अब ।




Saturday, 14 April 2018

राम और रेप !!!!

पिछले कुछ दिनो से सोशल मीडिया पर एक ही चर्चा है -“राम और रेप “
दोनों ही नया मुद्दा नहीं है ,न ही दोनों पर किसी भी सरकार ने कभी ढंग का कोई निर्णय लिया।सरकार की क्या बात करे? हमने ,हमारे समाज ने भी तो बस हो -हल्ला ही किया।मुद्दे दर मुद्दे भटकते रहे।या फिर भटकाए जाते रहे। 

राम ने स्त्री सम्मान के लिए जानवरों ,माफ़ कीजिये मेरा मतलब बंदरो ,रीछों से है की मदद से शक्तिशाली रावण का वध कर दिया।जबकि उसने तो बस उनकी पत्नी का अपहरण किया था। और हम... 

हम ना तो भगवान् है ना बन सकते है ,इसलिए तो आज कई स्त्रियों ,बच्चियों के शारीरिक दोहन को भी राम का रंग दे रहें हैं।हम उन कथित जानवरों से भी नीच है जिनका अपना कोई विवेक नहीं।जिन्हे बस खून की प्यास है। 
“ओह !राम ने सबको बाँट दिया”

वहीं कभी जाति का दायरा मिटाने  के लिए निचले तबके के लोगो ने ,अपने नाम में राम लगाना शुरू कर दिया था।शायद ये सोच कर कि ,राम सबके हैं।मूर्ख लोग धर्म के जाल को समझ ही नहीं पाए। 

धर्म ने इस कदर पागल बना रखा है कि ,इसकी मिशाल नीचे लगी तस्वीर है। 
तस्वीर राजापट्टी (सारण जिला ) के एक चौक की है।यहाँ बाबा साहेब जी की मूर्ति की स्थापना हुई।कुछ सवर्ण गवारों को ये बात हज़म नहीं हुई।उन्हें लगा उनके इलाके में किसी निचले तबके के इन्शान की मूर्ति कैसे ? अपने दल के साथ उन्होंने मूर्ति के सर को तोड़ने की कोशिश की।कालिख पोता।

नालायकों को कहाँ मालूम की वो खुद पर कालिख पोत रहें है।खुद का मस्तिक ,विवेक धर्म के नाम पर कूट रहे है। 
अच्छा है अम्बेडकर आप नहीं रहे ,वरना धर्म का ऐसा नंगा नाच देख कर आप खुद अपने मुँह पर कालिख पोत लेते।
ऐसे में आपके जयंती की क्या शुभकामनायें। 


Sunday, 28 January 2018

बिहार में सर्दी !!!

बिहार में सर्दी रानी जाते -जाते रह गईं।लगा था सरस्वती पूजा के बाद दिन खुलने लगेगा ,पर यहाँ तो छब्बीस जनवरी से सूर्य देवता लगभग ग़ायब से ही रहे हैं ।हर घर के लोग बाहर घूर लगाए बैठे हैं ।घर तो छोड़िए लोगों ने सड़कों को भी नही छोड़ा है ।
कल कुछ काम से बेतिया जाना हुआ ।सुबह के दस बज चुकें थे और चारों तरफ़ धुँध ही धुँध ।इस मौसम में भी कुछ किसान खेतों में गन्ना छील रहें हैं तो ,कुछ बच्चे बकरी ले कर निकल पड़े हैं ।मुझे थोड़ा अफ़सोस हुआ ।
भाई से पूछी ,ऐसे मौसम में गन्ना छीलने की क्या ज़रूरत ? क्या एक -दो दिन रुक कर ये लोग नही कर सकतें ?
भाई बोला -बहन किसान के लिए फ़सल से ज़्यादा कुछ महत्वपूर्ण नही होता ।फ़सल ही उसका जीवन है ।जब जीवन ही नही तो क्या ठंड क्या बारिश ।इनके गन्ने का नम्बर लगा होगा मिल में ,इसकी वजह से ये परिवार इस ठंड में खेत में लगा हुआ है ।

कुछ आगे जाने पर लोगों ने लगभग सड़क को ही घर -दुआर बना रखा था ।सच पूछिए तो इस बार मुझे आपने गाँव में गंदगी ज़्यादा दिख रही थी।लोगों ने सड़कों पर ही घास-फूस ,खर -पतवार फैला रखा था ।उनके मवेसी उसी पर लेटे हुए थे ।कही गोबर तो कहीं राख ।इनके बीच आग तापते लोग ।कई जगह तो ड्राईवर को गाड़ी मोड़ने में भी दिक़्क़त हो रही थी।लोगों ने खादर ,पतवार सड़क पर ही जमा कर रखा था ।

 ये सब देख कर मैंने भाई से कहा - अपने गाँव के लोग बहुत गंदगी में रह रहें हैं ।ऐसे में तो बीमारी फैल जाएगी।
भाई बोला गंदगी ?
 कहाँ दिख रहा है तुम्हें बहिन ? थोड़ा इनके नज़रिए से भी देखो ।ये जो तुम गंदगी कह रही हो ,ये सब जैविक चीज़ें हैं ।आसानी से सड़ गल के खाद बन जायेंगी ।फिर इन लोगों के काम आ जायेंगी ।साथ हीं इनसे कभी कोई बड़ी बीमारी नही होगी ।
“गंदगी तो तुम फैला रही हो डाइपर के रूप में " और हँसने लगा ।
वहीं दूसरी ओर तुम बताओ ,जिसको दुआर नही ।झोपड़ी का घर है ।मवेसी हैं ।इतनी ठंड में वो अपने जानवर कहाँ बाँधे ? जलावन कहाँ से लाए ? ये जो तुम खर -घास सड़क पर देख रही हो ,उसपर दिन में उनके मवेसी रहेंगे ,साथ ही उनके जलावन का इंतज़ाम भी हो जाएगा ।
इनके पास हीटर तो है नही जो जला कर ताप लिया ।अब ऐसे में थोड़ा राख फैल भी जाता है तो क्या हो गया ?

इस तरह अपनी तकलीफ़ और इन लोगों का दर्द देख कर सर्दी माता से नम्र निवेदन है -हे माई ! अब तो दया करो ।
कुछ तस्वीरें -