Tuesday, 13 November 2018

बाल दिवस 2018!!!!

बाल दिवस की बात हो और बच्चे ना हो ऐसा हो सकता है भला ?
तो चलिए इस बार मिलाते है मेरे गाँव के कुछ बच्चों से ।
वैसे तो ये बच्चे दिन भर मेरे दुआर पर खेलते रहते है पर इनका मेरे घर मे गृह प्रवेश मेरे और भाई के रहने पर ही होता है ।भाई ने कई बार इनको पढ़ाने की भी कोशिश की है ।
बस इनका मेरे घर की लगभग मालकीन बाबिया से नही बनता।करण दरवाज़े पर लगे फ़ुल खेल में तोड़ देना ,बाहर का नल खोल देना या फिर गंदे पैर घर में घुस जाना।

मेरे रहते ये कभी सत्यार्थ के साथ खेलने आते या फिर मुझे डाँस या गीत सुनाने।कभी -कभी ये टीवी देखने भी आतें।बाबिया भुनभुना  कर टीवी बंद कर देती ,इन्हें भगाती तबतक मैं आ जाती।ऐसे में इनकी मुझसे अच्छी दोस्ती हो गई थी ।

इसी बीच मेरा जन्मदिन आया।बाबिया ने घर को बेलून से सजाया था ।भाई ने बेतिया से केक भेजा था ।बाबिया मुझे अगले कमरे से निकाल सजावट कर रही थी।ऐसे में मैं दरवाज़े की सीढ़ी पर बैठ बाहर खेलते बच्चों को देखने लगी।

रुखानी आकर मेरे पास बैठ गई।मैंने उससे पुछा ,रुखानी क्या तुमने कभी केक काटा है ? वो शर्माते हुए बोली ना ।
फिर मैंने उन सब खेलते बच्चों को बुलाया ।सबसे उनका जन्मदिन पुछा पर किसी को ठीक से उनका जन्मदिन नही मालूम था ।थे भी तो छोटे -छोटे ।कोई बोल रहा था फागुन मे तो कोई जेठ ,अगहन ।ऐसे में मैंने सोचा क्यों ना आज इन बच्चों से ही केक कटवाया जाय ।

अब सबका नाम लेकर तो बडेय सोंग गाने मे दिक़्क़त होती तो रुखानी जो सबसे बड़ी थी उसका ही नाम लिया मैंने।मेरी तो हँस -हँस के हालत ख़राब हो रही थी उनको केक पर टूटता देख कर ।
बता नही सकती बच्चे कितने ख़ुश थे और उनसे ज़्यादा मैं ।भगवान इनसब बच्चों के साथ विश्व के तमाम बच्चों को प्यार दे दूलार दे ।ये यूँ ही हँसते मुस्कुराते रहें ।

उदासी!!!

कभी -कभी उदासी बिना वजह आपको उदास कर जाती है।जैसा की आज मुझे कर रही है।आज फिर मेरे एक दोस्त के माता -पिता यहॉं आए और मेरी जलन मेरी उदासी का कारण बन रही है।जलन का अब क्या कर सकतें है। नाम तपस्या होने से धीर नहीं आ जाता।

कैसी विडंबना है हम ग्रामीण परिवेश के लोगों की ,खास कर बिहार से आने वालों युवाओं की ,जो हमारे  माता -पिता हमारे लिए ऊँचा  आसमान देखते है और खुद धरती का साथ नहीं छोड़ते।
बचपन से हमें डॉक्टर, इंजीनियर ,सरकारी अफसर बनाने का ख़्वाब देखते है ।अपने उन्ही ख़्वाबों  के बीज हमारे अंदर बोने लगते है ।इस ख़्वाब में हमने उन्हें कई बार जलते देखा है।उनकी वो जलन हमें आज तक जलाती है ।
ओह ! मेरी वजह से माँ ने तकलीफ सही ।पापा ने अपना सारा जीवन झोक दिया।
फिर उनके जलन को राहत कैसे मिले ,इसमें हम जलने लगे।उनके सपने पूरी करने लगे।
ना उन्हें मालूम था ना हमें की इन सपनो की कीमत क्या होगी ? उनके  सपने ने वो सब कुछ दिया जो वो मेरे लिए चाहते थे  ,पर कीमत क्या थी ?
दुरी  विछोह …

कई बार कुछ ज्ञानी दोस्त ज्ञान देतें है ,अरे भाई कोई बिज़नेस कर लो ,।मुर्गीफार्म खोल लो , खेती करो ।रेस्टॉरेंट चलाने के बारे में सोचो ।ब्यूटी पार्लर ,कोचिंग सेंटर फ़लाना ढामकान नए स्टारअप अपने शहर में रह कर कर सकते हो ।पैसा कमा सकते हो ।माँ -बाप भी साथ रह सकतें है ,तुम भी ख़ुश माँ -बाप भी ।
भाक साला यहाँ मेरे माँ -बाप ने इतना त्याग मुर्गीफारम के लिए किया है क्या ? ज्ञानी बनते हो कि खेती में काफी संभावना है ।मेरे माँ -बाप ने कभी खेत में ठीक से काम करवाया मुझसे ? क्या अब वो देख पायेंगे मुझे खेतों में झुलसते ?और हमसे होगा क्या ?
 गिन कर तो हम तीन बार भवें बनवाए ,पार्लर क्या ख़ाक खोलेंगे ?
और रही बात कोचिंग की तो कभी बिहार आओ ,आँखे फट जायेंगी तुम्हारी ।ज्ञान देते हो ।

हमें भी ज्ञान आता है पर …
सब छोड़ कर वापस वहां तक जाना उफ्फ्फ ,फिर से अपने बच्चे को इस सपने के जाल में झोकना है
हम जहाँ से है वहॉं इंजीनियर तो बहुत हैं पर ,ढंग की कोई कम्पनी नहीं ।अब ऐसे में वो जो सपने कभी माँ बाप से होते हुए मेरे हो गए उन्हें छोड़ कर कहाँ जाऊँ ?

लोग कहते है कि हमारी सवेंदना मर रही है ।हम निर्मोही हो रहे है ।
पर ,क्या सिर्फ हम ही सवेंदनहीन हो रहे है ?
क्या आप (माँ -बाप ,सगे सम्बंधी )मोह में हैं ?

हाँ आप तो हैं मोह में ,अपनी धरती से ,अपने गांव से ,हमारे घर से ।
हमें उड़ने का ख्वाब दिखा कर ,हमें निर्मोही बना कर आप कहते हैं कि ,सिर्फ हमारी संवेदनाये मर रही है ।
क्या आप कभी ये नहीं सोचते कि जो बीज हमने अपने बच्चे में बोया उसको पेड़ बनाने में ,उसपर फल लाने में कितने उसके अपने दूर हो गए ,कितने उसके सपने मर गए ।
क्या आपको नहीं लगता कभी हमको भी अपना कम्फर्ट ज़ोन छोड़ कर उड़ना चाहिए ।अपने बच्चों के पास होना चाहिए ।

संवेदनाए दोनों की मर रही है इंतज़ार में ……

संजीव अभ्यंकर जी गा रहें हैं
उधो मन ना भए दस बीस
दस बीस ,दस बीस ।
इधर मेरा एकलौता मन भी सुख रोग से पीड़ित है।आँख से पानी अभ्यंकर जी के आवाज़ के जादू के कारण है या रोग के ये तो मालूम नही चल पा रहा पर नाक का पानी मन का रोग ही है।
काश सच में दस बीस मन होते ,एक बिगड़ा तो दूसरे का सहारा होता ।ऐसे में छठ पूजा का आना और पीड़ा दे रहा है।
इस बार भी जैसे -तैसे मालूम हुआ कि शिकागो मे कुछ लोग छठ कर रहें है।शाम की अरग मे जाने का सोचा था पर एक तो मन ऐसा उसपर कल एक्सट्रीम वेदर का अलर्ट आ गया।यानी ठंड ज़्यादा होगी ।ऐसे में इस बार शायद छठी मईया की इक्षा नही हमें बुलाने की।

मन बहलाने के लिए छठ गीतों की शुरुआत हुई पर यहाँ तो आलम ये कि हम दम्पती दुःख में डूबते जा रहें थे ।ऐसे में गाना बदल कर चू -चू टीवी लगा दिया गया ,कम से कम सत्यार्थ तो ख़ुश रहे।
जाने क्यों ये छठ सारे व्रत त्योहार के बराबर अकेली याद लेकर आती है ।

ख़ैर पिछले साल की तरह इस बार भी सत्यार्थ के साथ वीडीयो बनाने की कोशिश की है ।छठ के गीतों में आज का गीत भी मुझे ख़ूब प्रिय है।माँ अक्सर गाया करती थी /है ।
इसी के साथ आप सबको छठ पूजा की ख़ूब -ख़ूब शुभकामनाएँ ।छठी मईया ,सूर्य देव हम सब पर कृपा बनाए रखें।
लक्ष्मी किसे नहीं भाती ? तभी तो इनके आगमन की तैयारी में पूरा परिवार महीनों से जुटा रहता है ।जहाँ महिलायें घर की सफाई में लगी रहती है वही पुरुष और बच्चे अपने आस पास की गंदगी को साफ़  करने में लगे रहते हैं ।

मुझे याद है हम लोग सरकारी आवास में रहते थे फिर भी लगभग हर साल माँ खुद के पैसों से घर की रंगाई करवाती ।कई    बार घर साफ़ होता तो बस बहार की चार दीवारी की रंगाई होती। इसके लिए हम एक ही आदमी को बुलाते बाकी हम भाई बहन ही कर लेते थे। बड़ा अच्छा लगता जब रामराज मिट्टी का घोल दीवारों पर चढ़ता। दिवार के साथ लगभग हम भी रंग गए होते पर इस समय सब माफ़ था। कई बार रामराज मिट्टी और चुना का अंदाजा नहीं लगता ,कम पड़ जाता तो हम भाग कर बलराम चाचा की दूकान पर जातें। दौड़ कर चुना ,मिट्टी ले आतें।

फिर तो देखा -देखी और माँ के प्रोत्साहन से कॉलोनी के और लोग भी अपनी दिवार बहार से चमका लेते। सबके घर एक जैसे हो जातें।इसका कारन एक तो रामराज मिट्टी दूसरा पोचरा का कुचा। कॉलोनी में जिसके घर का पोचरा हो गया होता वो बचा हुआ कुचा बगल वाले को दे देता। इससे कभी कभार कुचा खरीदने का दाम पटाखों में लग जाता।

बलराम चाचा की दुकान कई मामलो में प्रिय थी। वहाँ रंगो के अलावा रस्सी ,लट्टू ,और छोटे -छोटे जानवर जैसे खरगोश ,चूहा ,कबूतर आदि भी होते। मैं जाती थी यहाँ झाड़ू ,रस्सी या रंगो के लिए पर कभी टाइम से आती नहीं थी। रुक कर कभी खरगोश तो कभी चूहा देखने लगती।

उम्मीद है आपके घर की भी सफाई हो गई होगी। सफाई यंत्र झाड़ू का लक्ष्मी पूजा के दिन बड़ा महत्व है। लोग इस दिन इसे खरीदते भी है लक्ष्मी मान कर। कई जगह तो इसकी पूजा भी की जाती है।
सफाई हो गई है तो अब देर किस बात की ,दिए ,मुंमबत्तियों की दुकान सजी है। जाइये खरीदिये और अपने घर को रौशन कर दीजिये।
आपने आस -पास का अँधेरा मिटा कर प्रेम ,सद्भाव की रौशनी कीजिये। मिठाइयाँ  खाइए ,पटाके  छोड़िये पर साथ ही प्रदुषण का भी ख्याल रखिये। स्वस्थ  बसंतपुर तो स्वस्थ हम सब लोग।

आप सभी को दीपावली की बहुत -बहुत शुभकामनायें। माँ लक्ष्मी की कृपा आप सबके के साथ मुझ पर भी बनी  रहे। 

Sunday, 4 November 2018

मध्यस्थ (मुनि क्षमसागर जी ,फ़्रेंज काफ़्का )!!!

मैं परिवर्तन में जीता हूँ
और
मौत से बेहद डरता हूँ
यह सोचकर
कि शाश्वत में जीना-मरना
दोनो मुश्किल है।

खिड़की के पीछे से कोई कह रहा था ,खिड़की के इस पार इसपर  झुकी लता फूल बन मुस्कुराई और खिड़की के भीतर झाँक कर बोली ,
मुझे मौत में जीवन के फूल चुनना है
अभी मुरझाना टूटकर गिरना
और
अभी खिल जाना है
कल यहाँ आया था कौन ,कितना रहा
इससे क्या ?
मेरे जाने के बाद लोग आएँ
अर्थी सम्भाले
कंधा बदले
इससे पहले मुझे ख़ुद संभलना है
अभी तो मुझे संभल -संभल कर रोज -रोज जीना और रोज -रोज मरना है ।

खिड़की के भीतर से आई आवाज़ और खिड़की से लिपटी लता की बात सुन रही खंडहर दीवार में चुनी जर्जर खिड़की हवा से खड़खड़ा उठी ।उसकी खड़खड़ाहट से भीतर और बाहर के दोनो जीव उससे लिपट जाते है ।उन्हें डर है कि कहीं ये उनके मिलन का आख़िरी द्वार टूट ना जाय ।

खिड़की दोनो तरफ़ के भाव को बरसों से जानती है ।अपने कबजो के हिलते कील के सहारे चो-चर करती हुई कहती है
सजीव जीवों का काया पलट हो रहा है ।तुम्हें मालूम नही क्या

मरने की चाह हीं दरअसल समझ की शुरुआत का पहला संकेत है ।

तुम दोनो मेरे सहारे एक दूसरे को जाने कब से जीवन दे रहे हो फिर भी मौत का इंतज़ार ।किसकी मौत का इंतज़ार है तुम्हें ?
इस दीवार के एक भाग से जकड़ी मैं कब तक मध्यस्थ रहूँगी ?क्या मेरे बैग़ैर तुम नही मिल सकते ? कहीं मेरे  द्वारा बनी ये दूरी हीं तुम दोनो जीवन तो नही मान बैठे ?
तुम सारे कीड़े -मकोड़े ,संबंधो के बीच
पहले एक दीवार ख़ुद खड़ी करते हो
फिर उसमें एक खिड़की लगाते हो
पर ज़िन्दगी भर क़रीब रहकर भी
खुल कर कहाँ मिल पाते हो ।

खिड़की के भीतर से फिर आवाज़ आई ,हमारे चाहने से क्या होता है ?ब्रह्मांड आपनी तरफ़ सबको खींच रहा है काठ की  खिड़की ।हम चाहे या ना चाहे
जीवन में अलग रहते हुए भी हर जीव कहीं ना कही किसी से जुड़ना चाहता है
किसी भी समय ,परिस्थि ,मौसम ,अवस्था में ,ज़िम्मेदारियों के बावजूद हर आदमी कम से कम एक
स्नेहपूर्ण बाँहों की ओर खुलने वाली
खड़की चाहता है ।

खिड़की जीव के बात से ख़ुद पर इठला रही है ।इतनी ख़ुश कि अपने पल्लो को मानो पंख समझ उड़ जाना चाह रही है ।
एक अकेला कील जो अब तक खिड़की का प्राण बना था उसने खिड़की को मुक्त कर दिया ।हमेशा हमेशा के लिए ।
चर्रर्रर्र की आवाज़ के साथ जुदा होती खिड़की बोली ,
हे तड़पते जीवों मेरे अंदर और बाहर के सुनो ,मैं
गंतव्य यात्रा पर निकल चूकी हूँ।
बार -बार तुम पूछोगे कि कितना चलोगे ?कहाँ तक जाना है
मैं मुस्कुरा कर आगे बढ़ जाऊँगी
किससे कहूँ कि कहीं तो नही जाना
मुझे इस बार अपने तक आना है ।

Tuesday, 23 October 2018

मक्किनक आईलैंड !!!

अमेरिका जैसे विकसित देश मे एक ऐसी भी जगह है जहाँ सब कुछ होने के बावजूद कोई मोटर गाड़ी नही चलती ।आज भी यहाँ घोड़े गाड़ी ,हाथ गाड़ी और साईकिल हीं चलती है ।
क्या कहा आपने ,सड़क ही नही होगी तो कैसे चलेगी गाड़ी ?
जी नही ऐसा बिल्कुल नही है ।अमेरिका की लगभग हर एक गली -कुचें सड़कों से पटी पड़ी है ।यहीं तो वजह है कि यहाँ धुल -मिट्टी नही दिखतीं और मेरा सत्यार्थ इन पर गिर -गिर कर नए -नए घाव लेता रहता है ।

इस जगह पर तो बक़ायदा हाईवे भी है ।हाईवे का नाम एम-185 है ।
जगह इतनी साफ़ और सुंदर कि यहाँ की कुल आबादी से ज़्यादा पर्यटक यहाँ आते है ।
इस ख़ूबसूरत जगह का नाम है -मक्किनक आइलैंड ।मिसिगन राज्य का एक हिस्सा जो लेक हूरोंन का हिस्सा है ।मिसिगन तो आपने आप मे हीं प्राकृतिक ख़ूबसूरती से भरा हुआ है ।यहाँ के लेक मानो समुद्र हो ।पानी इतना साफ़ कि कई ख़ूबसूरत समुन्दर इसके आगे पानी भरे।

ऐसे ही राज्य के मक्किनक आईलैंड तक जाने के लिए आपको फेरी की मदद लेनी होती है ।मैकनउ सिटी से आपको फेरी लेनी होगी जो कि  लगभग 20-25 मिनट मे इस आईलैंड पर उतार देते है ।जैसा कि मैंने पहले बताया यहाँ कोई पेट्रोल /डिजल वाली गाड़ी नही चलती तो आप यहाँ पैदल ,साईकिल (रेंट करके ) घोड़ा गाड़ी से घुम सकतें हैं ।पुरा आईलैंड हीं 8 माईल मे फैला है तो आसानी से एक दिन मे घुम सकतें है ।घुमने की भी कुछ ही जगहें है ।बाक़ी आप किसी भी कोने मे रुक कर घंटो बिता सकतें हैं ।इसे निहार सकतें है ।

अच्छा तो अब बता देती हुँ कि यहाँ गाड़ियाँ क्यों नही चलती ? प्रदूषण और लोगों के स्वस्थ को देखते हुए यहाँ 1890 से हीं गाड़ियाँ बैन हैं ।
हमने भी यहाँ उतर कर साईकिल रेंट किया ।अभी आधे से भी कम सफ़र तय किया था कि बारिश शुरू हो गई ।मैंने शतेश को कहा चलते रहते है इतनी मे ज़्यादा नही भीगेंगे और ऐसे ख़ूबसूरत जगह पर बारिश मे साईकिल चलाने का मज़ा अलग ।शायद बारिश ने मेरी बात सुन ली और दिल पर ले लिया ।बोला अब तो तुम्हें भीगो के ही रहूँगा ।थोड़ी देर में वो मूसलाधार बारिश की हमलोग साईकिल छोड़ ,सत्यार्थ को ले एक पेड़ की तरफ़ भागे ।अब पेड़ से ये बारिश अड़े?
सामने एक घर मे पार्टी चल रही थी ।उसका पैटियो बाहर ख़ाली था ।हम सोच रहे थे कि जाए या नही तभी दो लड़के लगभग अपनी साईकिल फेंकते हुए उधर भागे ।हम भी उनके पीछे पेटियों के अंदर दाख़िल हो गए ।किसी ने कुछ नही कहा ।करण उधर वो एकलौता घर था कोई और कहाँ रुकता ?

यहाँ देखने को अर्क रौक ,फ़ोर्ट मकनिक ,देविल किचेंन ,मकनिक ब्रिज और ख़ूबसूरत घरों के साथ लेक का किनारा है ।
अच्छा यहाँ आने से पहले एक दिन हमने मकनिक सिटी मे बिताया ।यहाँ होटेल के मामले मे हमने आज तक के सफ़र मे सबसे बड़ा धोखा खाया था ।वाटरपार्क वाला होटेल बूक किया था और वाटर पार्क ही बंद था ।कूछ काम चल रहा था ।साथ ही होटेल के कई हिस्से मे काम चलने की वजह से एकदम कोने का रूम दे दिया था ।इसकी कहनी कभी और पर ये शहर भी प्यारा लगा मुझे ।यहाँ रात को हमलोग तारें देखने गए थे ।एक पल को हमें हीं तारें दिख गए पर मज़ा आया ।यहाँ का एक दुकान बड़ा मज़ेदार लगा ।
साथ ही अगर आप यहाँ या मक्किनक आईलैंड आए तो यहाँ के हौट फ़ज खाना ना भुले ।


Monday, 22 October 2018

माता का न्याय !

नवरात्रि की शुरुआत हो चुकी है। और इसी के साथ माता रानी के आगमन का उत्साह मन को उल्लास से भर रहा है। ऐसे में कलकत्ता का दुर्गा पूजा और हाल में वहाँ घटी एक वीभत्स घटना से मुझे दो क़िस्से याद आ रहें हैं। दोनों ही क़िस्से लगभग एक समान है बस देश काल अलग रहा है। 

एक तो ग्रीक कथा है और दूसरी अपने भारत के पश्चिमी चंपारण की कहानी है। पश्चिमी चंपारण, बिहार का एक ज़िला है। 
ग्रीक कथा कुछ इस प्रकार है, 
मेड्युसा नाम की एक लड़की थी। वह बहुत रूपवान हुआ करती थी।वह ग्रीक देवी, “एथेना” के मंदिर में पुजारन थी और वहीं रहती थी।मंदिर में आने वाले कई लोग तो उसे ही देखने आते थें। उसकी सुंदरता का बखान करते ना थकते। उसके बालों को वे एथेना देवी के बालों से भी सुंदर कहते। मेडूसा के रूप की ख्याति पोसाइडन तक भी पहुंची। जो की इस कथा के अनुसार एथेना देवी का प्रेमी और समुद्र का देवता था। उसने जब मेड्युसा को देखा तो उसपर मोहित हो उठा। मेड्युसा की पोसाइडन में कोई रूचि नहीं थी। वह कुंवारी ही रहकर एथेना के मंदिर की पुजारन बनी रहना चाहती थी। एक दिन पोसाइडन शाम को मौका पा मेड्युसा की तरफ़ बढ़ा। ऐसे में बचने के लिए मेड्युसा मंदिर में भागी। उसने मदद के लिए एथेना देवी से गुहार लगाई। लेकिन देवी एथेना ने उसकी कोई मदद नही की। बलात्कार के बाद जब पोसाइडन जा चुका था तो देवी एथेना वहां आई। मंदिर में दुष्कर्म की सजा के रूप में वे बिना जाने मेड्युसा को ही शाप दे डाली की आजीवन वह अकेली रहेगी। उसके जिस सुंदर बालों पर लोग रीझते हैं वह भी साँप बन जायेंगे। 
पर जैसे ही देवी को अपनी गलती का अहसास हुआ। उन्होंने उसे यह वरदान दिया कि जो भी उसकी आँखों में ग़लत दृष्टि से देखेगा वह पत्थर का हो जायेगा। 

अब बात करती हूँ, पश्चिमी चंपारण के क़िस्से की, 
इस ज़िले के सहोदरा नामक स्थान पर एक ग़रीब लड़की रहती थी। वह बहुत ही सुंदर थी। गाँव में उसकी सुंदरता के क़िस्से कहे जाते। एक दिन वह बकरी चराने निकली तो गाँव की सीमा के पार कुछ लड़के उसे घेर लिए। उसने उनसे काफ़ी विनती की लेकिन वे मानने को तैयार ना थे। ऐसे में लड़की, माँ दुर्गा से प्रार्थना करने लगी कि हे माँ! मेरी रक्षा करें। माँ दुर्गा ने उसकी रक्षा स्वरुप उसे उसी क्षण पत्थर का बना दिया। और उसे पूजित होने का वरदान दिया। तब से आज तक उस लड़की की पूजा माता सहोदरा के रूप में होती हैं। इस मंदिर की ख़ास बात यह है कि यहाँ पुजारन भी महिलाएँ ही होती हैं। यानि यहाँ की एक ख़ास समुदाय, “थारु” की ही महिलाएँ ही पुजारिन चुनी जाती हैं।

दोंनो ही क़िस्सों को याद कर सोचती हूँ कि देवी ने पीड़िता को ही सजा दी… क्या देवी माँ उस समय महिषासुर जैसा न्याय नहीं कर सकतीं थीं ? कई सवालों के जबाब सुलझे-अनसुलझे यूँ ही भटकते रहते हैं। फिर भी अगर आप बिहार जाए, चंपारण जाने का मौक़ा मिले तो सहोदरा माई के दर्शन को ज़रूर जाएँ।