Tuesday, 16 November 2021

ईथोपिया

 सितम्बर का महीना था। यहाँ कुछ भारतीयों द्वारा हिंदी दिवस ‘ईगल क्रिक पार्क’ में मनाया जा रहा था। यह एक नेशनल पार्क है और मेरे घर से क़रीब 30-35 मिनट की दूरी पर है। हमलोग वहाँ जाने का प्लान किए थे कि इसी बीच एक दोस्त के घर जाना पड़ा गणपति विसर्जन के लिए। गणपति विसर्जन के बाद घड़ी देखा तो ढाई बज गए थे। प्रोग्राम के लिए तो अब देर हो चुकी थी फिर भी हम निकल पड़े पार्क की तरफ़। सोचा क्या मालूम प्रोग्राम थोड़ा खिच गया हो तो और ना भी हुआ तो पार्क घुम कर चले आयेंगे। यहाँ जाने पर मोबाइल जी पी एस ने काम करना बंद कर दिया और इस तरह हमारे 20-25 मिनट तो तय जगह ढूँढने में ही लग गए। ऐसे में हिंदी दिवस समारोह समाप्त हो चुका था। थोड़ा ओह-आह भर कर हमलोग पार्क में घूमना शुरू किए। 

घूमते हुए हमलोग एक नदी के किनारे पहुँचे। वहाँ सफ़ेद और लाल कपड़ों में सजी दो महिलाएँ, अपने बच्चों के साथ फ़ोटो ले रही थीं। उनके बच्चे भी उनकी तरह के ही पोशाक पहने थे। मुझे सामने से जाते देख, उनमें से एक  आवऽऽऽ… के साथ कब बच्चे का जन्म होगा पूछ बैठी।  मैंने उसे ऑक्टोबर बताया और साथ ही उससे कहा कि वह बहुत सुंदर दिख रही है। हाँ, यह भी कहा कि तुम्हारी बेटी तो और प्यारी लग रही है। अब कौन सी औरत अपनी सुंदरता की तारीफ़ सुन कर ना खुश होती। उसने बताना शुरू किया कि आज उनका त्योहार है। त्योहार का नाम “मेस्केल” है। 

यह एक एथीयोपियन त्योहार है। इस त्योहार की ख़ास बात यह कि यह कुछ अपने यहाँ के होलिका दहन जैसा है। चौराहे पर लकड़ी इकट्ठा की जाती है। रात को उसने आग लगाई जाती है और अगली सुबह लोग उसकी राख से माथे पर क्रॉस का चिन्ह बनाते है। इस त्योहार को मनाने के पीछे उनकी रानी हेलना का निर्देश था बरसों पहले कि ऐसे आग लगाओ और धुआँ या आग जिस दिशा की तरफ़ जाती दिखे उसी तरफ़ क्राइस्ट का क्रॉस मिलेगा। 

एक और रोचक बात मालूम हुई उनसे मिलकर कि सितंबर में ही उनका न्यू ईयर होता है और क्रिस्मस वे लोग 25 दिसम्बर को ना मना कर 7 जनवरी को मानते है। ऐसा होने के पीछे उनका कॉप्टिक कैलेंडर ज़िम्मेदार है जो उन्हें बाक़ी दुनिया से 7 साल पीछे रखता है। 

कितना रोचक है ना कि आज जब बाक़ी दुनिया 2021 में जी रही है, इथोपियन देश के लोग अब भी 2014 में है। और तो और यहाँ 12 नही 13 महीना का एक साल होता है। वह अलग बात है की तेरहवें महीने में 5-6दिन ही होते है। 

चलते-चलते मैंने उनमें से एक महिला की बेटी के साथ तस्वीर लेने की बात पूछी। वह छोटी लड़की मुझे काफ़ी देर से देख रही थी और नज़र मिलने पर शर्मीली मुस्कान अपने होंठों पर फेर लेती। मुझे वह बहुत-बहुत- बहुत प्यारी लगी। मैंने तस्वीर लेने से पहले उसका नाम पूछा कि इसी बीच उसकी माँ उसकी चोटी खोल, उसका बाल सँवारने लगी। मेरा मन किया की कहूँ, रहने दो ऐसी ही, अच्छी लग रही है पर शायद उसकी माँ को बेटी खुले बालों में ज़्यादा अच्छी लगती हो। ख़ैर उसने अपना नाम धीरे से इसी बीच बताया , “ कियारी” मैंने मन में बुदबुदाया फूलों की क्यारी…

पी एस- कियारी यानि की,  गीत, मधुर, शुद्ध।  



Tuesday, 5 October 2021

गांधी

अचरज होता है की लोग गांधी के पुण्यतिथि पर गांधी से ज्यादा गोड्से को याद कर रहे हैं।  सदी चाहे जो हो, प्राण लेने वाला कभी महान नहीं हो सकता। दुनिया तो राम को रावण की मृत्यु का दोषी मानती है। गांधी रहे या ना रहें, हर युग में प्रासंगिक रहेंगें। दुनिया जब-जब शांति की तलाश में होगी उसे गांधी का मार्ग अपनाना ही पड़ेगा।   

आज गांधी जी के पुण्यतिथि पर मुझे गांधी ही याद आ रहें हैं। विश्व का एक बड़ा हिस्सा गांधी से प्रभावित रहा है।  ऐसे में मैं  ध्यान कर रही हूँ कि अमेरिका में घूमने के दौरान मैंने कहाँ -कहाँ गांधी की मूर्ति देखी।  उन यादों और तस्वीरों के साथ मैं कामना करती हूँ की,  सबके जीवन में गांधी के शांति की शिक्षा उतरे। 

पहली तस्वीर, न्यू यॉर्क के “यून्यन स्क्वेर पार्क” की है। इस पार्क में गांधी जी की एक मूर्ति लगी है। यह पार्क मैडिसन स्क्वायर गार्डन से कुछ 20-30 मिनट की वॉकिंग दूरी पर होगा। मैडिसन स्क्वायर गार्डन वही, जहाँ 2014 में मोदी जी पहली बार अमेरिका आए और उनके भाषण को सुनने अमेरिका भर से 15-20हज़ार भारतीय पहुँच गए थें । उस वक्त हमलोग टेक्सस में रहते थे। कुछ समय बाद जब न्यू जर्सी में रहने को मिला। हम कई दफ़े न्यू यॉर्क गए। उसी दरमियान हमने इस पार्क में गांधी की मूर्ति लगी देखी।


दूसरी तस्वीर,  डलास  के इर्विंग शहर की है। डलास मूव होने के बाद हम अपार्टमेंट देख रहे थे। इसी दरमियान एक दिन घर ढूँढते हुए हमें एक पार्क दिखा। यह पार्क अपार्टमेंट वाली सोसाइटी के बिल्कुल सामने था। ऐसे में हमने सोचा घर देखने के बाद पार्क में भी थोड़ा घूम लिया जाए, होटल जा कर करना ही क्या था। पार्क में घूमते हुए हमारी नज़र गांधी जी की इस मूर्ति पर पड़ी। फिर मालूम हुआ कि यहाँ गांधी जयंती से लेकर 15अगस्त और 26जनवरी के दिन झंडा भी फहराया जाता है। 




तीसरी तस्वीर , अमेरिका की राजधानी 

वॉशिंगटन, डी॰ सी॰की है। यहाँ इंडीयन एम्बेसी के प्रांगण में भी गांधी जी की मूर्ति लगी है। यह जगह चेरी ब्लॉसम  के लिए प्रसिद्ध टाइडल बेसिन लिंकन मेमोरियल से करीब 9-10 मीनट की दूरी पर स्थित है।


 

चौथी तस्वीर जो आप देख रहें हैं, वह विस्कॉन्सिन राज्य के “मिलवाकी” शहर की है। यहाँ के कॉर्ट हाउस के आगे भी गांधी जी की मूर्ति लगी है। यह कॉर्ट हाउस यहाँ के फ़ेमस “पब्लिक मार्केट” से 2-5 मीनट की दूरी पर होगा। यह यहां के ऑर्ट म्यूज़ियम से भी करीब 20-25 मिनट की वॉकिंग दूरी पर है।


Wednesday, 27 May 2020

उसकी(हर) ख़ामोशी !!!

“द पास्ट इज़ जस्ट अ स्टोरी वी टेल अवरसेल्फ़स”
कहानी उसकी(हर) खामोशी की...

एक मीठी धुन उसकी खामोशी में गूँज रही है ;
ख़्वाब चुन रही है रात बेक़रार है
तुम्हारा इंतज़ार है, तुम पुकार लो …

धुन में डूबे दो प्रेमी युगल अपने काल और दुनिया से परे, किसी प्रेम लोक में डूबे हैं। कहते हैं एक दूसरे से, “अतीत सिर्फ एक कहानी है जो हम दुहराते हैं।”

थीयडॉर समन्था से कहता है, “मैंने किसी को ऐसे प्यार नही किया जैसे तुम्हें किया है।”
इधर अरुण राधा से कहता है, “तुम कहो और मैं ना मानूँ।”

उसकी खामोशी के साथ अब विदा की घड़ी आ गई है। नायिकाएँ जानती हैं कि अब उनके बस में कुछ नही सिवाए बर्बाद होने के। वे विदा माँगती है, पर दोनों नायक विरह की पीड़ा मात्र की कल्पना से तड़प उठते हैं। दोनो प्रेम से भरे हुए कभी आग्रह करते हैं तो कभी अधिकार जताते हैं ;

अरुण राधा से कहता है, “ मुझे छोड़कर मत जाना राधा।”
वहीं थियोड़ोर समन्था से बेचैन होकर पूछता है, “तुम क्यों जा रही हो समन्था ? नही तुम ऐसा नही कर सकती। हमलोग प्यार में हैं, तुम स्वार्थी क्यों बन रही हो?”

एक म्यूजिकल खामोशी पसर जाती है। आमने सामने सिर्फ़ दो ध्वनियाँ टकरा रहीं हैं।
एक अरुण की जो कहता हैं, “ राधा मुझसे प्रेम की ऐक्टिंग कर रही थी ये मैं मान नही सकता।”
और दूसरी समन्था की जो कहती है, “थीयडॉर,  मैं तुम्हारी हूँ भी और नही भी…”

बहुत कम ऐसा होता है कि कुछ फ़िल्में आपके ज़हन में एक अलग हीं मुक़ाम पा जाती हैं। ऐसा हीं कुछ “खामोशी” और “हर” के साथ है। यह पेचीदा सी कहानी जो मैंने ऊपर लिखी है वो दरअसल इन्हीं दो फ़िल्मों की कहानी है,ठीक वैसे हीं जैसे प्रेम सुलझा कहाँ होता…

अगर आपने दोनों फ़िल्मों को देखा होगा तो शायद आपको भी इसमें कई समानता दिखेंगी। हालाँकि दोनों के परिवेस और काल में अंतर है। एक सफ़ेद और काली दुनिया में प्रेम को रच रही है तो दूसरी चमक-धमक से भरी।

जहाँ खामोशी की राधा अपने गहरे कम संवाद से आपके मन पर गहरा छाप छोड़ती है, वहीं हर की समन्था अपने आवाज़ के जादू से आपको बांध लेती है।

एक तरफ़ राधा जो मानवीय प्रेम के ज़रिए मानसिक रोगियों को ठीक करने का ज़िम्मा लेती है। वहीं दूसरी तरफ़ समन्था एक ऑपरेटिंग सिस्टम है जो अपने शब्दों के ज़रिए लोगों के दिल में प्यार भर रही हैं। समन्था अपनी जानकारी से लोगों का जीवन सज़ा रही है और वहीं राधा अपने सेवा-भाव से मनोरोगियों का इलाज कर रही है।
संयोग देखिए बरस बीत गए पर दोनों ही काल में मनुष्य के मानसिक इलाज का ज़िम्मा प्रेम-पूर्ण स्त्री को हीं दिया गया है।

अंतत: दोनों ही नायिकाओं की दुनिया मानवों के विकास के साथ ध्वस्त हो जाती है। एक इंसान के प्रेम में पागल हो जाती है और दूसरी इंसान के नए पागलपन से अंत गति पा जाती है।

समन्था थीयडॉर के पूछने पर कहती है, “यह बता पाना मुश्किल है मेरे लिए की कहाँ जा रही हूँ पर कभी तुम वहाँ तक पहुँच जाओ थीयडॉर, तो मुझे ढूँढ लेना।”

वहीं पागलखाने के अंदर जाती राधा को देख कर अरुण कहता है ,” राधा मैं तुम्हारा इंतज़ार करूँगा।”

फिर एक मीठी धुन उसकी खामोशी में गूँज रही है;

आई ऐम लायिंग ऑन द मून
माई डियर, आइ विल बी देयर सून
इट्स अ क्वाइयट एंड स्टेरी प्लेस
टाइमस वी आर स्वॉलोड उप
इन स्पेस वी आर हियर अ मिलियन माइल्ज़ अवे…

Friday, 1 May 2020

तुम्हारी याद आई और कॉल कर बैठी। ये भी ध्यान नही रहा की अभी सो रही होगी। कैसी हो तपस्या ?
और मैं यह  मैसेज देख कर उछल पड़ी। बिना ठीक हूँ जबाब दिए पुछा , “तू ज़िंदा है और साथ हीं खिलखिलाहट भेजी।”
जबाब,” दो बच्चों की माँ, नौकरी, घर की चाकरी क्या ही ज़िन्दा होगी...  ऊपर से कभी ये तो कभी वो हा-हा-हा…”

मैंने कहा ,” छोड़ रोना ये बता याद कैसी आई मेरी ?” 
जबाब,” तेरे पैर देख लिए ना हा-हा-हा... तुझे याद है तेरा चप्पलों से प्रेम और उनकी तस्वीरें निकालना।”

हाँ याद है :)
जबाब, “ मैंने तेरी दो तस्वीर माँगी थी ना वैसे हीं जूतों के लिए। वहीं आज दिख गई।”

हा-हा-हा तू सच में पागल है। इतने साल से रखा है उसे। 
जबाब,” हाँ ना, सोचा ब्रह्माण के पैर हैं पूजती रहूँ :P उसपर से तेरे पैर से जलन तो आज तक है। देख अभी भी धुआँ हो रहा होगा।

दोनो तरफ़ से हँसी के फ़वारे हा-हा-हा…

सखी आगे कहती है , “आज जब फोन की मेमोरी भर गई तो सफ़ाई के दौरान ये मिली। अच्छा ये बता,  अब भी तू चप्पलें उतनी ही ख़रीदती है ? उनकी फ़ोटो निकालती है ?” 

जबाब, “ना रे अब ये कमबख़्त टूटते ही कहाँ है। तेरी पसंद वाली पीली जूती आज तक चमक रही है। हाँ ये हैं कि,  दुकान पर अगर जाती हूँ तो एक फेरा इस सेक्शन में ज़रूर लगाती हूँ हा-हा-हा…

कब सुधरेगी तपस… इशु कैसा है? शतेश कैसे हैं ? और बता…
बातें अथाह… क़रीब एक-डेढ़ घंटे की सारी भावनायें लिखना मुश्किल है, पर कहानी का सार ये की,” कभी मुझे चप्पलों के प्रति बड़ा आकर्षण था।” आज भी है पर थोड़ा कम हुआ है। कारण यहाँ चप्पलें टूटती हीं नही जल्दी और इन्हें रखने की जगह में अब तीन लोगों के पाव है। 

ख़ैर होता ऐसा की साथ की, साथ की लड़कियाँ जहाँ पर्स या कान की बाली या लिस्टिक ख़रीदने में व्यस्त होती और मैं कहानी की किताबों और चप्पलों की दुकान पर होती। हाँ चप्पलों की ख़रीदारी में तब एक और दोस्त साथ होती। पर उसे ब्रांडेड ही अधिकतर लेने होते। 
मेरे पैसे कभी इतने पैसे नही होते की हर सेंडिल ब्राण्डेड हो या हर किताब ओरिजनल। 

पुणे रहती थी तो “एफ सी रोड” और दिल्ली आने के बाद “सरोजनी नगर” ज़्यादा जाने लगी। कभी-कभी साकेत भी जाती, पर वो सिर्फ़ किताबों के लिए। साकेत में किताबें सेल में मिलती। डेढ़ सौ में दो किताब या कई बार 100 रुपए में दो किताब। 

मुझे कभी ब्राण्डेड चीज़ों से कोई ख़ास लगाव नही रहा। बजट में मिली तो लिया नही तो बस आराम, रंग और डिज़ाइन पसंद हो बिना ब्रांड की भी चीज़ें ले लिया। 

मेरा भाई तो कई बार मज़ाक़ भी उड़ाता कि, 200 रुपए की चप्पल के लिए 150 रुपया ऑटो का दे देती है। और मैं कहती कि , “बोका ये  भी तो देखो की डेढ़ सौ या दो सौ की दो-चार सुंदर -सुंदर सैंडल लाती हूँ।”  

इसके साथ ही कई बार सरोजनी में किताब बेचते एक अंकल मिल जाते। तो कई बार नक़ली किताबें भी ले आती। 
मुझे याद है की एक बार मेरे पास आने के पैसे हो छोड़ कर सिर्फ़ सत्तर-पचहत्तर रुपए बचे थे। अंकल के पास मुझे “वाइट टाइगर” किताब दिख गई। दाम पूछने पर मालूम हुआ 150 रुपए। 
मैंने कहा ठीक बताए अंकल कितने में देंगे ? मुझे थोड़ा अजीब लग रहा था 150 की चीज़ को 70 में देने को कहना। उसपर से विद्या माता, ज़्यादा मोल भाव ठीक नही लगता। 

उन्होंने ने कहा चलो 100 रुपए दो और ले जाओ। मैं बिना कुछ बोले वहाँ से जाने लगी तो उन्होंने ने आवाज़ देकर पुकारा, “ कितना में लोगी ? पहले भी किताब ले गई हो मुझसे इसलिए ख़ाली हाथ लौटाना ठीक नही लग रहा।”
मैंने झेंपते हुए कहा,” मेरे पास 70 रुपए है।”

किताब मेरी तरफ़ बढ़ाते हुए उन्होंने कहा ,” यह लो।” 
यह वाक़या सरोजनी की मेरी सबसे प्यारी याद बन गई। 

हम्म, तो चलिए वापस चप्पलों की तरफ़ लौटते हैं। इधर तो मैंने उनकी तस्वीरें निकालनी बंद कर दी, पर यादों के लैपटॉप से कुछ तस्वीरें मिली है उन्हें शेयर कर रही हूँ। 

हाँ एक बात और उन दिनों मैं सैंडिल की तस्वीर के साथ ख़ूब प्रयोग करती थी। कभी उनपर गाने चिपकाती तो कभी ताला :) 
कभी उन्हें स्विमिंग पूल के किनारे ले जाती तो कभी चेरीब्लोसम के फूल या फ़ॉलकलर के पत्तों के साथ बिठाती। कई तस्वीरें गुम हो गई। जो जमा पूँजी मिली वो ये रही। 

Tuesday, 21 April 2020

कल्याण !

• चाचा “ किम जोंग उन” बीमार,  शतेश परेशान।
• चाचा किम ने ट्रम्प बाबा को चिट्ठी नही लिखी ,तपस्या परेशान।

• चाईना दाई कहती है, की जब एडस और एचवन एनवन वाइरस से एतना लोग मरा तो कोई पूछा जो हमसे सवाल दागा जा रहा है?  एतना सुन के सेट-अप (शतेश -तपस्या) दोनों परेशान।

•इधर , अमेरिका में तेल/गैस का दाम कम होते देख,  घूमंतु जोड़े के करेजा पर साँप लोट रहा है।  अरे दादा हो,  ई किरवनावा कब जाई ? अभीए त घूमे के लाहार रहल हऽ...
कपार पर हाथ रख के दूनों बेकत अब सोचता कि, साला पईसा बचावे के कौनवो जोगे नईखे हाथ में।

• आख़िरी ख़बर ऐसी की तैसी,
अमेरिका में लोग हुए बाग़ी। कहते है घर में नही रहेंगे-नही रहेंगे। इकनोमी के फेर में ट्रम्प बाबा भी पगलाए आ जाने कौन -कौन सा  ग्रेट अमेरिका का स्कीम लाते रहते है। भारत से दवाइयों मँगवा लिए आ कहते हैं कि अब बाहरी लोगों को आने पर रोक। हाय रे दागाबजवा।  ख़बर पूरी तरह समझ में आवे तब तक कहाँ है अपने हर-हर मोदी...

समाचार के अंत में सुनते है अमेरिकी लोगगीत,,

अमेरिका हमको जान से प्यारा है
आज़ादी हमारा नारा है ।
शुरू करें अब काम-धंधे
भूखे मरने से खा कर मरना अच्छा है।

लोगगीत पर सट-अप समझ नही पा रहें क्या प्रतिक्रिया दें।
तभी आकाशवाणी होती है,

“ना रहिए जीव त के पी घीव”

एतना सुनते ही सत्य का अर्थ हँसता है, हा-हा-हा हो गया कल्याण...
कल्याण ।

Friday, 17 April 2020

नंदा।

भले नंदा मुझे देरी से पसंद आई पर एक बात तो है, यार ये  बड़ी भोली दिखतीं थीं। मैंने उनके कुछ  पुराने ब्लैक एंड वाइट गाने सुने, उफ़्फ़ कितनी प्यारी लगी है क्या हीं कहूँ।
 आज इनकी याद यहाँ के मौसम को देख कर आई। एक तो महामारी ऊपर से मौसम की बीमारी। कभी झमाझम बारिश तो कभी गोंऽऽऽ-गोंऽऽऽ करती हवा तो कभी ताड़ताड़ती बिजली। भगवान सोच लिए है की धरती को कैसे भी साफ़ करके हीं दम लेंगे:)

अब ऐसे में मैंने भी  “गोन विथ द विंड” को रखा साइड में। चल पड़ी कल का बचा हुआ कढ़ी गरम करने। चावल चढ़ाया, प्रेम से पकौड़े तले। जितना खा सकती थी, कढ़ी -चावल और पकौड़े खाए और फिर तान कर सो गई। उठी तो बारिश धीमी हो चुकी थी।

घर के नर और मादा गौरिया,  खिड़की की दीवार पर सिर रख कर बाहर आती-जाती गाड़ियाँ देखने लगें। उन्हें आज गाड़ियाँ कम पक्षी उड़ते ज़्यादा दिख रहें हैं...
थोड़ी देर पक्षियों को घूरने के बाद,  बारी आती है चाय के साथ बचे पकौड़े खाने की । नर गौरिया चाय बनाने को चल पड़ा और मादा संगीत की खोज में टीवी के आगे।

बारिश के गीतों के साथ नंदा एक बार फिर टीवी पर छा गई। मादा गौरिया चाय के इंतज़ार में गाने देखते-देखते सोचने लगी, नंदा कितनी ख़ुशनसीब रही ना... भले हीं वो नूतन, वाहिद रहमान, मधुबाला या नर्गिस जैसी प्रसिद्धी ना पाई हो पर हर तरह के ख़ूबसूरत गीत इनके खाते में हैं।

चाहें भक्ति गीत हो, प्रेम गीत हो, विरह गीत हो, बरखा ऋतु हो, सेंसुअल गीत हो, दबंग प्रेमिका का गीत हो, पंछी-पखेरू , बादल-पतंग, पति-पत्नी हो, भाई-बहन पर गीत हो या माँ-बच्चें पर, हर तरह के गीतों पर इन्होंने ने अभिनय किया है। हाँ, कई गीत तो मुझे इधर जाकर मालूम हुआ की इनकी फ़िल्म की हीं है।
जैसे चल उड़ जा रे पंक्षी... इस गीत को बचपन में कितनी बार सुना होगा पर हर बार शायद तीसरी क़सम के बैलगाड़ी वाला गीत सोच कर लगता की इसमें भी वाहिदा हीं होंगी :)
“मूर्ख लड़की मैं”

Saturday, 4 April 2020

दीया जलाना है !!!

शाम को दीया जलाना मेरे लिए कोई नया नही। मैंने देखा है हर शाम माँ को दीया जलाते। मैंने देखा है वो शाम जब रोग या माहवारी की वजह से माँ दीया जला नही पाती तो मुझसे कहती, लभली दीया जला दो साँझा का समय हो गया है। मैंने देखा है अपनी सासू माँ को शाम का दीया जलाते। मैंने देखा है वो शाम जब किसी कारण से वो गाँव के पुराने घर जातीं तो हमें कह कर जातीं की शाम को दिया- बाती कर देना।

भारत में क़रीब आज भी 60-70% घरों में शाम को दीया  जलता हीं है। कुछ लोग ज़िंदगी की भागा दौड़ी में शाम का दीया जला नही पाते तो कुछ को ये उतना ज़रूरी नही लगता। हर किसी का अपना विश्वाश है इसे ना भी जलाए तो माता लक्ष्मी और साँझा माई से घर में सुख शांति की प्रार्थना करते है।

मैं भी कई बार शाम को दीया नही जला पाती। कारण वहीं रोग- माहवारी तो कई बार बाहर घूमना, शॉपिंग , सिनेमा या फिर दोस्तों के घर होना। हाँ घर पर होतीं हूँ तो रोज शाम दीया जला हीं लेती हूँ। जिस दिन नही जला पाती उस दिन कोई अफ़सोस या धर्म का भय नही रहता। यह बस एक ऐसा संस्कार है जो बचपन से मन पर अंकित है बाक़ी कुछ नही।

जिनके घर रोज दीया जलता है उनके लिए विश्वाश और जो नही जलाते वो शौक से आज दीया जलायेंगे या फिर  शौक  से हंगामा करेंगे। वैसे आज समय के फेर से दीया जलाने ना जलाने से कुछ बनने बिगड़ने वाला नही। हमें सावधानी तो हर हालत में बरतनी है।

बाक़ी जीवन का विश्वाश जैसे भी बना रहे बने रहना चाहिए। और भारत तो विश्वाश है ।