Tuesday, 13 November 2018

लक्ष्मी किसे नहीं भाती ? तभी तो इनके आगमन की तैयारी में पूरा परिवार महीनों से जुटा रहता है ।जहाँ महिलायें घर की सफाई में लगी रहती है वही पुरुष और बच्चे अपने आस पास की गंदगी को साफ़  करने में लगे रहते हैं ।

मुझे याद है हम लोग सरकारी आवास में रहते थे फिर भी लगभग हर साल माँ खुद के पैसों से घर की रंगाई करवाती ।कई    बार घर साफ़ होता तो बस बहार की चार दीवारी की रंगाई होती। इसके लिए हम एक ही आदमी को बुलाते बाकी हम भाई बहन ही कर लेते थे। बड़ा अच्छा लगता जब रामराज मिट्टी का घोल दीवारों पर चढ़ता। दिवार के साथ लगभग हम भी रंग गए होते पर इस समय सब माफ़ था। कई बार रामराज मिट्टी और चुना का अंदाजा नहीं लगता ,कम पड़ जाता तो हम भाग कर बलराम चाचा की दूकान पर जातें। दौड़ कर चुना ,मिट्टी ले आतें।

फिर तो देखा -देखी और माँ के प्रोत्साहन से कॉलोनी के और लोग भी अपनी दिवार बहार से चमका लेते। सबके घर एक जैसे हो जातें।इसका कारन एक तो रामराज मिट्टी दूसरा पोचरा का कुचा। कॉलोनी में जिसके घर का पोचरा हो गया होता वो बचा हुआ कुचा बगल वाले को दे देता। इससे कभी कभार कुचा खरीदने का दाम पटाखों में लग जाता।

बलराम चाचा की दुकान कई मामलो में प्रिय थी। वहाँ रंगो के अलावा रस्सी ,लट्टू ,और छोटे -छोटे जानवर जैसे खरगोश ,चूहा ,कबूतर आदि भी होते। मैं जाती थी यहाँ झाड़ू ,रस्सी या रंगो के लिए पर कभी टाइम से आती नहीं थी। रुक कर कभी खरगोश तो कभी चूहा देखने लगती।

उम्मीद है आपके घर की भी सफाई हो गई होगी। सफाई यंत्र झाड़ू का लक्ष्मी पूजा के दिन बड़ा महत्व है। लोग इस दिन इसे खरीदते भी है लक्ष्मी मान कर। कई जगह तो इसकी पूजा भी की जाती है।
सफाई हो गई है तो अब देर किस बात की ,दिए ,मुंमबत्तियों की दुकान सजी है। जाइये खरीदिये और अपने घर को रौशन कर दीजिये।
आपने आस -पास का अँधेरा मिटा कर प्रेम ,सद्भाव की रौशनी कीजिये। मिठाइयाँ  खाइए ,पटाके  छोड़िये पर साथ ही प्रदुषण का भी ख्याल रखिये। स्वस्थ  बसंतपुर तो स्वस्थ हम सब लोग।

आप सभी को दीपावली की बहुत -बहुत शुभकामनायें। माँ लक्ष्मी की कृपा आप सबके के साथ मुझ पर भी बनी  रहे। 

Sunday, 4 November 2018

मध्यस्थ (मुनि क्षमसागर जी ,फ़्रेंज काफ़्का )!!!

मैं परिवर्तन में जीता हूँ
और
मौत से बेहद डरता हूँ
यह सोचकर
कि शाश्वत में जीना-मरना
दोनो मुश्किल है।

खिड़की के पीछे से कोई कह रहा था ,खिड़की के इस पार इसपर  झुकी लता फूल बन मुस्कुराई और खिड़की के भीतर झाँक कर बोली ,
मुझे मौत में जीवन के फूल चुनना है
अभी मुरझाना टूटकर गिरना
और
अभी खिल जाना है
कल यहाँ आया था कौन ,कितना रहा
इससे क्या ?
मेरे जाने के बाद लोग आएँ
अर्थी सम्भाले
कंधा बदले
इससे पहले मुझे ख़ुद संभलना है
अभी तो मुझे संभल -संभल कर रोज -रोज जीना और रोज -रोज मरना है ।

खिड़की के भीतर से आई आवाज़ और खिड़की से लिपटी लता की बात सुन रही खंडहर दीवार में चुनी जर्जर खिड़की हवा से खड़खड़ा उठी ।उसकी खड़खड़ाहट से भीतर और बाहर के दोनो जीव उससे लिपट जाते है ।उन्हें डर है कि कहीं ये उनके मिलन का आख़िरी द्वार टूट ना जाय ।

खिड़की दोनो तरफ़ के भाव को बरसों से जानती है ।अपने कबजो के हिलते कील के सहारे चो-चर करती हुई कहती है
सजीव जीवों का काया पलट हो रहा है ।तुम्हें मालूम नही क्या

मरने की चाह हीं दरअसल समझ की शुरुआत का पहला संकेत है ।

तुम दोनो मेरे सहारे एक दूसरे को जाने कब से जीवन दे रहे हो फिर भी मौत का इंतज़ार ।किसकी मौत का इंतज़ार है तुम्हें ?
इस दीवार के एक भाग से जकड़ी मैं कब तक मध्यस्थ रहूँगी ?क्या मेरे बैग़ैर तुम नही मिल सकते ? कहीं मेरे  द्वारा बनी ये दूरी हीं तुम दोनो जीवन तो नही मान बैठे ?
तुम सारे कीड़े -मकोड़े ,संबंधो के बीच
पहले एक दीवार ख़ुद खड़ी करते हो
फिर उसमें एक खिड़की लगाते हो
पर ज़िन्दगी भर क़रीब रहकर भी
खुल कर कहाँ मिल पाते हो ।

खिड़की के भीतर से फिर आवाज़ आई ,हमारे चाहने से क्या होता है ?ब्रह्मांड आपनी तरफ़ सबको खींच रहा है काठ की  खिड़की ।हम चाहे या ना चाहे
जीवन में अलग रहते हुए भी हर जीव कहीं ना कही किसी से जुड़ना चाहता है
किसी भी समय ,परिस्थि ,मौसम ,अवस्था में ,ज़िम्मेदारियों के बावजूद हर आदमी कम से कम एक
स्नेहपूर्ण बाँहों की ओर खुलने वाली
खड़की चाहता है ।

खिड़की जीव के बात से ख़ुद पर इठला रही है ।इतनी ख़ुश कि अपने पल्लो को मानो पंख समझ उड़ जाना चाह रही है ।
एक अकेला कील जो अब तक खिड़की का प्राण बना था उसने खिड़की को मुक्त कर दिया ।हमेशा हमेशा के लिए ।
चर्रर्रर्र की आवाज़ के साथ जुदा होती खिड़की बोली ,
हे तड़पते जीवों मेरे अंदर और बाहर के सुनो ,मैं
गंतव्य यात्रा पर निकल चूकी हूँ।
बार -बार तुम पूछोगे कि कितना चलोगे ?कहाँ तक जाना है
मैं मुस्कुरा कर आगे बढ़ जाऊँगी
किससे कहूँ कि कहीं तो नही जाना
मुझे इस बार अपने तक आना है ।

Tuesday, 23 October 2018

मक्किनक आईलैंड !!!

अमेरिका जैसे विकसित देश मे एक ऐसी भी जगह है जहाँ सब कुछ होने के बावजूद कोई मोटर गाड़ी नही चलती ।आज भी यहाँ घोड़े गाड़ी ,हाथ गाड़ी और साईकिल हीं चलती है ।
क्या कहा आपने ,सड़क ही नही होगी तो कैसे चलेगी गाड़ी ?
जी नही ऐसा बिल्कुल नही है ।अमेरिका की लगभग हर एक गली -कुचें सड़कों से पटी पड़ी है ।यहीं तो वजह है कि यहाँ धुल -मिट्टी नही दिखतीं और मेरा सत्यार्थ इन पर गिर -गिर कर नए -नए घाव लेता रहता है ।

इस जगह पर तो बक़ायदा हाईवे भी है ।हाईवे का नाम एम-185 है ।
जगह इतनी साफ़ और सुंदर कि यहाँ की कुल आबादी से ज़्यादा पर्यटक यहाँ आते है ।
इस ख़ूबसूरत जगह का नाम है -मक्किनक आइलैंड ।मिसिगन राज्य का एक हिस्सा जो लेक हूरोंन का हिस्सा है ।मिसिगन तो आपने आप मे हीं प्राकृतिक ख़ूबसूरती से भरा हुआ है ।यहाँ के लेक मानो समुद्र हो ।पानी इतना साफ़ कि कई ख़ूबसूरत समुन्दर इसके आगे पानी भरे।

ऐसे ही राज्य के मक्किनक आईलैंड तक जाने के लिए आपको फेरी की मदद लेनी होती है ।मैकनउ सिटी से आपको फेरी लेनी होगी जो कि  लगभग 20-25 मिनट मे इस आईलैंड पर उतार देते है ।जैसा कि मैंने पहले बताया यहाँ कोई पेट्रोल /डिजल वाली गाड़ी नही चलती तो आप यहाँ पैदल ,साईकिल (रेंट करके ) घोड़ा गाड़ी से घुम सकतें हैं ।पुरा आईलैंड हीं 8 माईल मे फैला है तो आसानी से एक दिन मे घुम सकतें है ।घुमने की भी कुछ ही जगहें है ।बाक़ी आप किसी भी कोने मे रुक कर घंटो बिता सकतें हैं ।इसे निहार सकतें है ।

अच्छा तो अब बता देती हुँ कि यहाँ गाड़ियाँ क्यों नही चलती ? प्रदूषण और लोगों के स्वस्थ को देखते हुए यहाँ 1890 से हीं गाड़ियाँ बैन हैं ।
हमने भी यहाँ उतर कर साईकिल रेंट किया ।अभी आधे से भी कम सफ़र तय किया था कि बारिश शुरू हो गई ।मैंने शतेश को कहा चलते रहते है इतनी मे ज़्यादा नही भीगेंगे और ऐसे ख़ूबसूरत जगह पर बारिश मे साईकिल चलाने का मज़ा अलग ।शायद बारिश ने मेरी बात सुन ली और दिल पर ले लिया ।बोला अब तो तुम्हें भीगो के ही रहूँगा ।थोड़ी देर में वो मूसलाधार बारिश की हमलोग साईकिल छोड़ ,सत्यार्थ को ले एक पेड़ की तरफ़ भागे ।अब पेड़ से ये बारिश अड़े?
सामने एक घर मे पार्टी चल रही थी ।उसका पैटियो बाहर ख़ाली था ।हम सोच रहे थे कि जाए या नही तभी दो लड़के लगभग अपनी साईकिल फेंकते हुए उधर भागे ।हम भी उनके पीछे पेटियों के अंदर दाख़िल हो गए ।किसी ने कुछ नही कहा ।करण उधर वो एकलौता घर था कोई और कहाँ रुकता ?

यहाँ देखने को अर्क रौक ,फ़ोर्ट मकनिक ,देविल किचेंन ,मकनिक ब्रिज और ख़ूबसूरत घरों के साथ लेक का किनारा है ।
अच्छा यहाँ आने से पहले एक दिन हमने मकनिक सिटी मे बिताया ।यहाँ होटेल के मामले मे हमने आज तक के सफ़र मे सबसे बड़ा धोखा खाया था ।वाटरपार्क वाला होटेल बूक किया था और वाटर पार्क ही बंद था ।कूछ काम चल रहा था ।साथ ही होटेल के कई हिस्से मे काम चलने की वजह से एकदम कोने का रूम दे दिया था ।इसकी कहनी कभी और पर ये शहर भी प्यारा लगा मुझे ।यहाँ रात को हमलोग तारें देखने गए थे ।एक पल को हमें हीं तारें दिख गए पर मज़ा आया ।यहाँ का एक दुकान बड़ा मज़ेदार लगा ।
साथ ही अगर आप यहाँ या मक्किनक आईलैंड आए तो यहाँ के हौट फ़ज खाना ना भुले ।


Monday, 22 October 2018

माता का न्याय !

नवरात्रि की शुरुआत हो चुकी है। और इसी के साथ माता रानी के आगमन का उत्साह मन को उल्लास से भर रहा है। ऐसे में कलकत्ता का दुर्गा पूजा और हाल में वहाँ घटी एक वीभत्स घटना से मुझे दो क़िस्से याद आ रहें हैं। दोनों ही क़िस्से लगभग एक समान है बस देश काल अलग रहा है। 

एक तो ग्रीक कथा है और दूसरी अपने भारत के पश्चिमी चंपारण की कहानी है। पश्चिमी चंपारण, बिहार का एक ज़िला है। 
ग्रीक कथा कुछ इस प्रकार है, 
मेड्युसा नाम की एक लड़की थी। वह बहुत रूपवान हुआ करती थी।वह ग्रीक देवी, “एथेना” के मंदिर में पुजारन थी और वहीं रहती थी।मंदिर में आने वाले कई लोग तो उसे ही देखने आते थें। उसकी सुंदरता का बखान करते ना थकते। उसके बालों को वे एथेना देवी के बालों से भी सुंदर कहते। मेडूसा के रूप की ख्याति पोसाइडन तक भी पहुंची। जो की इस कथा के अनुसार एथेना देवी का प्रेमी और समुद्र का देवता था। उसने जब मेड्युसा को देखा तो उसपर मोहित हो उठा। मेड्युसा की पोसाइडन में कोई रूचि नहीं थी। वह कुंवारी ही रहकर एथेना के मंदिर की पुजारन बनी रहना चाहती थी। एक दिन पोसाइडन शाम को मौका पा मेड्युसा की तरफ़ बढ़ा। ऐसे में बचने के लिए मेड्युसा मंदिर में भागी। उसने मदद के लिए एथेना देवी से गुहार लगाई। लेकिन देवी एथेना ने उसकी कोई मदद नही की। बलात्कार के बाद जब पोसाइडन जा चुका था तो देवी एथेना वहां आई। मंदिर में दुष्कर्म की सजा के रूप में वे बिना जाने मेड्युसा को ही शाप दे डाली की आजीवन वह अकेली रहेगी। उसके जिस सुंदर बालों पर लोग रीझते हैं वह भी साँप बन जायेंगे। 
पर जैसे ही देवी को अपनी गलती का अहसास हुआ। उन्होंने उसे यह वरदान दिया कि जो भी उसकी आँखों में ग़लत दृष्टि से देखेगा वह पत्थर का हो जायेगा। 

अब बात करती हूँ, पश्चिमी चंपारण के क़िस्से की, 
इस ज़िले के सहोदरा नामक स्थान पर एक ग़रीब लड़की रहती थी। वह बहुत ही सुंदर थी। गाँव में उसकी सुंदरता के क़िस्से कहे जाते। एक दिन वह बकरी चराने निकली तो गाँव की सीमा के पार कुछ लड़के उसे घेर लिए। उसने उनसे काफ़ी विनती की लेकिन वे मानने को तैयार ना थे। ऐसे में लड़की, माँ दुर्गा से प्रार्थना करने लगी कि हे माँ! मेरी रक्षा करें। माँ दुर्गा ने उसकी रक्षा स्वरुप उसे उसी क्षण पत्थर का बना दिया। और उसे पूजित होने का वरदान दिया। तब से आज तक उस लड़की की पूजा माता सहोदरा के रूप में होती हैं। इस मंदिर की ख़ास बात यह है कि यहाँ पुजारन भी महिलाएँ ही होती हैं। यानि यहाँ की एक ख़ास समुदाय, “थारु” की ही महिलाएँ ही पुजारिन चुनी जाती हैं।

दोंनो ही क़िस्सों को याद कर सोचती हूँ कि देवी ने पीड़िता को ही सजा दी… क्या देवी माँ उस समय महिषासुर जैसा न्याय नहीं कर सकतीं थीं ? कई सवालों के जबाब सुलझे-अनसुलझे यूँ ही भटकते रहते हैं। फिर भी अगर आप बिहार जाए, चंपारण जाने का मौक़ा मिले तो सहोदरा माई के दर्शन को ज़रूर जाएँ। 


Wednesday, 25 July 2018

सेंट लूई !!!

इंडीऐनापोलिस से सेंट लूई की दूरी बाई ड्राइव कुछ साढ़े तीन घंटे की है ।रास्ते में अगर एक -दो बार रुके तो ये समय चार घंटे से पार हो जाता है ।रुकना तो हो गया ,चले अब सेंट लूई की तरफ़ ।

रास्ते में ख़ूब बड़े -बड़े खेत मिलेंगे ।छोटे -छोटे कल कारख़ाने भी ।तो कुछ जानवरों के तबेले ।फ़सल के मामले में अमेरिका मक्के के लिए जाना जाता है और मक्के की सबसे बड़ी मंडी सेंट लूई में ही है ।
इसके अलावा गेट्वे आर्च ,सेंट लूई चिड़ियाघर ,साइयन्स सेंटर ,बसिलिका चर्च भी काफ़ी प्रसिद्ध है ।छोटे -छोटे पार्क तो भरे पड़े है ।

मिसोरी स्टेट में सेंट लूई मिस्सिसिपी नदी के किनारे बसा हुआ है ।ये शहर प्रवासियों द्वारा ही बसा है ।कुछ लोगों से सुना था ,शाम को ये शहर उतना सुरक्षित नही पर मुझे ऐसा कुछ नही लगा ।हो सकता हो कुछ एक साल पहले एक -आध घटना हुई हो ।
घटना से याद आया ,यहाँ एक काले लड़के को मार दिया गया था।काफ़ी बवाल हुआ था पूरे अमेरिका में इस घटना को लेकर ।
डाउन टाउन में पार्क से लेकर कसिनो तक है ।सत्यार्थ की वजह से हम कसिनो नही जा पाए ।जुआघर में बच्चे ले जाने की अनुमति नही है

गेटवेअर्क  की बात करे तो 630 फीट ऊँचा अर्क अफ़िल टॉवर से कम नही ।क्वीन फ़िल्म में देखा था ना हर जगह से दिखता था ।इसका आर्च का भी यहीं हाल है ,कही से भी दिख जाता है ।कही से मतलब सेंट लूई शहर से है ।

इसके सामने पुराने कॉर्ट के साथ एक पब्लिक लैब्रेरी है ।वही पीछे की तरफ़ अमेरिका की सबसे बड़ी मिसिसिपी रिवर ।नदी के किनारे बैठने को बेंच ,वॉकिंग ट्रेल के साथ कुछ तैरते रेस्टरेंट शाम को और ख़ूबसूरत दिखते हैं ।

प्रसिद्ध चिड़ियाघर फ़ॉरेस्ट पार्क में है ।फ़ॉरेस्ट पार्क न्यू यॉर्क के सेंट्रल पार्क से लगभग दुगुना होगा ।काफ़ी कुछ है यहाँ ।हिस्ट्री म्यूज़ीयम ,साइयन्स सेंटर ,आर्ट म्यूज़ीयम ,कई छोटे इवेंट पार्क ।
 चिड़ियाघर अमेरिका के चंद बड़े फ़्री चिड़ियाघर में से एक है,पर कुछ चीज़ें फ़्री नही है ।अगर आप पास ले लेते हैं तो घूमना आसान हो जाता है ।साथ ही जो चीज़ें फ़्री नही वो भी देख लेते है ।एक छोटी ट्रेन सारे पोईट तक पहुँचा देती है ।उतरिए देखिए फिर ट्रेन पकड़ लीजिए ।

सत्यार्थ को अच्छा लगे इसलिए हम म्यूज़ीयम सब छोड़ चिड़ियाघर गए और गरमी में पटपटा के रह गए ।पति -पत्नी दोनो सिर दर्द से बेहाल ।सलाह तो ये है कि यहाँ आप जुलाई अंतिम के बाद ही जाए ।

खाने -पीने के हर तरह के ऑप्शन है ।भारतीय भोजन की भी कई सारी दुकान है पर ,डाउंटाउन में पार्किंग की बहुत मारा -मारी है ।
अच्छा हुआ यूँ हम दो दिन के लिए गए थे ।पहली शाम को हीं सिरदर्द हो गया ।हमने खाना टू गो “रसोई “ से ऑर्डर किया पर मन ना ठीक होने से होटेल आ गए ।बाद में पिज़्ज़ा ऑर्डर कर होटेल तक मँगवाया ।अगले दिन सोचा ,चलो आज रसोई में खाते है ।पहुँचे वहाँ तो पार्किंग नही ।मुश्किल से दूर एक पर्किंग मिली ।घाम में पसीने से भिंगे वहाँ पहुँचे तो वहाँ कोई पार्टी चल रही थी ,जिससे बाहरी लोग को खाना नही मिल सकता था ।भगवान भी ना बदला लेकर हीं रहता है ।
वहाँ से झल्लाते हुए हम गोकुल रेस्टरेंट पहुँचे ।गायत्री मंत्र के बीच भोजन सम्पन्न  हुआ।
वहाँ से वापस अपने आशियाना की तरफ़ मुड़ चले ।

Friday, 13 July 2018

येंगूलर गायरस !!!!

एक सखी की सलाह पर “वह भी कोई देश है महाराज “किताब मँगवाई ।पढ़ना शुरू किया तो बस पढ़ती गई ।सच में इस किताब की लिखाई बहुत ही रोचक है ।
किताब में बहुत कुछ मज़ेदार है ,जानने योग्य है ।
 एक पक्षी हॉर्नबिल के बारे में भी ज़िक्र है ।लेखक लिखते है हॉर्नबिल जोड़ा नही बदलते ,वफ़ादार प्रेमी माने जाते है ।रूप ही इनका दुश्मन है ।उसके पंखो से नागा अपने मुकुट सजाते है ।साथ ही धनेश यानी इस पक्षी का मांस और तेल कामशक्तिवर्धक माना जाता है ।नीम हकीम ,घूमंतू वैध प्रेमविहीन अंधविश्वासियों को फाँसनेके लिए इस पक्षी का चोंच प्रयोग करतें हैं।

इसे लाइन को पढ़ते समय मुझे अपने विज्ञान की एक शिक्षिका याद आ गई ।एक बार पढ़ाई के क्रम में उन्होंने बताया था ,रेडबैक एक मकड़ी है जो अपने पार्टनर को मेटिंग के बाद खा जाती है ।ये सुबह की प्रार्थना वाला मेटिंग नही ।जानवर भी भला प्रार्थना करतें होंगे ?
हेय, सच में बड़ी मज़बूत हृदय वाली मकड़ी है ये तो यह कह कर मैं और मेरी दोस्त ख़ूब हँसे थे ।

हृदय से एक और बात याद आई उन्होंने ये भी बताया था कि ,केंचुए को पाँच दिल और ऑक्टोपस को तीन ।आप अंदाज़ा लगा ही सकतें है इसपर मैंने और मेरी दोस्त ने क्या सोचा होगा ।
मुझे केचुआ तो बनाना नही था ।ऐसे में प्रशंसा को ही पाँच दिल की मालकीन का ख़िताब दे दिया गया ।पाँच दिल के ख़ातिर उसे केचुआ बनने से भी हर्ज ना था ।हम हँस -हँस के पागल हो रहे थे कि ये बेचारे जीव पाँच -पाँच दिल ले कर करते क्या होंगे ? हमसे एक ही नही संभलता ।

वैसे एक बात तो है ख़ाली दिल ही नही प्रेम और वफ़ादारी में भी कुछ जीव श्याद हम मनुष्यों से आगे है ।ऐसे ही नही एक प्रेमी सारस जोड़े रामायण के आरम्भ का कारण बने ।
प्रेम में डूबे जोड़े को एक शिकारी मार देता है ।महर्षि वाल्मीकि इस घटना को देख कर दुःख से बोल पड़ते है

मा निषाद प्रतिष्ठां त्वमगम: शाश्वती: समा:।
यत् क्रौंचमिथुनादेकमवधी: काममोहितम्॥

कहते है हंस अपने पार्टनर के प्रति सबसे ज़्यादा वफ़ादार होते हैं।ये अपने पार्टनर की हर तरह से मदद करते है ।मसलन घर बनाने ,भोजन लाने ,बच्चों को पालने आदि ।हॉर्नबिल  की तरह ।पर अगर किसी कारण वश इनका पार्टनर नही रहे तो ये वियोग में प्राण दे देते है ।तभी तो शायद हिंदी फ़िल्मों के गाने इनकी उपमा से लिपटे पड़े है ।

यही नही एक और बात बताऊँ ये जो भेड़िया है ना भेड़िया वो भले ही ख़तरनाक हो पर अपने साथी और परिवार के लिए काफ़ी ईमानदार होते है ।अपने पार्टनर के मौत के बाद दूसरा पार्टनर भी नही ढूँढते ।
ये तभी ट्वाइलायट में इनको रखा था क्या ? भगवान जाने पर अब से कोई आपको भेड़िया कहे तो यही सोच के मुस्का दीजिएगा सफल प्रेमी ।

अच्छा अगर आप पेंगविन वाली डॉक्युमेंट्री देखेंगे तो उसमें दिखता है कि ये अपने साथी से कितना प्यार करतें है ।कुछ तो दूर होने पर भी अपने साथी से मिलने का इंतज़ार करते है हाय ! इनको भी विरह होता है ।
हे गंगा माईया तोहे साफ़ हम रखबो
साइयाँ से कर द मिलनवा हो राम ।

मुझे तो लगता है इन जीवों का येंगूलर गायरस वाला हिस्सा हमसे ज़्यादा विकसित है ।वरना जानवर क्या जाने प्रेम भला जब हम विकसित जीव नही समझ पाते ।

Monday, 2 July 2018

अष्टयाम !!!!

अष्टयाम :-

घर जब आई थी तो घूमने फिरने के साथ पूजा -पाठ भी होता रहा ।माँ कि इक्षा थी कि मेरे आने के बाद अष्टयाम करवाए ।
अष्टयाम का वैसे तो मतलब आठ पहर होता है ।यानि कि चौबीस घंटे में तीन -तीन घंटे का एक पहर ।
पर साहित्य के दृष्टिकोण से यह एक कविता का रूप है ।जैसे कविता के ही द्वारा किसी व्यक्ति विशेष ,देवगण का गुणगान करना ।

धार्मिक दृष्टिकोण से अष्टयाम दिन के किसी भी शुभ समय से प्रारम्भ कर ,अगले दिन उसी समय तक भजन -कीर्तन ,पूजा पाठ आदि के द्वारा सम्पन्न होता है ।वैसे तो अमूमन लोग अष्टयाम चौबीस घंटे का हीं करवाते है पर ,कहीं -कही लोग नव दिन का भी भजन -कीर्तन रखते है ।

चौबीस घंटे तक भगवान का भजन -कीर्तन करने के लिए मंडली बुलाया जाता है ।इसमें चौबीसों घंटे बिना रुके राम और कृष्ण का नाम गा कर जपा जाता है ।

“हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे “

मंडप में सारे भगवान विराजमान होते है ।सबकी पूजा होती ।श्रिंगार ,भोग ,संध्या आरती और रामायण पाठ सब साथ में चलता रहता है ।बस भजन में प्रमुख राम और कृष्ण होते हैं ।

ऐसे तो अष्टयाम कई बार देखा सुना है पर इस बार का अष्टयाम कुछ अलग था ।अलग इस मायने में कि ,मैंने आजतक कोई “महिला मंडली “ को गाते नही सुना था ।बहुत से लोगों के लिए भी ये नया था ।कारण ज़्यादातर पुरुष मंडली ही होते है ।

हुआ यूँ था ,मेरे जन्मदिन के अवसर पर इसका आयोजन करने का भाई ने सोचा ।दिन आठ मार्च ,महिला दिवस तो सोचा गया क्यों ना इस बार महिला मंडली हीं बुलाया जाये ।हमने इनके बारे में एक चाचा जी सुना था ।
पर कुछ कारणवश आठ को अष्टयाम नही हो पाया फिर भी मंडली हमने महिलाओं की हीं बाँधी।

महिला मंडली के साथ कुछ पुरुष ढोलक ,झाल अपने वाद्ययंत्र के साथ थे ।महिलायें और पुरुष दोनो “थारु” समाज से थे ।ये लोग नेपाल के तराई क्षेत्र के आस -पास रहते है ।
सबसे विशिष्ट बात ये कि ,इस समाज में महिलाओं को विशेष सम्मान दिया जाता है ।मंदिर में पूजा -पाठ कराने से लेकर घर की ज़िम्मेदारी तक थारु महिलायें बख़ूबी निभाती है ।
सुना था बहुत कर्मठ स्वभाव होता है इनका और सच में देख भी लिया ।
मंडली के लोग ईसकॉन को मनाने वाले थे यानी कृष्ण प्रेमी ।शाकाहारी ,बिना लहसन प्याज़ का ख़ुद से पकाया भोजन करने वाले ।बहुत ही सीधे -साधे लोग थे ।उनके बच्चे पढ़ने में इतने होशियार जाने जंगल के किस स्कूल में शिक्षा लेते थे या फिर शांत दिमाग़ का असर था ।

अष्टयाम बहुत ही अच्छे ढंग से सम्पन्न हुआ ।मैं थोड़ा काम में रहने कि वजह से कई चीज़ें देख ना पाई ।अगर भगवान की इक्षा हो तो फिर इस इस मंडली से मिलने का अवसर मिलेगा ।
आपलोग भी थोड़ा भक्तिमय हो जाय ।आपके लिए कुछ अंश ।
वैसे माँ कहती हैं ,इस यज्ञ की ध्वनि जहाँ तक जाती है ,वहाँ तक का वातावरण शुद्ध हो जाता है ,जागृत हो जाता है ।