Friday, 7 October 2022

अटका आँसू !

डूबते सूरज की तरह डूब रहे मन का हाल वह दहलीज़ क्या जाने जिसके पार समुंदर ना था। बर्फ़ से भारी, जमे चार पैर घिसट रहे थे खुद को। समय की गति धीमी… इतनी धीमी की घड़ी के काटें तक रुक गए। बहती आँखों के बीच जम गया था मन और उसी बीच एक बूँद खून के आँसू…

वह एक बूँद आँसू ना जाने देह में कहाँ भटक रही है। एक बूँद जो अटक गई है मन में या कभी दिमाग़ में, गले के नाल को निचोड़ कर छाती के पर या सुखी आँखों के परदे के भीतर। 

वह कौन सी घड़ी थी जब देह का रक्त सिर्फ़ लाल रंग था… रंग जो जाने कैसे झक पीला हो गया और फिर नारंगी…अचानक नीला… हे परमेश्वर! इस नीले का रंग मिलता है आसमाँ से जो फटने के पहले गरजता है, चमकता है, बरसता है… भीतर धड़कनों की मरोड़ उठी, एक आह देह का रोआ-रोआ बन पसर गई और सब शून्य हो गया। 

थावे मंदिर !

 नवरात्रि की बिहार और बंगाल में अलग ही रौनक़ होती है। माता के आने की तैयारी इतने धूम-धाम से होती है की नव दिन कैसे बीत जाते है मालूम ही नही चलता। जब मैं छोटी थी तो इस दस दिन का कितना इंतज़ार होता। स्कूल की छुट्टी से लेकर दस दिन माता के लिए फूल तोड़ना, घर में हो रहे रामायण पाठ को कई बार सुनना। भाग कर पंडाल तक जाना और उसमें बन रही मूर्तियों को देखना। ओ, आज हाथ बन गया, अरे सिर लगा दिया है, उफ़्फ़् मुख को ढँक दिया अब सप्तमी का इंतज़ार करना होगा। 

दुर्गा की पूजा घर-घर होती। कोई मंदिर जाता तो कोई घर पर ही पूजा -पाठ कर लेता। मेरी माँ घर पर पूजा पाठ करने वाली में से है। लोग इन दिनों थावे खूब जाते। माता के दर्शन करके आते और वहाँ की बातें बताते। मैं चकित होकर इन क़िस्सों को सुनती। सोचती की काश मैं भी थावे जाती…

तो चलिए आज हम थावे चलते हैं और रास्ते में थावे वाली मईया का क़िस्सा भी सुनते चलते हैं। 

 चेरो वंश के राजा मनन सिंह खुद को मां दुर्गा का बड़ा भक्त मानते थे। एक बार उनके राज्य में अकाल पड़ गया। उसी दौर में थावे में माता रानी का एक भक्त रहषु भगत था। रहषु पर माँ की कृपा थी। वह आकल से पीड़ित लोगों को माँ के चमत्कार से निकला अन्न देता था। वह घास को बाघ से दौनी करवाता और उससे चावल निकलने लगते। यह बात राजा तक पहुंची लेकिन राजा को इस बात पर विश्वास नही हुआ। वह रहषु के विरोध में उसे ढोंगी कहने लगा और उसे अपने दरबार में बुलाया। राजा ने रहषु से कहा कि अगर ऐसा है तो तुम मां को यहां बुलाओ। इस पर रहषु भगत ने राजा से कहा, राजा, यदि मां यहां आईं तो आपका राज्य को बबार्द कर देंगी लेकिन राजा नहीं माना। 

रहषु भगत के आह्वान पर देवी मां कामाख्या से चलकर पटना और सारण के आमी होते हुए गोपालगंज के थावे पहुंची और रहषु भगत का मस्तक चिर कर अपना सिर हाथ भर दिखाया की राजा के सभी भवन गिर गए। सारे लोग मर गए और राजा भी मर गया।  

 थावे वाली देवी के मंदिर को सिद्धपीठ के तौर पर माना जाता है। यहाँ हर साल हज़ारों भक्त आते है माता के दर्शन को। पहले तो माता के मंदिर में प्रवेश आसानी से मिल जाता था पर अब भीड़ की वजह से गेट के बाहर से ही इनका दर्शन करना पड़ता है। या फिर आपका कोई जुगाड़ हो तो शुक्रवार- सोमवार को छोड़ आप भीतर जा कर माँ का दर्शन कर सकते हैं। 

यहाँ भीड़ की एक बड़ी वजह शादी-विवाह भी है। लोग यहाँ शादी-विवाह, देखा-देखौकी के लिए भी आते है। मंदिर परिसर अब पहले से काफ़ी संयोजित ढंग से बन गया है। कभी बिहार जाए तो एक बार माता के दर्शन को ज़रूर जाए। यहाँ का प्रसिद्ध पीडिकिया खाए और पेड़ों से घिरे तालाब के किनारे कुछ पल बैठे। साथ ही एक छोटा पार्क भी है पर बिहार के पार्क के बारे क्या ही कहना…



Monday, 3 October 2022

गढ़देवी मईया !

भारत देश सच में चमत्कारों और क़िस्सों का देश है। आज अष्टमी के दिन माता गौरी की पूजा के बाद कुछ कथाएँ याद आई और एक रोचक बात भी। 

आपने सुना होगा या पढ़ा होगा, राजा दक्ष प्रजापति ने एक यज्ञ का अनुष्ठान किया था। उस यज्ञ मे बिना बुलाये उनकी पुत्री सती भी अपने पति से जिद्द करके वहाँ पहुंची, लेकिन वहाँ अपने पति भगवान शिव का कहीं स्थान नहीं देखकर, वह यह अपमान सहन नहीं कर पाई और यज्ञशाला के हवन कुंड में कूदकर अपने प्राणों की आहुति दे दी। 

इसके बाद वियोगी-क्रोधित महादेव, सती के शव को कंधे पर उठाकर तांडव करने लगे। उनका यह रौद्र रूप देख समस्त ब्रह्मांड भयभीत हो गया। प्रलय की स्तिथि हो गई। यह देख देवता गणों के आग्रह पर भगवान विष्णु ने प्रिया वियोग से भगवान शिव का ध्यान भटकाने के लिए सुदर्शन चक्र से आकाश में ही सती के शव के कई टुकड़े कर दिए। और फिर इनहि सती का जन्म “माता गौरी पार्वती” के रूप में हिमालय के यहाँ हुआ। 

कथा तो हो गई पर जो रोचक बात रही वह यह की, सती के शव के टुकड़े जब हुए तो उनके खून के छींटे बिहार के मढ़ौरा में भी पड़े। जहां बाद में “गढ़ देवी मंदिर” की स्थापना हुई। 

लोक कथा यह भी है कि शक्ति पीठ मंदिर थावे, जिसके बारे में पिछले पोस्ट में बताया था कि माता के भक्त “रहसू भगत” के बुलावे पर माता कौड़ी कामाख्या से चलकर जगह-जगह विश्राम करते हुए थावे पहुँची थी।  इस दौरान माता ने थावे पहुंचने से पहले मढ़ौरा के इसी गढ़देवी मंदिर के पावन स्थल पर विश्राम किया था। यहीं वजह है कि यहां माता की दो-दो पिंडिया स्थापित हैं और यह स्थल भी सिद्ध शक्तिपीठ के रूप में जाना जाता है। 

वैसे तो छपरा ज़िला के मढ़ौरा के गढ़ देवी मंदिर का इतिहास बहुत पुराना है और सालो भर यहाँ भक्तों का भीड़ लगी रहती है। यहाँ का प्रांगण पहले की तुलना में थोड़ा बड़ा और साफ़-सुथरा हुआ है। हाँ, यहाँ आने पर आपको एक और रोचक चीज़ देखने को मिलेगी,

वैसे तो सभी मंदिरों के मुख्य दरवाजे पूरब की ओर होती है, लेकिन मढौरा के गढदेवी मंदिर में पूजा करने वाली मुख्य मंदिर का गेट पश्चिम की तरफ है। कहते हैं यह भारत देश का पहला मंदिर है, जहाँ पूजा करने वाली गेट “पश्चिम” की तरफ है। 

इसके बारे में यह सुना है कि जब अंग्रेज यहां आये तो मढौरा में उद्योग लगाने की इच्छा से यहां की मन्दिर और मान्यताओं से अंजान थे। वे मंदिर को अनदेखा कर यहाँ आस-पास काम करने लगे पर वह कार्य सफल नही होता। ऐसे में अंग्रेज अफ़सर परेशान-परेशान। 

एक रात एक अंग्रेज को माता ने सपने में मंदिर के पास कार्य कराने से मना किया। अंग्रेजों ने इसे मानने से इंकार किया और यह सन बातें बकवास बताई। लोगों की आस्था और मज़दूरों का विश्वास देख फिर उस अफ़सर ने कहा, “यदि तुम्हारी माता स्वयं शक्ति है तो चमत्कार करें।” और फिर मंदिर का जो गेट खुद ब खुद सुबह होने से पहले पूरब से पश्चिम हो गया। सुबह अंग्रेजों ने यह देखा तो उनके होश उड़ गए और उन्होंने माता से माफ़ी माँग वहाँ से थोड़ी दूर हटकर मढौरा में चीनी मिल, मोर्टन मिल, सारण इंजीनियरिंग और डिस्ट्रिल वाटर की चार फैक्ट्रियां स्थापित की। 

बिडंबना यह की बिहार सरकार इन चारों फैक्टरियों में से किसी को भी बाद के समय बचा नही पाई। मंदिर के सिवा ये सब अब खंडहर है… 

Sunday, 29 May 2022

रिले !!

 सम्मान क्या होता है, कैसे दिया जाता है यह व्यक्ति और समाज के ऊपर निर्भर करता है। कई बार इंटरनेशनल बुकर प्राइज़ भी लोगों के लिए मायने नही रखती तो कई बार बच्चों की कविता लिखने वाला कवि भी इतना सम्मान पाता है की उसके शहर को उसके नाम से रंग दिया जाता है। 

अमेरिका के क़रीब 43-44 स्टेट घुम चुकी हूँ। पर किसी लेखक के प्रति इतना सम्मान इंडियापोलिस में ही देखने को मिला। जबकि अमेरिका को महान बनाने में कई बेहतरीन लेखक का नाम जुड़ा है। 

आज हम चलते है, “जेम्स व्हिटकॉम्ब रिले” के घर। एक ऐसे कवि जिन्होंने बच्चों की कविताएँ लिख कर अमेरिका में खूब नाम कमाया और एक समय में सबसे ज़्यादा बिकने वाले लेखक के रूप में शुमार हुए। वह अलग बात है कि बाद के दिनों में इंडिनापोलीस से लेखक “कर्ट वोनगुट” और “जॉन ग्रीन” नाम  विश्व पटल पर ज़्यादा प्रचलित हुआ। लेकिन, आप कभी इंडीयनापोलिस आए तो आपको रिले ही रिले दिखेंगे। इनके नाम म्यूज़ियम, बच्चों के हॉस्पिटल, कुछ प्री स्कूल दिख जाएँगे। यहाँ तक की आम दुकानें जैसे कार शॉप, जेनरल स्टोर, लाइब्रेरी का कुछ भाग और शहर की कुछ दिवार भी रिले नाम से रंगे मिले जाएँगे। जब मैं यहाँ पहली बार आई थी तो लगा कि यह रिले क्या है जो हर तरफ़ दिख जाता है। यह कोई स्टोर चेन जैसा कुछ है क्या ? और फिर एक दिन शिकागो जाने के रास्ते में यह नाम फिर दिखा तो फटाफट गूगल किया। मालूम हुआ यह तो यहाँ के एक कवि का नाम है।

 मैं चकित थी कि “एडगर ऐलन पोय” का घर हम बोस्टन में ढूँढते रहे पर मिला नही। इलिनॉस (शिकागो) के लेखक हेमिंवे के नाम एक स्ट्रीट और उनका घर म्यूज़ियम के रूप में है। सिल्वीया प्लाथ बॉस्टन में जहाँ जन्मी, वहाँ अब एक हॉस्पिटल है। ऐसे ही मार्क ट्वीन फ़्लॉरिडा में जन्में यह मुझे फ़्लोरिडा से आने के बाद मालूम हुआ। न्यू यॉर्क की तरफ़ तो कई लेखक रहे पर उनमें से कई की जानकारी बाद में हुई। अल्बमा जाना हुआ तो वहाँ रोकेट सेंटर और मोंटोगामेरी घूमना हुआ। पर बाद में मालूम हुआ की उसी मोंटग़ेमेरी में To Kill a Mockingbird" के लेखक हार्पर ली का जन्म हुआ था। 

ख़ैर दुनिया में इतनी सारी बातें हैं, क़िस्से हैं कि एक इंसान की बस की बात नही। कोई किसी को नही जानता इसमें कोई बुराई नही और ना किसी के काट देने से किसी की कृति नष्ट हो जाएगी। लाख नकार दें पर उसका अंश मात्र कहीं ना कहीं रहेगा ही इस ब्रह्मांड में। 

तो चलिए आज तस्वीरों के ज़रिए घूमते है होसियर कवि, रिले के घर। और हाँ, जिसने भी कहा है पर सच कहा है, “ जिसने बच्चों का मन जीत लिया उसने दुनिया जीत ली”  

नोट- यहाँ हम कोरोना काल में गए थे। उस वक्त इनके घर रूपी म्यूज़ियम में मरम्मत का काम चल रहा था पर हमें इनके छोटे से कैम्पस में घूमने की आज्ञा मिल गई थी। 

Tuesday, 17 May 2022

प्रेम शांति !!

सूर्योदय और सूर्यास्त को देख कई बार भ्रम हो जाता है कि यह उगता सूरज है या डूबता… चक्कर तो हमारी पृथ्वी के पैर में लगा है पर हम मानते है कि सूरज डूब गया या उग गया। कुछ इसी तरह का हाल हमारे दिमाग़ के तन्तुओं का हैं। आँखें जो देखतीं है, कान जो सुनता है उसकी सूचना फटाफट ‘नियोकॉर्टेक्स’ तक पहुँचती है। 

 नियोकॉर्टेक्स दिमाग़ का वह ग्रे भाग है जो संवेदी धारणा, अनुभूति, तर्क-वितर्क का काम करता है। ग्रे मैटर से बना यह भाग सच में ग्रे है। तभी तो एक ही बात पर किसी का तर्क आपको कभी अच्छा लगता तो कभी कुतर्क। 

विश्व में आए दिन हो रही हिंसा को कभी आप जायज़ मान लेते हैं तो कभी नाजायज़। यूक्रेन के युद्ध को सही और रसिया को ग़लत… हिंदू को सही मुसलमान को ग़लत… गोरे को सही काले को ग़लत… यहाँ तक की भोलेनाथ सही और अल्लाह ग़लत…

यह ग्रे मैटर ही है जो बीते दिनों यहाँ एक 17 साल के गोरे लड़के से 10 अश्वेत लोगों का क़त्ल करवा देता है… यह ग्रे मैटर ही है की बीते दिनों यहाँ एक भारतीय लड़के को बुरी तरह मिड्डिल स्कूल में बुली करवा जाता है। यह ग्रे मैटर ही है जो बीते दिनों ताईवानी लोगों पर एक चर्च में हमला करवा जाता है। 

पर इन सब के बावजूद दुनिया ग्रे से ही चल रही। तो क्यों ना हम अपने नियोकॉर्टेक्स और विश्व शांति के ख़ातिर एक बार इस खूबसूरत ग्रे को वैसे ही बैलेंस करें जैसा काला और सफ़ेद… और इस ग्रे के बीच एक नारंगी आभा का उदय हो जो सिर्फ़ प्रेम , शांति , सौहार्द सौमनस्य ले कर आए।

Tuesday, 12 April 2022

लव इन द टाइम ऑफ़ कॉलरा !!!

एक किताब जिसे सालों पहले पढ़ी तो असमंजस में रही कि यह कैसा नायक है? यह कैसा प्रेम है?  कैसी कहानी है यह…यह तो देह के ज़रिए देह को संतुष्टि करने वाली बात है। यहाँ मन की तो बात ही नही। 

उस वक्त किताब के कुछ हिस्से ठीक नही लगे थे। ऐसे में उन दिनों किताब पर जो राय दी थी, उसमें नायक के प्रति रोष ज़्यादा था। प्रेम और दया कम महसूस हुई थी। इन दिनों मेमोरी में इसे देख फिर से इसके कुछ पन्ने पलटने का मन हुआ। 

किताब है, “लव इन द टाइम ऑफ कॉलरा”

इस किताब का नायक शारीरिक रूप से कुरूप और स्टोकर लगता है। उसके जीवन में प्यार कुछ ऐसे आता है कि बस वह प्रेम ही हो जाता है। वह पूरी तरह प्रेम में डूबा होता है कि एक दिन जबाब पाता है, “उसकी प्रेमिका के मन में अब उसके लिए प्रेम नही बचा।” उसकी हालत कॉलरा के मरीज़ों जैसी हो जाती और फिर शुरू होता है इंतज़ार का एक अजीब तरीक़ा। 

अपने लम्बे जीवन काल में वह 622 औरतों से सम्बंध बनता है। कई वन नाइट स्टैंड होते फिर भी उसके मन को सुकून नही मिलता। नायक के अनुसार यह देह को देह की ज़रूरत भर है। उसके मन का सम्बंध तो सिर्फ़ नायिका तक ही सिमटा है…वह अब भी उसके इंतज़ार में है। प्रेम में इंतज़ार ही प्रेमी का प्रेम है। 

ख़ैर, सालों पहले भी मुझे इंतज़ार का यह तरीक़ा ना रुचा, ना अब। हाँ, इस बार यह ज़रूर हुआ कि मैं नायक से उस क़दर रोष नही कर पाई जैसी पहली बार हुआ था। शायद इस तरह के प्रेम को समझने की अब भी बुद्धि विकसित नही हुई या फिर इस किताब को एक बार फिर उम्र के किसी और पड़ाव में पढ़ना होगा। 

किसी के इंतज़ार में इतना सिमट जाना कि देह, रोग और प्रेम में अंतर ही ना हो…क्या ऐसा इंतज़ार हो सकता है भला? क्या इतना इंतज़ार हो सकता है? क्या तब तक प्रेम बचा रह सकता है? क्या इंतज़ार प्रेम को धीरे-धीरे मार नही देता? 

प्रेम को समझना आसान को जटिल बनाना है। 

इस बार इसे पढ़ते हुए कई बार लगा कि लिखते वक्त लेखक ने इस उपन्यास में देह को प्रेम से अलग रखा है। तभी तो अविवाहित नायक सैकड़ों स्त्रियों से सम्बंध बनाने के बावजूद जीवन के 91वें वर्ष में जब नायिका से मिलता है तो खुद को वर्जिन कहता है। किताब पढ़ते हुए आप पाएँगे कि इन तमाम संबंधो के बीच भी नायक का  मन हमेशा नायिका के लिए व्याकुल-एकनिष्ट रहा है। 

इंतज़ार के इन पलों को काटने के लिए उसका तरीक़ा निर्मम और दैहिक ज़रूर रहा पर इन्हें पढ़ते वक्त मुझे, “अहमद फ़राज़” अचानक  याद आए। वाक़या है, नायक ने पहली बार नायिका के “हाँ” कहने पर गुलाब की सैंकड़ों पंखुड़ियाँ खा ली थी। कहीं वहीं गुलाब विरह के दिनों में उसके शरीर रूपी किताब में सुख तो नही रहें थे…उसके सूखे नुकीले छोटे-छोटे काँटे जब-तब उसे चुभते रहते… उन पंखुड़ियों की लालिमा उसके खून के साथ हृदय तक दौड़ रही होंगी… मन में उम्मीद की सुगंध बिखेर रही होगी…51 वर्ष, 9 महीने और चार दिन के एकतरफ़ा प्रेम में गुलाब, पंखुड़ी दर पंखुड़ी अलग होती गई होगी कि, वह आएगी या नही…उम्र की आख़िरी पड़ाव और आख़िरी पंखुड़ी पर अटका मन, अहमद फ़राज़ से कह उठा होगा- तुम तो शायर हो फ़राज़,  तुम्हीं लिख दो ना मेरे इंतज़ार के ये साल मेरे महबूब के नाम…कि उम्र के 91वें बरस, अब ना मिले तो शायद ख़्वाबों में मिलें…उसके प्रेम में खाए फूल मेरी कब्र की किताब पर मिले…कि,

अब के हम बिछड़े तो शायद कभी ख़्वाबों में मिलें 
जिस तरह सूखे हुए फूल किताबों में मिलें

ढूँढ उजड़े हुए लोगों में वफ़ा के मोती 
ये ख़ज़ाने तुझे मुमकिन है ख़राबों में मिलें 

तू ख़ुदा है न मेरा इश्क़ फ़रिश्तों जैसा 
दोनों इंसाँ हैं तो क्यों इतने हिजाबों  में मिले

और यह आख़िरी शेर तो जैसे फ़राज़ ने इनके अंतिम भेंट के लिए ही लिखी है कि, जब दो वृद्ध जवानी की उन्माद से इतर, झूर्रियों और झूलते-लटकते हाड़-मास के साथ आलिंगनवध थे…नदी, नाव और एक दूसरे में सिमटे दो लोग अपने पुराने दिनों को याद करते है…निर्वस्त्र नायिका अपने देह को ढाँपते हुए कहती है-  मुझे मत देखो, अपनी आँखें बंद कर लो…

कभी उन्माद से भरा नायक आज संयम और धीरज के साथ कहता है- पर मेरा प्रेम ज़रा भी कम ना हुआ…

अब न वो मैं हूँ न तू है न वो माज़ी है "फ़राज़"
जैसे दो शख़्स तमन्ना के सराबों में मिलें


Wednesday, 6 April 2022

लिस्नर !!


कल मैंने फ़िल्म, “हे सिनामिका” के बारे में लिखा था। इस फ़िल्म में नायक को ज़्यादा बोलने की आदत है। पर आजकल सुनना कौन चाहता है ? जीवन के भागदौड़ में किसी के पास किसी को सुनने की फुर्सत कहाँ? अगर किसी के पास फुर्सत भी है तो वो आपकी ही सिर्फ़ क्यों सुनेगा? उसके अपनी भी तो हज़ारों बातें होंगी, हज़ारों तकलीफ़ें होंगी। वह भी उसे सुनाना चाहता होगा।

दुनिया सोशल मीडिया पर जितनी वोकल है उतनी ही आम ज़िंदगी में अकेली। देखा तो होगा ही आपने घर -घर मोबाइल, हाथ-हाथ मोबाइल। पड़ोस में क्या हो रहा है वह भी कई बार फ़ेसबुक अपडेट से मालूम होता है। 

अभी एक -डेढ़ महीने पहले बाबा जी बता रहें थे कि, “ अब घूर कहाँ कोई लगावे… सब लोग अपना-अपना घर में हीटर तापेला।”

 घूर, सर्दियों में सबसे मज़ेदार मीटिंग स्थल होता। लोग दुनिया जहान की बातें आग को घेरे करते रहते। घंटा-घंटा कब बीत जाता पता ही नही चलता। घूर और घोनसार एक समय में रियल फेसबुक था। यहाँ रिएक्शन और कमेंट तुरंत सामने मिलता। वह सब सिमट कर अब एक कोने में फ़ोन के साथ जुड़ा है। 

इस तरह के माहौल ने हर चीज़ को बाज़ारवाद  से जोड़ दिया है। ऐसे में क्या आपको मालूम है कि, सिर्फ़ सुनने के लिए भी आप पैसे दे कर किसी को हायर कर सकते हैं? 

जी हाँ, सही पढ़ा आपने। पैसे देकर कर किसी को अपनी मन की बात सुनाना।

“ लिस्नर” एक जॉब प्रोफ़ाइल है जो लोगों की मन की बात सुनते हैं। ऐसे लोग आमतौर पर मेडिकल या कोर्ट ट्रायल के लिए पहले से ही काम कर रहे हैं लेकिन आजकल के तनाव और अकेलेपन के जीवन में इनकी डिमांड अब  ज़्यादा बढ़ गई है। ये लिस्नर पर घंटे के हिसाब से सुनने का काम करते हैं। ये बस आपको सुनते रहते हैं। कोई सुझाव या ज्ञान नही देते ना ही बीच में टोक-टाक। बस कुछ ऐसा कि बोल ले भाई/बहन, कर लें अपना मन हल्का। 

तो अगर आप सहनशील है, दूसरों की बातें घंटों सुन सकते है बिना प्रभावित हुए फिर आप एक गुड लिस्नर है। ऐसे में आप चाहे तो इस क्षेत्र में भी कैरियर ऑप्शन चुन सकते हैं। लेकिन, लेकिन इसके लिए अपनी भावनायें आपको घर पर छोड़ कर जानी पड़ेगी, नही तो दूसरों की उदासी, क्रोध, बेबसी, घुटन सब आप अनजाने में खुद के भीतर भर लाएँगे। "

एक Calvin एक अच्छा श्रोता बनने के लिए एक महान व्यक्ति की आवश्यकता होती है ."

Calvin Coolidge.

के लिए एक महान व्यक्ति की आवश्यकता होती है ."

Calvin Coolidgeलिस्नर के ऊपर बनी यह शॉर्ट फ़िल्म देखिए और सोचिए आने वाले समय में हम कहाँ जा रहें है….