Monday, 6 December 2021


आज हम फिर से केंटुकी घूमने चलते है। याद है ना, इससे पहले हमलोग “मोहम्मद अली” का जन्म स्थान देखने यहाँ पहुँचे थे। kfc चिकेन की भी बात हुई थी पर आज आपको जो देखना है वह है “अब्राहम लिंकन” का जन्म स्थान।

12 फरवरी, 1809 को  लिंकन का जन्म केंटुकी के हार्डिन काउंटी में हुआ था। पर आज यहाँ जाने के लिए आपको जी पी एस में,  2995 लिंकन फार्म रोड, हॉजगेनविले, केंटकी, पता डालना होगा।

लिंकन के जन्म स्थान तक पहुँचे, इससे पहले क्यों ना ड्राइव करते-करते इनके बारे में थोड़ा जान ले। वैसे तो आप सब इनके बारे में जानते ही होंगे पर मुझे इनकी जीवनी, रोलर कोस्टर राइड की तरह लगती है। इनके संघर्ष को देख कर लगता है कि क्यों हम छोटे-छोटे दुखों से इतनी जल्दी हार मान जाते है। वैसे लिंकन ने ही कहा है , “जिसका जीवन जितना संघर्षपूर्ण रहा, उसने उतना ज़्यादा सीखा” 

गरीब परिवार में जन्में लिंकन का घर लकड़ी का एक छोटा सा कमरा भर था। बाद के दिनों में ज़मीन की लड़ाई-झगड़े में इनके परिवार को यह घर भी छोड़ना पड़ा और केंटुकी से इंडिआना के “पैरी काउंटी” में आना पड़ा। लिंकन ने तीन घर बदले और उनके हर घर को एक स्मारक का रुप दिया गया है। 

जब ये 21 साल के थे तब अपने पिता से अलग हो गए थे। पिता चाहते थे कि बेटा, पढ़ाई-लिखाई, कविता-कहानी छोड़, उनके साथ मज़दूरी में हाथ बटाए पर लिंकन को यह मंज़ूर ना था। 

जैसे -तैसे थोड़ी पढ़ाई हुई। नौकरी की पर वहाँ से भी निकाल दिए गए। फिर इन्होंने बिजनेस शुरू किया। वह भी कुछ समय के बाद पूरी तरह से ठप हो गया। इस बीच जिस लड़की से प्रेम करते थे, उसका देहांत हो गया। लिंकन डिप्रेशन में चले गए। 

ब्याह हुआ जिस लड़की से उससे कभी मन ना मिला। चार बच्चे हुए पर तीन की मृत्यु बचपन में ही हो गई और चौथा 18 साल की उम्र में नही रहा। 

इधर समाज में ऊँच-नीच का भेद मिटाने को वह राजनीति में घुसे तो वहाँ भी इन्हें करारी हार मिली। सीनेट के चुनाव में 11 असफलताओं के बाद उन्हें शानदार जीत मिली। इसके बाद उन्होंने अमेरिका का प्रेसिडेंट चुनाव लड़ा और अमेरिका के 16 प्रेसिडेंट बने।  

लिंकन के संघर्ष से हार ना मनाने की प्रेरणा लेकर अब हम इनके जन्म स्थान को देखते है। इस जगह को अब “Abraham Lincoln Birthplace National Historical Park” नाम दिया गया है। यहाँ इनके लड़की के घर का हमशक्ल बना कर एक मेमोरीयल के रूप में रखा गया है। कहते है कि इसकी कुछ लकड़ियाँ लिंकन के पुराने घर से ली गई है पर वहाँ बैठा गाइड बताता है कि, लकड़ियाँ लाई ज़रूर गई थी पर वह बहुत पुरानी होने की वजह से ठीक से काम ना आ सकी तो ये सारी नई लकड़ियाँ है। 

इसके अलावा यहाँ, “नैन्सी लिंकन “ जो लिंकन की माँ थीं, उनका भी केबिन बना है। एक छोटा सा झरना है जिसे कहते है कि इससे लिंकन के पिता खेतों की सिंचाई करते थे। साथ ही एक छोटा सा म्यूज़ियम है जिसमें घर के कुछ बर्तन, कुछ अवज़ार, लिंकन की मूर्ति, एक छोटा सा प्रोजेक्टर हॉल भी है। जिसमें लिंकन की जीवनी दिखाते है। 

तो चलिए, तस्वीरों के साथ आप भी सैर पर निकले और हाँ सीढ़ियाँ चढ़ते हुए थकिएगा नही क्योंकि मैं भी चढ़ी थी जबकि, मैं माँ बनने वाली थी। 




Wednesday, 1 December 2021

पोस्टपार्टम डिप्रेशन को जाने !!!

अमेरिका में नॉर्मल डिलीवरी हो या सी सेक्शन, बच्चे के जन्म के बाद माँ को कुछ दिनों में डॉक्टर को दिखाना होता है। यह नॉर्मल रूटीन चेक अप जैसा होता है। जिसमें आपकी जाँच के साथ कुछ सवाल पूछे जाते है जैसे, 

कोई तकलीफ़, ब्लीडिंग , पेन, स्टीचेज कैसी है, कमजोरी, यूट्रस का पोजिशन, ब्रेस्ट फ़ीडिंग या फ़ॉर्म्युला और “डिप्रेशन” की समस्या। 

डिप्रेशन ? 

जी हाँ, डिप्रेशन के लक्षण के बारे में पूछे जाते है। आप चौंक गए होंगे ना कि माँ बनने का डिप्रेशन से क्या लेना- देना ? मैं भी चौंक गई थी , जब पहली बार सत्यार्थ के होने पर नर्स का कॉल आया था। किसी-किसी जगह डॉक्टर विजिट से पहले उसकी नर्स का कॉल आता है, सारी जानकारी लेने के लिए। तब मैं “कनेक्टिकट” में रहती थी। मैंने चौंकते हुए नर्स से कहा , “ नही तो, मुझे तो कोई डिप्रेशन के लक्षण नही पर आप ऐसा क्यों पूछ रही है ?”

उसने कहा, “ यह हमारा प्रोटोकल है, पूछना।  फिर उसने समझाया कि,  माँ बनने के दौरान एक स्त्री के शरीर में कई हार्मोनल चेंज होते है। इसमें एस्ट्रोजन, प्रोजेस्ट्रोन, टेस्टोस्टेरोन जैसे हार्मोन्स में बदलाव का असर उसके व्यवहार पर पड़ता है। शरीर का कमजोर होना और अचानक नवजात की देख भाल करना अपने आप में एक बड़ा काम है। ऐसे में किसी -किसी माँ में डिप्रेशन की समस्या देखी गई है। हालाँकि यह रेशियो बहुत कम है, 10 से 15%  माँ में ही यह लक्षण देखने को मिले है।”  इसके बाद उसने फोन रख दिया। 

मुझे बड़ी हँसी आई कि देखो ना, यहाँ कितना ड्रामा है। माँ बनने से भी कहीं डिप्रेशन होता होगा क्या ? अपने भारत में तो कभी ऐसा देखा या सुना नही।  

बात आइ-गई हो गई। फिर मैं जब भारत आई तो एक पुरानी दोस्त से बातों के दरम्यान एक बचपन की बात सामने आई। उसने एक महिला के बारे में बताया , “ अरे तुझे मालूम नही था, वह पागल थी। अपने छोटे-छोटे बच्चों को कहीं भी पटक देती, दूध नही पिलाती, खाना नही देती। दिन भर पड़ी रहती। कहती कि तबियत ठीक नही लगती। घरवालों को लगता कि वह काम से जी चुराने का बहना करती है। फिर धीरे-धीरे उसकी तबियत ज़्यादा बिगड़ी तो घरवालों ने डॉक्टर को दिखाया पर बीमारी का पता नही लगा। बात दवा से हट कर दुआ और झाड़-फूँक तक पहुँच गई।” 

मैने हँसते हुए कहा , “ अब एक के बाद एक छह बच्चे पैदा होंगे तो कितनों को वह देखेगी, सम्भलेगी। यहाँ तो एक बच्चे के रोने से दिमाग़ ख़राब हो जाता है।”  

उस वक्त तो हँसी-मज़ाक़ , ओहो -हो हो … तक बात रह गई। फिर एक दिन मैं बच्चों से जुड़ी डोक्यूमेंट्री देख रही थी, इसी बीच मुझे एक ऐसी डोक्यूमेंट्री दिखी जो पोस्टपार्टम डिप्रेशन के बारे में थी। मुझे अचानक से नर्स की बात याद आई, पोस्टपार्टम डिप्रेशन” और मैं इसे देखने लगी। इसे देखते हुए मुझे वह महिला याद आई, जिसके बारे में दोस्त ने बताया था। 

हो सकता हो वह भी इस परेशानी से जूझ रही होंगी पर किसी को समझ नही आया। जाने ऐसी कितनी महिलाएँ भारत में भी होंगी पर हमें मालूम ही नही चलता होगा। यूँ भी दिमाग़ी बीमारी को लोग सहज नही ले पाते। वे समझ नही पाते कि जैसे हाथ-पैर-फेफड़े-गुर्दे में बीमारी/तकलीफ़ हो सकती है वैसे दिमाग़ में भी हो सकती है। यह भी तो शरीर का ही एक भाग है। 

बाक़ी, डिलीवरी के बाद जो महिलाएँ इस पीड़ा से गुजरती होंगी सोचिए उन पर क्या बीतती होगी। पर घबराने की बात नही, इसका निदान है। आप अपने डॉक्टर से इस बारे में बात करे। क्योंकि यह आपका शरीर है, इसकी देख -भाल आपके ज़िम्मे है जैसे आपके नवजात की ज़िम्मेदारी आपकी है। 

अगर पोस्टपार्टम डिप्रेशन के बारे में जानना चाहते है तो थोड़ा गूगल करिए और ना हो तो एक डिक्यूमेंटी देख डालिए , “ when the bough  Breaks “

इस पोस्ट का मेन उद्देश्य यह है कि, “यह ना समझे कि, माँ ने बच्चे को जन्म दे दिया बस हो गया। अगर ऐसी कोई भी लक्षण माँ में दिखे तो तुरंत डॉक्टर से सम्पर्क करें नही तो यह माँ और बच्चे दोनों के लिए घातक है।” 


Thursday, 18 November 2021

कहानी सपने में बुनी।


कल अमृता प्रीतम की किताब, नागमणी पढ़ कर पूरी की। कहानी पढ़ कर देर तक सोचती रही और आँख लग गई। सपने में मैंने एक कहानी बुनी। कहानी में अलका और कुमार ही थे पर इस बार अलका ने खुद को कुमार से बदल लिया था। कहानी अब कुमार की नज़र से नही अलका की नज़र से देखी जा रही थी….

कहानी, 

वह छत से भागता हुआ नीचे कमरे में आया। उसे देख कर अलका का जी भर आया पर अपने मन के भेद पर पर्दा रख कर उसने पूछा, “ वह आ गई ?”

“हाँ, आ गई है।” देखो ना वह बेचारी दिवाली पर कितना तैयार हो कर आई है मुझसे मिलने और एक मैं हूँ।

क्यों क्या हुआ, कुर्ता -पजामा तो पहने ही हो अब और कितना तैयार होना बाक़ी रह गया है, अलका ने उसकी तरफ़ देख कर पूछा। 

उसने कुछ कहा नही, बस वापस जाने की बेचैनी में सीढ़ियों की तरफ़ देखा। अलका उसकी बेचैनी महसूस कर बोली, “तुम जाओ। वह तुम्हारा इंतज़ार कर रही होगी।” माँ-बाबू जी जगे हो तो मैं भी आती हूँ उनका आशीर्वाद लेने और हाँ, उससे भी मिल लूँगी। आख़िर उससे अब तुम्हारी साथ है। 

मेरा साथ… माँ -बाबू जी सो चुके है। मैं अब चलता हूँ। आया था आपके पास कुछ दिए और मिठाई लेने। मैं लेना भूल गया था। अब वह आई है तो …

अच्छा, लेते जाओ। सुनो तुमने फुलझड़ी ली है या नही ? 

नही, कहाँ ली। वह अचानक ही आ गई। मुझे बुरा लग रहा है उसके लिए।  

कोई बात नही मैं बहुत सारा ले आई हूँ। ये लो कहते हुए अलका ने दिए- मिठाई के साथ कुछ फुलझड़ियाँ उसके हाथ में थमा दी। उसने वापस जाने को पहली सीढ़ी पर पैर रखा ही था कि तभी घर में शोर हुआ। दोनो भागते हुए शोर की दिशा में पहुँचे तो मालूम हुआ, कहीं से एक कोयल घर में घुस आई थी और उसने जाने रसोई से ऐसा क्या खा लिया कि उसकी आवाज़ चली गई। फ़र्श पर वह बेसुध पड़ी थी। कोयल को देख अलका उदास हो गई, उसकी आँखें भर आई। घर का नौकर उस कोयल को पानी पिला रहा था। अलका काठ सी बनी दरवाज़े के सहारे उस कोयल को निहार रही थी। उसे लगा अब यह कोयल नही बचेगी… बेचैन होकर उसने कुमार की तरफ़ देखा। हाँ, “कुमार” ही तो उसका नाम है जो अलका के साथ खड़ा था। अलका ने देखा वह कोयल को बस देख रहा है पर उसे वापस जाने की बेचैनी है। अलका अपने आँखों का आँसू छिपाते हुए उसे कहती है, “तुम जाओ”

इतने में एक लड़की कुमार के कपड़ों में लिपटी रसोई तक आती है और कहती है, “ शोर सुनकर मैं नीचे चली आई” 

अलका की नज़र उस पर पड़ती है और पड़ती है कुमार की नीली क़मीज़ पर। वह अचरज से कुमार की तरफ़ देखती पर कुमार की मुस्कुराती निगाहें उस लड़की पर टिकी है। अलका का दिल जोर से धड़काता है मानो यह उसकी एक आख़िरी धड़कन हो… इसके बाद शायद दूसरी धड़कन उठ ना पाए। क्षण में एक ऐसी उदासी उसके मन पर पसर गई जिसकी उसने कल्पना तक ना की थी। मिनट की देर से,  धीमी-धीमी आती अपने धड़कनों को महसूस कर वह बेसुध कोयल की तरफ देखती। नौकर अब भी कोयल को पानी पिलाने की कोशिश कर रहा है। अलका पीछे मुड़ कर देखती है और कुमार से कहती है , “ तुमलोग जाओ” 

कुमार को जैसे इसका ही इंतज़ार था। उसने उस लड़की का हाथ पकड़ा और सीढ़ियाँ चढ़ने लगा। इधर कोयल के शरीर में हलचल हुई। उसने धीरे से कूऊउऽऽ किया और उड़ चली। 




Tuesday, 16 November 2021

ईथोपिया

 सितम्बर का महीना था। यहाँ कुछ भारतीयों द्वारा हिंदी दिवस ‘ईगल क्रिक पार्क’ में मनाया जा रहा था। यह एक नेशनल पार्क है और मेरे घर से क़रीब 30-35 मिनट की दूरी पर है। हमलोग वहाँ जाने का प्लान किए थे कि इसी बीच एक दोस्त के घर जाना पड़ा गणपति विसर्जन के लिए। गणपति विसर्जन के बाद घड़ी देखा तो ढाई बज गए थे। प्रोग्राम के लिए तो अब देर हो चुकी थी फिर भी हम निकल पड़े पार्क की तरफ़। सोचा क्या मालूम प्रोग्राम थोड़ा खिच गया हो तो और ना भी हुआ तो पार्क घुम कर चले आयेंगे। यहाँ जाने पर मोबाइल जी पी एस ने काम करना बंद कर दिया और इस तरह हमारे 20-25 मिनट तो तय जगह ढूँढने में ही लग गए। ऐसे में हिंदी दिवस समारोह समाप्त हो चुका था। थोड़ा ओह-आह भर कर हमलोग पार्क में घूमना शुरू किए। 

घूमते हुए हमलोग एक नदी के किनारे पहुँचे। वहाँ सफ़ेद और लाल कपड़ों में सजी दो महिलाएँ, अपने बच्चों के साथ फ़ोटो ले रही थीं। उनके बच्चे भी उनकी तरह के ही पोशाक पहने थे। मुझे सामने से जाते देख, उनमें से एक  आवऽऽऽ… के साथ कब बच्चे का जन्म होगा पूछ बैठी।  मैंने उसे ऑक्टोबर बताया और साथ ही उससे कहा कि वह बहुत सुंदर दिख रही है। हाँ, यह भी कहा कि तुम्हारी बेटी तो और प्यारी लग रही है। अब कौन सी औरत अपनी सुंदरता की तारीफ़ सुन कर ना खुश होती। उसने बताना शुरू किया कि आज उनका त्योहार है। त्योहार का नाम “मेस्केल” है। 

यह एक एथीयोपियन त्योहार है। इस त्योहार की ख़ास बात यह कि यह कुछ अपने यहाँ के होलिका दहन जैसा है। चौराहे पर लकड़ी इकट्ठा की जाती है। रात को उसने आग लगाई जाती है और अगली सुबह लोग उसकी राख से माथे पर क्रॉस का चिन्ह बनाते है। इस त्योहार को मनाने के पीछे उनकी रानी हेलना का निर्देश था बरसों पहले कि ऐसे आग लगाओ और धुआँ या आग जिस दिशा की तरफ़ जाती दिखे उसी तरफ़ क्राइस्ट का क्रॉस मिलेगा। 

एक और रोचक बात मालूम हुई उनसे मिलकर कि सितंबर में ही उनका न्यू ईयर होता है और क्रिस्मस वे लोग 25 दिसम्बर को ना मना कर 7 जनवरी को मानते है। ऐसा होने के पीछे उनका कॉप्टिक कैलेंडर ज़िम्मेदार है जो उन्हें बाक़ी दुनिया से 7 साल पीछे रखता है। 

कितना रोचक है ना कि आज जब बाक़ी दुनिया 2021 में जी रही है, इथोपियन देश के लोग अब भी 2014 में है। और तो और यहाँ 12 नही 13 महीना का एक साल होता है। वह अलग बात है की तेरहवें महीने में 5-6दिन ही होते है। 

चलते-चलते मैंने उनमें से एक महिला की बेटी के साथ तस्वीर लेने की बात पूछी। वह छोटी लड़की मुझे काफ़ी देर से देख रही थी और नज़र मिलने पर शर्मीली मुस्कान अपने होंठों पर फेर लेती। मुझे वह बहुत-बहुत- बहुत प्यारी लगी। मैंने तस्वीर लेने से पहले उसका नाम पूछा कि इसी बीच उसकी माँ उसकी चोटी खोल, उसका बाल सँवारने लगी। मेरा मन किया की कहूँ, रहने दो ऐसी ही, अच्छी लग रही है पर शायद उसकी माँ को बेटी खुले बालों में ज़्यादा अच्छी लगती हो। ख़ैर उसने अपना नाम धीरे से इसी बीच बताया , “ कियारी” मैंने मन में बुदबुदाया फूलों की क्यारी…

पी एस- कियारी यानि की,  गीत, मधुर, शुद्ध।  



Tuesday, 5 October 2021

गांधी

अचरज होता है की लोग गांधी के पुण्यतिथि पर गांधी से ज्यादा गोड्से को याद कर रहे हैं।  सदी चाहे जो हो, प्राण लेने वाला कभी महान नहीं हो सकता। दुनिया तो राम को रावण की मृत्यु का दोषी मानती है। गांधी रहे या ना रहें, हर युग में प्रासंगिक रहेंगें। दुनिया जब-जब शांति की तलाश में होगी उसे गांधी का मार्ग अपनाना ही पड़ेगा।   

आज गांधी जी के पुण्यतिथि पर मुझे गांधी ही याद आ रहें हैं। विश्व का एक बड़ा हिस्सा गांधी से प्रभावित रहा है।  ऐसे में मैं  ध्यान कर रही हूँ कि अमेरिका में घूमने के दौरान मैंने कहाँ -कहाँ गांधी की मूर्ति देखी।  उन यादों और तस्वीरों के साथ मैं कामना करती हूँ की,  सबके जीवन में गांधी के शांति की शिक्षा उतरे। 

पहली तस्वीर, न्यू यॉर्क के “यून्यन स्क्वेर पार्क” की है। इस पार्क में गांधी जी की एक मूर्ति लगी है। यह पार्क मैडिसन स्क्वायर गार्डन से कुछ 20-30 मिनट की वॉकिंग दूरी पर होगा। मैडिसन स्क्वायर गार्डन वही, जहाँ 2014 में मोदी जी पहली बार अमेरिका आए और उनके भाषण को सुनने अमेरिका भर से 15-20हज़ार भारतीय पहुँच गए थें । उस वक्त हमलोग टेक्सस में रहते थे। कुछ समय बाद जब न्यू जर्सी में रहने को मिला। हम कई दफ़े न्यू यॉर्क गए। उसी दरमियान हमने इस पार्क में गांधी की मूर्ति लगी देखी।


दूसरी तस्वीर,  डलास  के इर्विंग शहर की है। डलास मूव होने के बाद हम अपार्टमेंट देख रहे थे। इसी दरमियान एक दिन घर ढूँढते हुए हमें एक पार्क दिखा। यह पार्क अपार्टमेंट वाली सोसाइटी के बिल्कुल सामने था। ऐसे में हमने सोचा घर देखने के बाद पार्क में भी थोड़ा घूम लिया जाए, होटल जा कर करना ही क्या था। पार्क में घूमते हुए हमारी नज़र गांधी जी की इस मूर्ति पर पड़ी। फिर मालूम हुआ कि यहाँ गांधी जयंती से लेकर 15अगस्त और 26जनवरी के दिन झंडा भी फहराया जाता है। 




तीसरी तस्वीर , अमेरिका की राजधानी 

वॉशिंगटन, डी॰ सी॰की है। यहाँ इंडीयन एम्बेसी के प्रांगण में भी गांधी जी की मूर्ति लगी है। यह जगह चेरी ब्लॉसम  के लिए प्रसिद्ध टाइडल बेसिन लिंकन मेमोरियल से करीब 9-10 मीनट की दूरी पर स्थित है।


 

चौथी तस्वीर जो आप देख रहें हैं, वह विस्कॉन्सिन राज्य के “मिलवाकी” शहर की है। यहाँ के कॉर्ट हाउस के आगे भी गांधी जी की मूर्ति लगी है। यह कॉर्ट हाउस यहाँ के फ़ेमस “पब्लिक मार्केट” से 2-5 मीनट की दूरी पर होगा। यह यहां के ऑर्ट म्यूज़ियम से भी करीब 20-25 मिनट की वॉकिंग दूरी पर है।


Wednesday, 27 May 2020

उसकी(हर) ख़ामोशी !!!

“द पास्ट इज़ जस्ट अ स्टोरी वी टेल अवरसेल्फ़स”
कहानी उसकी(हर) खामोशी की...

एक मीठी धुन उसकी खामोशी में गूँज रही है ;
ख़्वाब चुन रही है रात बेक़रार है
तुम्हारा इंतज़ार है, तुम पुकार लो …

धुन में डूबे दो प्रेमी युगल अपने काल और दुनिया से परे, किसी प्रेम लोक में डूबे हैं। कहते हैं एक दूसरे से, “अतीत सिर्फ एक कहानी है जो हम दुहराते हैं।”

थीयडॉर समन्था से कहता है, “मैंने किसी को ऐसे प्यार नही किया जैसे तुम्हें किया है।”
इधर अरुण राधा से कहता है, “तुम कहो और मैं ना मानूँ।”

उसकी खामोशी के साथ अब विदा की घड़ी आ गई है। नायिकाएँ जानती हैं कि अब उनके बस में कुछ नही सिवाए बर्बाद होने के। वे विदा माँगती है, पर दोनों नायक विरह की पीड़ा मात्र की कल्पना से तड़प उठते हैं। दोनो प्रेम से भरे हुए कभी आग्रह करते हैं तो कभी अधिकार जताते हैं ;

अरुण राधा से कहता है, “ मुझे छोड़कर मत जाना राधा।”
वहीं थियोड़ोर समन्था से बेचैन होकर पूछता है, “तुम क्यों जा रही हो समन्था ? नही तुम ऐसा नही कर सकती। हमलोग प्यार में हैं, तुम स्वार्थी क्यों बन रही हो?”

एक म्यूजिकल खामोशी पसर जाती है। आमने सामने सिर्फ़ दो ध्वनियाँ टकरा रहीं हैं।
एक अरुण की जो कहता हैं, “ राधा मुझसे प्रेम की ऐक्टिंग कर रही थी ये मैं मान नही सकता।”
और दूसरी समन्था की जो कहती है, “थीयडॉर,  मैं तुम्हारी हूँ भी और नही भी…”

बहुत कम ऐसा होता है कि कुछ फ़िल्में आपके ज़हन में एक अलग हीं मुक़ाम पा जाती हैं। ऐसा हीं कुछ “खामोशी” और “हर” के साथ है। यह पेचीदा सी कहानी जो मैंने ऊपर लिखी है वो दरअसल इन्हीं दो फ़िल्मों की कहानी है,ठीक वैसे हीं जैसे प्रेम सुलझा कहाँ होता…

अगर आपने दोनों फ़िल्मों को देखा होगा तो शायद आपको भी इसमें कई समानता दिखेंगी। हालाँकि दोनों के परिवेस और काल में अंतर है। एक सफ़ेद और काली दुनिया में प्रेम को रच रही है तो दूसरी चमक-धमक से भरी।

जहाँ खामोशी की राधा अपने गहरे कम संवाद से आपके मन पर गहरा छाप छोड़ती है, वहीं हर की समन्था अपने आवाज़ के जादू से आपको बांध लेती है।

एक तरफ़ राधा जो मानवीय प्रेम के ज़रिए मानसिक रोगियों को ठीक करने का ज़िम्मा लेती है। वहीं दूसरी तरफ़ समन्था एक ऑपरेटिंग सिस्टम है जो अपने शब्दों के ज़रिए लोगों के दिल में प्यार भर रही हैं। समन्था अपनी जानकारी से लोगों का जीवन सज़ा रही है और वहीं राधा अपने सेवा-भाव से मनोरोगियों का इलाज कर रही है।
संयोग देखिए बरस बीत गए पर दोनों ही काल में मनुष्य के मानसिक इलाज का ज़िम्मा प्रेम-पूर्ण स्त्री को हीं दिया गया है।

अंतत: दोनों ही नायिकाओं की दुनिया मानवों के विकास के साथ ध्वस्त हो जाती है। एक इंसान के प्रेम में पागल हो जाती है और दूसरी इंसान के नए पागलपन से अंत गति पा जाती है।

समन्था थीयडॉर के पूछने पर कहती है, “यह बता पाना मुश्किल है मेरे लिए की कहाँ जा रही हूँ पर कभी तुम वहाँ तक पहुँच जाओ थीयडॉर, तो मुझे ढूँढ लेना।”

वहीं पागलखाने के अंदर जाती राधा को देख कर अरुण कहता है ,” राधा मैं तुम्हारा इंतज़ार करूँगा।”

फिर एक मीठी धुन उसकी खामोशी में गूँज रही है;

आई ऐम लायिंग ऑन द मून
माई डियर, आइ विल बी देयर सून
इट्स अ क्वाइयट एंड स्टेरी प्लेस
टाइमस वी आर स्वॉलोड उप
इन स्पेस वी आर हियर अ मिलियन माइल्ज़ अवे…

Friday, 1 May 2020

तुम्हारी याद आई और कॉल कर बैठी। ये भी ध्यान नही रहा की अभी सो रही होगी। कैसी हो तपस्या ?
और मैं यह  मैसेज देख कर उछल पड़ी। बिना ठीक हूँ जबाब दिए पुछा , “तू ज़िंदा है और साथ हीं खिलखिलाहट भेजी।”
जबाब,” दो बच्चों की माँ, नौकरी, घर की चाकरी क्या ही ज़िन्दा होगी...  ऊपर से कभी ये तो कभी वो हा-हा-हा…”

मैंने कहा ,” छोड़ रोना ये बता याद कैसी आई मेरी ?” 
जबाब,” तेरे पैर देख लिए ना हा-हा-हा... तुझे याद है तेरा चप्पलों से प्रेम और उनकी तस्वीरें निकालना।”

हाँ याद है :)
जबाब, “ मैंने तेरी दो तस्वीर माँगी थी ना वैसे हीं जूतों के लिए। वहीं आज दिख गई।”

हा-हा-हा तू सच में पागल है। इतने साल से रखा है उसे। 
जबाब,” हाँ ना, सोचा ब्रह्माण के पैर हैं पूजती रहूँ :P उसपर से तेरे पैर से जलन तो आज तक है। देख अभी भी धुआँ हो रहा होगा।

दोनो तरफ़ से हँसी के फ़वारे हा-हा-हा…

सखी आगे कहती है , “आज जब फोन की मेमोरी भर गई तो सफ़ाई के दौरान ये मिली। अच्छा ये बता,  अब भी तू चप्पलें उतनी ही ख़रीदती है ? उनकी फ़ोटो निकालती है ?” 

जबाब, “ना रे अब ये कमबख़्त टूटते ही कहाँ है। तेरी पसंद वाली पीली जूती आज तक चमक रही है। हाँ ये हैं कि,  दुकान पर अगर जाती हूँ तो एक फेरा इस सेक्शन में ज़रूर लगाती हूँ हा-हा-हा…

कब सुधरेगी तपस… इशु कैसा है? शतेश कैसे हैं ? और बता…
बातें अथाह… क़रीब एक-डेढ़ घंटे की सारी भावनायें लिखना मुश्किल है, पर कहानी का सार ये की,” कभी मुझे चप्पलों के प्रति बड़ा आकर्षण था।” आज भी है पर थोड़ा कम हुआ है। कारण यहाँ चप्पलें टूटती हीं नही जल्दी और इन्हें रखने की जगह में अब तीन लोगों के पाव है। 

ख़ैर होता ऐसा की साथ की, साथ की लड़कियाँ जहाँ पर्स या कान की बाली या लिस्टिक ख़रीदने में व्यस्त होती और मैं कहानी की किताबों और चप्पलों की दुकान पर होती। हाँ चप्पलों की ख़रीदारी में तब एक और दोस्त साथ होती। पर उसे ब्रांडेड ही अधिकतर लेने होते। 
मेरे पैसे कभी इतने पैसे नही होते की हर सेंडिल ब्राण्डेड हो या हर किताब ओरिजनल। 

पुणे रहती थी तो “एफ सी रोड” और दिल्ली आने के बाद “सरोजनी नगर” ज़्यादा जाने लगी। कभी-कभी साकेत भी जाती, पर वो सिर्फ़ किताबों के लिए। साकेत में किताबें सेल में मिलती। डेढ़ सौ में दो किताब या कई बार 100 रुपए में दो किताब। 

मुझे कभी ब्राण्डेड चीज़ों से कोई ख़ास लगाव नही रहा। बजट में मिली तो लिया नही तो बस आराम, रंग और डिज़ाइन पसंद हो बिना ब्रांड की भी चीज़ें ले लिया। 

मेरा भाई तो कई बार मज़ाक़ भी उड़ाता कि, 200 रुपए की चप्पल के लिए 150 रुपया ऑटो का दे देती है। और मैं कहती कि , “बोका ये  भी तो देखो की डेढ़ सौ या दो सौ की दो-चार सुंदर -सुंदर सैंडल लाती हूँ।”  

इसके साथ ही कई बार सरोजनी में किताब बेचते एक अंकल मिल जाते। तो कई बार नक़ली किताबें भी ले आती। 
मुझे याद है की एक बार मेरे पास आने के पैसे हो छोड़ कर सिर्फ़ सत्तर-पचहत्तर रुपए बचे थे। अंकल के पास मुझे “वाइट टाइगर” किताब दिख गई। दाम पूछने पर मालूम हुआ 150 रुपए। 
मैंने कहा ठीक बताए अंकल कितने में देंगे ? मुझे थोड़ा अजीब लग रहा था 150 की चीज़ को 70 में देने को कहना। उसपर से विद्या माता, ज़्यादा मोल भाव ठीक नही लगता। 

उन्होंने ने कहा चलो 100 रुपए दो और ले जाओ। मैं बिना कुछ बोले वहाँ से जाने लगी तो उन्होंने ने आवाज़ देकर पुकारा, “ कितना में लोगी ? पहले भी किताब ले गई हो मुझसे इसलिए ख़ाली हाथ लौटाना ठीक नही लग रहा।”
मैंने झेंपते हुए कहा,” मेरे पास 70 रुपए है।”

किताब मेरी तरफ़ बढ़ाते हुए उन्होंने कहा ,” यह लो।” 
यह वाक़या सरोजनी की मेरी सबसे प्यारी याद बन गई। 

हम्म, तो चलिए वापस चप्पलों की तरफ़ लौटते हैं। इधर तो मैंने उनकी तस्वीरें निकालनी बंद कर दी, पर यादों के लैपटॉप से कुछ तस्वीरें मिली है उन्हें शेयर कर रही हूँ। 

हाँ एक बात और उन दिनों मैं सैंडिल की तस्वीर के साथ ख़ूब प्रयोग करती थी। कभी उनपर गाने चिपकाती तो कभी ताला :) 
कभी उन्हें स्विमिंग पूल के किनारे ले जाती तो कभी चेरीब्लोसम के फूल या फ़ॉलकलर के पत्तों के साथ बिठाती। कई तस्वीरें गुम हो गई। जो जमा पूँजी मिली वो ये रही।