Wednesday, 11 October 2017

कब्रिस्तान !!!

वीकेंड हमारा घूमने के नाम फिक्स होता है। कही ना कही जरूर ही जाते है ,जबतक कोई मौषम की गड़बड़ी ना हो या अपनी तबियत की गड़बड़ी ना हो। इसी तरह दुर्गा पूजा वाले वीकेंड को, हमने ब्रज टेम्पल जाने का प्लान किया। सच बताऊँ तो मुझे अमेरिका का कंट्री साइड यानि छोटे -छोटे गाँव जवार के रास्ते और गाँव  ही ज्यादा पसंद आते है। हो सकता हो छोटे जगह से आने का असर हो। खैर मंदिर जाने का रास्ता बहुत ही सुन्दर है। उसकी तस्वीरों के साथ फिर कभी मिलूंगी। आज कब्रिस्तान की बात करनी है।
हुआ यूँ ,रास्ते में मुझे एक कब्रिस्तान दिखा। सुन्दर -सुन्दर फूल लगे थे उसमे। सड़क से बिल्कूल सटे। चलती गाडी से ही एक दो फोटो लेकर ,मैं कुछ सोचने लगी। सोच रही थी कि ,यहाँ अबतक की अंतिम यात्रा नही देखी। कैसी होती होगी ?क्या -क्या होता होगा ? फिल्मों में तो कई बार देखा है ,पर कभी किसी क्रिस्चन के फ्यूनरल को सच में नहीं देखा। 
हाँ एक बार डेज़ी से बातचीत में मालूम हुआ था कि ,ईसाई लोग दफ़ना ज्यादा पसंद करते हैं। लेकिन लोग अब खर्च और जगह की कमी को ध्यान में रखते हुए दाहसंस्कार भी कराने लगे हैं। पर जो रूढ़िवादी ईसाई हैं वो आज भी दफनाना ही पसंद करते है। 
विषय से ना भटकते हुए तपस्या कब्रिस्तान देखने और सोचने पर आओ। हाँ फिर बहुत कुछ सोच रही थी जो बाद में बताऊँगी। अभी हुआ यूँ कि ,खूबसूरत वन वे रोड से निकल कर हमलोग हाईवे पर आ गए। स्पीड लिमिट 50 की थी ,पर गाड़ियाँ रेंग रही थी। ऐसा भी नहीं था कि ,ट्रैफिक हो या कोई एक्सीडेंट दिख रहा हो जीपीस में। वही दूसरे लेन में कोई गाडी ही नहीं जा रही थी। मैं और शतेश हँस रहे थे कि हुआ क्या है ? लोग इतनी कम स्पीड में क्यों जा रहें ? दूसरी लेन में कोई जा क्यों नहीं रहा ? शतेश बोले ऐसे रेंगने से अच्छा दूसरी लेन में चल लेते है। फिर पता नहीं मुझे क्या सुझा मैंने कहा रहने दो। लोग इतने बेवकूफ तो नहीं  शायद आगे रोड बंद हो। काफी जगह रोड का काम भी चल रहा था। खैर हमलोग भी उसी लेन में रेंगते रहे। कुछ 20 मिनट आगे जाने के बाद एक मोड़ था ,जहाँ एक आदमी काले कोट में एक तख्ती लिए खड़ा था -फ्यूनरल ट्रैफिक। भगवान् कसम मैं थोड़ी शॉक्ड रह गई। ये क्या अभी यही सोच रही थी कि ,किसी की अंतिम यात्रा नहीं देखी यहाँ और ये देखो।
जो दूसरा लेन ख़ाली था ,उसपर आगे लाइन से गाड़ियाँ जा रही थीं। सबके ऊपर एक छोटा सा झंडा लगा था ,जिसपर फ्यूनरल लिखा था। मैं और शतेश उन गाड़ियों को देख बात करने लगे कि ,कितना शांत और सम्मान के साथ अंतिम यात्रा चली जा रही है। हमारी लेन की गाड़ियाँ मोड़ के  बाद तेज हो चुकीं थी। फिर कुछ 25 /30 गाड़ियों के बाद हमें एक बड़ी सी गाडी में कॉफिन (शव का बॉक्स ) धुँधला सा दिखा। उसके आगे कुछ गाड़ियाँ बेहद धीरे चल रहीं थी। मैंने शव को प्रणाम किया ,मुक्ति की प्रार्थना की और फिर सोच में डूब गई। शतेश भी चुप थे। शायद वो भी कुछ सोच रहे हों। 
*अब जो कुल मिला कर मेरी सोच थी वो ये रही -मुझे डेज़ी की बातें याद आ रही थी कि -कैसे क्या होता है ।यहाँ अंतिम यात्रा के लिए ज़्यादातर लोग पहले ही अपने लिए किसी फ्यूनरल होम से बात करके प्लॉट बुक कर लेते हैं ।अपनी अंतिम इक्षा की गति अपने घरवालों या किसी पेज पर लिख कर रखे रहते है कि ,उन्हें जलना है या दफनाना ।जो ऐसा नहीं कर पातें उनके परिवारजन या मित्र अपने हिसाब से जो ठीक लगे कर देतें हैं ।यहाँ कब्रिस्तान भी दो होतें हैं -एक ग्रेवयार्ड (जो चर्च के अधीन होता है या चर्च का हिस्सा होता है )दूसरा समेटरिज (ये प्राइवेट प्रॉपर्टी होती है )
ग्रेवयार्ड के भरने के बाद समेटरीज बनाई गई ।डेज़ी के अनुसार यहां भी प्रार्थना उसके बाद भोज होता है ।सब दो या तीन दिन में निपट जाता है ।ये परिवार और मरने वाले की ईक्षा के अनुसार होता है ।
पता नहीं आज मैं ये सब क्यों आपसब तक पहुंचा रही हूँ ।बस मुझे लगा जैसे मेरी जानने की ईक्षा थी शायद औरों को भी हो ।
नोट :- लोग यहां कब्रिस्तान भी घूमने जाते हैं ।कई फेमस कब्रिस्तान ने जाने की फी भी लगती है ,गाइड भी होते हैं ।अभी हैलोवीन आने वाला है तो यहाँ कुछ प्रोग्राम भी होते हैं । मेरा भी बड़ा मन था ,लूसियाना का सेंट लुइस सिमेट्री और विर्जिना का अर्लिंग्टन नेशनल सिमेट्री (सिविल वॉर के सैनिकों के साथ जॉन एफ कैन्डी का भी शव दफन है )देखे का ।गई दोनों जगह पर लूसियाना में उस दिन बारिश हो गई ।वर्जिनिया वाले का टिकट एक आदमी 49 डॉलर। मतलब दोनों का लगभग 100 डॉलर। शतेश मेरा मज़ाक उड़ाते हुए बोले की -श्मशान देखने में समय और इतने पैसा तपस्या ही बर्बाद करने का सोच सकती है। मैंने भी जोक को सीरियसली लिया और जाने से मना कर दिया। खैर अब नहीं देखा तो नहीं देखा। देखिये गूगल से ली हुई तस्वीर। 
पहली लुसियाना की :- जहाँ कब्र मिट्टी के ऊपर घर जैसे बने है।दूसरी सिविल वॉर के सैनिकों की।
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Friday, 22 September 2017

ब्रह्मचारिणी माता का तप रूप !!!

दुर्गा पूजा का दूसरा दिन ।
यहाँ पर जीसस के देख रेख में सब सामान्य है ।पर भोले बाबा की नगरी में ,इन पावन दिनो में भी माँ के रूपों का हनन हो रहा है ।ऐसे में या तो भोलेनाथ समाधि में लीन है ,या उन्हें लगता है कि देवी ख़ुद समर्थ हैं ।ये पापी राक्षस कब समझेंगे की ,चाहे युग कोई भी क्यों ना हो ।नारी का अपमान विनाश का कारक होता है ।
आज "माँ ब्रह्मचारिणी "रूप में हैं तो क्या हुआ ? कभी तो काली रूप धरेंगी ।तब तुम अपना नाश देखना अधर्मियों ।
माँ के शांत स्वरूप को उनकी कमज़ोरी समझ रहें हैं ये लिजलीजे कीड़े ।
जब यहीं कोमल शरीर हज़ारों -हज़ार साल तप करके ।कभी फल -फूल तो कभी निर्जला व्रत करके ।अपने संयम और प्रेम से भोले अगड़भंगी को वश में कर सकती हैं ।फिर तुम जैसे गंजेडी -लफ़ंगो की क्या औक़ात ।
माँ आपके ब्रह्मचर्य को दुनिया अबला समझ रही है ।मुझे आपके महाकाली रूप का इंतज़ार है ।या तो आप सर्वनाश करें या फिर इस नफ़रत और घृणा से भरे समाज में प्रेम का संगीत घोलें ।

सबकी मनोकामना पूरी करने वाली माँ मेरी भी विनती सुन ले ।आपने माता सीता की प्रार्थना स्वीकार कर ,उन्हें राम को वर स्वरूप दिया ।पर मुझे किसी राम की इक्षा नही ।
मुझे तो बस इस दुनियाँ में अपने तरीक़े से स्वतंत्र जीने का वरदान दो ।अपने तरीक़े से राम या रावण चुनने की आज़ादी दो ।मुझे कोई डर -भय ना हो अपने इस नारी स्वरूप को लेकर ।
हे माँ ! मेरी  इस प्रार्थना को स्वीकार करो ।
https://youtu.be/LVIL0qPdo0U


Thursday, 21 September 2017

शैलपुत्री ,गिरिराज नंदनी !!!

दुर्गा पूजा शुरू हो चुकी हैऔर  मुझे बसंतपुर की याद आ रही है। कभी वहाँ के पंडाल की तो ,कभी दिन -रात बजने वाले भोंपू की।दिन -रात बजने वाले भक्ति गीतों से मानो भक्तिमय माहौल हो जाता ।उस वक़्त गीत भी अपने पारम्परिक मैया के गीत या पचरा बजते ।आज की तरह नही धिंचिक टाइप ।आवाज़ भी इतनी की जिससे किसी को परेशानी ना हो ।सच में बसंतपुर में हमेशा बसंत ही रहता ।कॉलोनी में बैठे -बैठे आते -जाते लोगों की झुण्ड को देखना। सुबह उठ कर फूलों की रखवाली करना।रोज हनुमान चालीसा पढ़ना।दस दिन स्कूल की छुट्टी और हमारी मौज ।एक ही दिन सारा होमवर्क करके आठ दिन खेलते रहते ।कितना उत्साह रहता नवमी का ।

यहाँ तो सब दिन एक ही जैसे ।त्योहार भी शांति से आकर चले जाते हैं ।मंदिर में सुविधानुसार शनिवार या रविवार को फ़ंक्शन होता है ।सज धज कर जनता वही इकट्ठा हो त्योहार मना लेती है ।बाक़ी अपने -अपने घरों में सब पूजा -पाठ कर ही लेते हैं ।यू ट्यूब से मैया के गीत सुनकर ख़ुश हो लेते है ।

आज दुर्गा पूजा का पहला दिन यानी "शैलपुत्री माता " का दिन है ।माँ के नव रूप में प्रथम ।शैलपुत्री नाम माँ का पर्वतराज हिमायल के पुत्री होने के कारण पड़ा ।माँ के इस रूप को पार्वती या हेमवती भी कहते हैं ।
कहा जाता है कि ,पार्वती जी सती का ही दूसरा रूप हैं ।
सती जब अपने पिता के अपमान से क्रोधित होकर आत्मदाह कर लेती हैं ।तो उनका अगला जन्म पार्वती के रूप में पर्वतराज हिमालय के यहाँ होता है ।
शैलपुत्री को प्राकृति भी माना जाता है ।पर्वत ,वायु ,वन ,भूमि सबका मिश्रित रूप ।
माता दुर्गा के इस रूप को कोटि -कोटि प्रणाम ।
साथ ही गिरिराज नंदनी की वंदना करते हुए अश्विनी भिंडे जी को सुने ।
https://youtu.be/3dQBbgns


Friday, 15 September 2017

जितिया व्रत और कथा !!!

तीज पर मैंने कई पोस्ट पढ़े कि,क्यों पुरुषों के लिए व्रत रखें? पर जितिया के लिए हर जगह सन्नटा था। संतान मोह होता ही कुछ ऐसा है। इसमें कुछ सही गलत नही लगता। बस हमारे बच्चें स्वस्थ रहें, ख़ुश रहें यही हर पल कामना होती है। हालाँकि ये व्रत भी पुत्र के लिए ही किया जाता है। पर कुछ माएँ अपवाद भी तो होती हैं। जैसे की मेरी माँ।
तो चलिए कहानी के शौक़ीन लोगों को व्रत कथा भी सुनाई जाए।
व्रत :-जितिया।
मनोकामना :- वंश वृद्धि ,संतान दीर्घायु हो।
पूजन :-शिव -पार्वती, गणेश के साथ जितबानन गोसाई की पूजा।
विधि:- निर्जला उपवास। नदी के तट पर कथा सुनना। पार्वती माँ की शृंगार सामग्री के साथ गणेश जी के लिए कुछ खिलौने, प्रसाद, दान -दक्षिणा और अगले दिन पारन।

कथा :- जितिया कथा में तीन कहानियाँ सुनाई जाती है। जब छोटी थी तो माँ के साथ नदी किनारे जाती। कहानियों से शुरू से ही लगाव की वजह से औरतों के बीच बैठ कर मैं भी कथा सुनती। एक साथ तीन -तीन कथा पंडित जी सुनाते। अगर कोई महिला बीच में बात करने लगती तो मोटकू पंडित जी ग़ुस्सा हो जाते। कथा छोड़ कहते “कथा सुने आएल बानी लोग की पंचायत करे ?” बतिया ली लोग हम जा तानी।
कुछ औरतें पंडित जी के प्रकोप से डर कर चुप हो जाती तो कुछ पंडित जी को छेड़ने लगती। हमारे यहाँ पंडित जी से मज़ाक़ या शादी-ब्याह में उनके नाम से गाली गाना कोई नई बात नही।
इधर मैं तबतक अपने दोस्तों के साथ नदी किनारे खेल कर आ जाती। कारण पंडित जी तो अभी प्रवचन लम्बा चलेगा।

वैसे जितिया के बारे में ये प्रचलित है कि, जिसको पुत्र होगा वही करेगा। मेरी माँ कथा के बाद पहले मेरा ही नाम लेती फिर भाई का। कई औरतें माँ को टोक भी देती “येजी पहले बेटा के नाम ली।”
"माँ मुस्कुरा कर कहती -मेरे लिए पहले लव्ली फिर चुलबुल।"

ख़ैर मेरी राम कहानी से आगे जितिया की कथा तक पहुँचते हैं ।
पहली कथा :-एक बार एक जंगल में चील और सियारीन घूम रहे थे, तभी उन्होंने कुछ महिलाओं को नदी के किनारे इस व्रत को विधि पूर्वक करते देखा और कथा सुनी। चील ने इस व्रत को ध्यानपूर्वक देखा और श्रद्धा पूर्वक व्रत का पालन किया। वही सियारीन का ध्यान बहुत कम था। उसने व्रत तो किया पर रात को भूख लगने के कारण, माँस खा लिया। व्रत के पुण्य से चील की संतानों को कभी कोई हानि नहीं पहुँची। वहीं सियारीन की सभी संताने एक एक कर मृत्यु को प्राप्त हो गाई।

दूसरी कथा :-महाभारत युद्ध के बाद अपने पिता की मृत्यु से अश्व्थामा बहुत क्रोध में था। बदले की भावना से उसने पांडवो के शिविर में घुस कर सोते हुए पांच लोगो को पांडव समझकर मार डाला।लेकिन वे सभी द्रोपदी की पाँच संताने थी।उसके इस अपराध के कारण अर्जुन ने उसे बंदी बना लिया।उसकी दिव्य मणि छीन ली।जिससे क्रोधित हो अश्व्थामा ने उत्तरा (अर्जुन की दूसरी पत्नी )की अजन्मी संतान को गर्भ में मारने के लिए ब्रह्मास्त्र चला दिया।
ब्रहमास्त्र को निष्फल करना असंभव था। तब भगवान श्री कृष्ण ने अपने सभी पुण्यों का फल उत्तरा की अजन्मी संतान को देकर, उसको गर्भ में ही पुनः जीवित किया। गर्भ में ही मरकर जीवित होने के कारण उसका नाम “जीवित्पुत्रिका" पड़ा बाद में यहीं “राजा परीक्षित” हुए। तब ही से इस व्रत को किया जाने लगा।

तीसरी कथा :-गन्धर्वों के राजकुमार का नाम जीयूतवाहन था। वे बड़े उदार और परोपकारी थे। जीयूतवाहन  के पिता ने वृद्धावस्था में वानप्रस्थ आश्रम में जाते समय इनको राजसिंहासन पर बैठाया। पर इनका मन राज-पाट में नहीं लगता था। वे राज्य का भार अपने भाइयों पर छोड़कर स्वयं वन में पिता की सेवा करने चले गए। वहीं पर उनका मलयवती नाम की राजकन्या से विवाह हो गया।
एक दिन जब वन में भ्रमण करते हुए जीयूतवाहन काफी आगे चले गए तो वहाँ उन्होंने एक वृद्धा को विलाप करते देखा। पूछने पर वृद्धा ने बताया कि मैं नागवंश की स्त्री हूँ। मुझे एक ही पुत्र है। पक्षीराज गरुड़ के सामने नागों ने उन्हें प्रतिदिन खाने हेतु एक नाग देने की प्रतिज्ञा की है। आज मेरे पुत्र की बलि का दिन है।

जीमूतवाहन ने वृद्धा से कहा, डरो मत माते। मैं तुम्हारे पुत्र के प्राणों की रक्षा करूंगा। आज उसके बजाय मैं स्वयं अपने आपको लाल कपड़े में ढाँक कर शिला पर लेट जाऊँगा। नियत समय पर गरुड़ आए और वे लाल कपड़े में ढाँके जीमूतवाहन को पंजे में दबोच उड़ चले। मृत्यु को पास देख कर भी गरुड़ का शिकार शांत चीत रहा तो गरुड़जी बड़े आश्चर्य में पड़ गए। उन्होंने जीयूतवाहन से उनका परिचय पूछा। जीयूतवाहन ने सारा किस्सा कह सुनाया। गरुड़जी उनकी बहादुरी और बलिदान से बहुत प्रभावित हुए। प्रसन्न होकर गरुड़जी ने उनको जीवनदान  दिया ।साथ हीं नागों की बलि न लेने का भी वरदान दे दिया ।इस प्रकार जीयूतवाहन के साहस से नाग-जाति की रक्षा हुई ।तभी से पुत्र की सुरक्षा हेतु जीयूतवाहन की पूजा की जाने लगी ।
तो अंत में बोलें :-ये अरियार ।
ता का बरियार ।
जाके कहिएय राजा रामचन्द्र जी से की -सत्यार्थ के माई जितिया कईले बाड़ीन ।
इम्पोर्टेंट :- इस व्रत कथा में भी बहुत डराया गया है की,खाने -पीने से संतान पर कष्ट आ सकतें हैं।मैंने पहली बार ये व्रत किया ।संतान मोह में या पहली बार की उमंग वश निर्जला व्रत तो कर लिया पर अगले दिन पारन के बाद बीमार पड़ गई ।माँ और एक दोस्त ने बताया ये व्रत लगता है ।मतलब इसके बाद थोड़ा बीमार पड़ सकतें है ।ख़ैर इसका नुक़सान तो मेरे सत्यार्थ को हुआ ।बीमार मैं हुई बेचारा कल पूरे दिन सिर्फ़ दूध पर ही रहा ।मैं कुछ बना ही नही पाई ।शतेश शाम को आकर उसके लिए खिचड़ी बनाए ।।शतेश ने व्रत के दिन छुट्टी ले रखी थी ,इसलिए अगले दिन पारन का खाना बना कर ऑफ़िस चले गए ।
निष्कर्ष :- अगले साल से मैं भगवान का नाम लेकर पानी पी लिया करूँगी तीज व्रत की तरह ।अगर माँ ही बीमार रही तो संतान कहाँ से स्वस्थ होगा ।

Thursday, 7 September 2017

वर्जिनिया बीच पर शिव पार्वती के साथ गणेश !!!

शिव ,पार्वती से कहते हैं :-पार्वती सुनो ना शीत ऋतु के आगमन से पहले फिर से किसी समुन्द्र तट चलते है।
पार्वती :- शिव जी ,आप खाली समुन्द्र तट करते रहते है। ग्रीष्म ऋतु क्या आई ,आप चार धाम की तरह समुन्द्र के चक्कर लगवाने लगे।आस -पास के तो सारे समुन्द्र नाप लिए ।अब क्या बचा है प्रिय ?
शिव :-मेरी अर्धनारेश्वरी ! इस बार तुम्हे मैं "कुमारी समुन्द्र तट "ले चलूँगा। साथ ही शेनंदोह वन और नीली पहाड़ की चोटी भी दिखाऊंगा।
पार्वती :-मैं कुछ समझी नहीं शिव।
शिव :-प्रिय ! ये जो मानव जाति वर्जिनिया बीच कहते हैं ना। इसका असल नाम हमने कुमारी समुन्द्र तट रखा था।
बटवारे के बाद ये जीजस के अधिकार क्षेत्र में आ गया। जीजस को "वर्जिन" शब्द से प्रेम ,तो विर्जिन नाम रख दिया।  कुछ वर्षों बाद ,पाटलिपुत्र से युवाओं की टोली यहाँ मजदूरी करने आई। उन्हें हर शब्द के बाद -आ ,वा ,या लगाने की आदत। ऐसे में वे आदत अनुसार -इसको वर्जिन -या या कहने लगे। अब मजदुर आदमी तो जनता है। जनता सबकी माई -बाप। तो तब से ये "कुमारी तट से वर्जिनिया "कहा जाने लगा।

पार्वती :-अच्छा तो ये शेनंदोह और नीली पहाड़ की चोटी  का भी कुछ किस्सा है क्या महादेव।
शिव :- हाँ पार्वती। ये जो "शेनंदोह वन "है ना ,ये मेरे और नन्दी का ही अपभ्रंश नाम है। शिव -नन्दी। ये सब जीजस की चाल है। देखो मक्कार ने ,मेरा आशियाना नीली पहाड़ की चोटी का भी नाम बदल कर "ब्लू रिज माउंटेन "कर दिया। तुम तो जानती ही हो पार्वती नीला रंग मुझे कितना पसंद है। खैर जाने दो। मैं भोले नाथ हूँ ।माइंड नहीं करता इनसब बातों का। हमदोनो को प्राकृति से प्रेम है ,तो चलो प्राकृति की ओर।

उड़न खटोले पर सवार शिव -पार्वती नन्हें गणेश के साथ निकल पड़े कुमारी तट ।मनोरम यात्रा का सुख बढ़ाने के लिए शिव ने शारदा जी को याद किया।
शारदा जी शुरू हो गई -शिव से गौरी ना बियाहब हम जहरवा खइबे ना।
शिव जी मंद -मंद मुस्कुराते हुए बोले :-तपस्या ओह मेरा मतलब पार्वती ,मुझे आपने ब्याह के दिन याद आ रहें है।
पार्वती -मुझे भी शिव जी । शारदा जी ने तो मेरे पीहर की याद दिला दी भोलेनाथ ।

इसी सब के बीच उड़न खटोला कुमारी बीच पर उतरा। सामने देखा तो एक राक्षस की मूर्ति।
पार्वती शिव से कहती :-शिव राक्षस। शिव हँसते हुए बोले -मेरी भोली पारो ,ये समुन्द्र देव की मूर्ति है। इनको मैंने जलजीवों की रक्षा हेतु लगा रखा है। चलो देख लो नजदीक से ।
फिर वहाँ से शिव -पार्वती गणेश के साथ समुन्द्र तट पहुँचते हैं।
लोगो की दयनीय स्थिति से पार्वती व्याकुल हो जातीं है। शिव से कहती हैं -बेचारे लोग कैसे बस तन ढँके हुए ।,बेघर से बालू पर मछली से पटपटा रहें हैं। सूर्य की किरणों से उनके शरीर लाल हुए पड़े है  ।
शिव पार्वती को समझाते है :-देखो तो पगली ,ये लोग ऐसे जीवन से कितने खुश हैं। बालू में लोट कर उन्हें आनंद आ रहा है। प्रेमी युगल पानी से खेल रहें हैं। एक दूसरे की चित्र उतार रहें है। तुम नाहक ही परेशान हो रही हो। आओ गणेश के साथ तुम्हारी भी एक चित्र बना लूँ।
चित्र बनाने के बाद शिव ने कहा -अच्छा सुनो पारो ,जहाँ रात्रि विश्राम के लिए रुकेंगे। वहीं "श्वेत -काले "लोगों के बीच युद्ध हुआ था। वैसे डरने की कोई बात नहीं हैं।मैंने  नारद गूगल से सब पता कर लिया है ।
शाम हो गई है ।गणेश रोने लगें ।शिव पार्वती से कहते हैं -गणेश के दुग्ध पान के बाद ,हमलोग भी भोजन का प्रबंध करते हैं ।सोच रहा हूँ बुद्ध को मानने वाले लोगों के यहां ही भोजन किया जाय ।क्या कहती हो पार्वती ?
पार्वती :-ठीक है शिव ।थाई लोगों को हमारे आने की सुचना दे दी जाय ।
वर्जिनिया बीच पर शिव पार्वती

Wednesday, 30 August 2017

कहानी भूतों की !!!

आज एक इंट्रेस्टिंग कहानी सुनाती हूँ। भूतों की है ,आप बीती है।
बसंतपुर जहाँ हमलोग रहते थे ,उस कॉलोनी के बाउंड्री से  सटे तड़कुल के पेड़ लाइन से थे। हमलोगों से मेरा मतलब ,मेरी माँ ,मेरा भाई मेरे चाचा की लड़की और मैं से हैं। बाकी कॉलोनी में अलग -अलग क्वाटर में दूसरी और फॅमिली रहती थीं। सब एक परिवार की तरह ही थे लगभग। सभी एक दूसरे के सुख -दुःख से लेकर आटा -दाल तक आपस में बाँटते थे। हम बच्चें भी खूब उधम मचाते। इसमें सबसे बड़ा उद्यमी मेरा भाई था। गिरना -पड़ना ,कटना ,टेटनस की सुई तो उसका प्रसाद था।
एक दिन हुआ यूँ कि ,कोई कुत्ता कॉलोनी में घुस गया था।बच्चे  उसे भगाने लगे। लेकिन कुत्ते को मेरा भाई पसंद आया। उसने प्यार से दाँतों से भाई के हाथ को चुम लिया। फलस्वरूप दस सुई लगने का डॉक्टर ने फरमान जारी किया।
 डॉक्टर ने मरहम -पटी कर दी। बोले सुई तो यहाँ नहीं मिलेगी ,या तो छपरा या फिर सीवान जाए। हमलोग का रो -रो कर हालत ख़राब। खैर माँ ने मेरे होमटाउन बेतिया जाने का निर्णय लिया। घर के लोग भी वहाँ थे। मेरा कुछ वार्षिक परीक्षा आने वाला था। ठंढ भी शुरू हो गई थी। ऐसे में माँ मुझे और चाचा की बेटी को कॉलोनी के लोगों के हवाले कर भाई के साथ बेतिया चली गई। अब मेन कहानी शुरू होती है -
माँ के जाने के बाद हम दोनो बहनों की खूब मौज हो गई। कॉलोनी वाले भी खूब प्यार लुटा रहे थे। हमारी कॉलोनी में चौकीदार हमेशा से रहा है ,तो डर वाली भी कोई बात नहीं थी। माँ ने कहा था ,अपने घर में ही सोना। पोद्दार ऑन्टी की बेटी (ममता )मेरी अच्छी दोस्त थी। उसको मेरे घर सोने आने के लिए बोल दिया गया था। ऐसे में शर्मा ऑन्टी के यहाँ भी उनके भाई की बेटी आई थी। वो भी बोली -पूनम भी तुमलोगो के साथ सोने चली जाएगी। चार लोग रहोगे तो डर नहीं लगेगा।
 पहली रात भाई के दुःख में ,दूसरी रात  ख़ुशी में बीत गया ।तीसरी रात की कहानी से पहले भूमिका -
अगले दिन हमलोग शाम को खेल रहें थे ।तभी वो जो ताड़कुल के पेड़ बाउंड्री से सटे थे ना ,उनपर कुछ बाज़ (चील ) मड़राने लगें। हमलोग खेल रहे थे और पूनम की नज़र उधर गई। हमलोग भी उधर देखने लगे।
राजबली चाचा की बेटी बेबी दी जो हमलोग के साथ खेल रहीं थी ।चील को देख ,भागते हुए बोली -बाप रे ,भागो इधर से ।जहाँ भी चील उड़ता है ,वहाँ भूत होता है । किसी के घर पर बैठ जाए तो लोग उसे छोड़ देतें हैं ।
हमें यकीन नहीं हुआ ।थोड़ी दूर पर पोद्दार ऑन्टी बैठी थी। हमलोग ने उनसे पूछा ।वो बोली की हाँ होता तो है ,लोग पूजा -पाठ करवा कर रहते हैं ।तुमलोग क्या फालतू बातों में हो ,खेलो जा कर ।
बेबी दी को भी डांटा ऐसी बातों के लिए ।ऐसे में पूनम को मजाक सूझ रहा था -बोली मैं किसी से नहीं डरती ।भूत से भी नहीं ।ऐसा कह कर वो उस पेड़ से सटे बाउंड्री के पास जाकर -जोर -जोर से कहने लगी -ये भूतवा कहाँ बारीस रे ।आव -आव ।हमलोग उसे बुलाते रहे वो आई नहीं ।हँसती रही ,कहती रही ।जब हमलोग भाग गए तो वो भी आ गई ।

अब तैयार हो जाइये थ्रिलर के लिए -रात को ममता के साथ पूनम भी मेरे घर सोने के लिए आई ।खाना हमारा हो गया था ।गप शुरू हुआ ।पूनम ने फिर से भूत वाली बात छेड़ दी । मेरी दी ने उसे डाँटा की ऐसा करोगी तो तुम्हे नहीं सुलायेंगे ।हमारे साथ रहने की चाहत ने उस वक़्त उसे रोक लिया ।
फिर जब हमलोग लगभग सोने जा रहे थे पूनम का ड्रामा शुरू हो गया ।रात के कुछ ग्यारह ,साढ़े ग्यारह बज रहे थे ।ठण्ड शरू हो गई थी ।कॉलोनी में सब सो गए होंगे ।यहां पूनम को कभी पिसाब लगता कभी पाखाना ।कभी बोलती भूख लगी है तो कभी कहती गर्मी लग रही है ।हमलोग पूनम को समझा रहें थे ।पूनम बोलती ठीक है अब सो जायेंगे पर फिर ड्रामा करने लगती। गुस्से में आकर दीदी बोली ,चलो तुम्हे तुम्हारे घर पहुंचा देते है।ये सुनकर  पूनम खूब रोने लगी। मैंने दीदी को कहाँ अच्छा जाने दो अब नहीं करेगी। चलो सोते हैं।
फिर अचानक पूनम को क्या हुआ मालूम नहीं। जोर -जोर से हँसने लगी। दीदी डाँटी तो खूब रोने लगी। फिर बोली मैं नहाउंगी।
हम सब परेशांन। एक तो ठंढ ऊपर से इन सब ड्रामें में रात के डेढ़ बज गए। ऐसे में ठंढे पानी से कैसे नहाएगी? पर पूनम ने ज़िद धर ली। दीदी भी गुस्से में बोली -जा नाहा। पूनम हमारे सामने ही सारे कपड़े उतारने लगी। दीदी ने डांटा तो हँसती हुई चापाकल की तरफ भागी। नहाये जा रही है। अब तो हमलोग डरने लगे थे। समझ नहीं आ रहा था क्या करें। पूनम नहाना छोड़ ही नहीं रही थी। मैंने दीदी और ममता को कहा छोड़ देते हैं खुद आ जाएगी। मैं जाकर रजाई में घुस गई।
इधर दीदी और ममता ने कैसे भी पूनम को चापाकल से दूर किया । कपडे पहनाये। उसको समझाने लगीं।
पर पूनम तो पूनम। हाँ कह देती ,फिर शुरू हो जाता नया खेल। मैंने दी और ममता को कहा चलो हनुमान चालीसा पढ़तें हैं ।अगर भूत हुआ तो भाग जायेगा ।सबको बात ठीक लगी ।लालटेन की रौशनी में चालीसा शुरू हुआ ।पर पूनम के ड्रामे की वजह से ममता और दी ठीक से पढ़ नहीं पाए ।मैंने बिना उधर ध्यान दिए पढ़ा और आराम से सो गई ।
दी और ममता को पूनम ने और परेशांन किया ।
सुबह -सुबह ही उसे उसके घर ले जाकर दी ने उसकी शिकायत की ।अगली रात से उसकी इंट्री बंद थी ।
कुछ महीनों बाद वो अपने गांव चली गई ।बीमार रहने लगी ।एक दो -साल बाद पता लगा -उसपर किसी जबरदस्त भूत का साया था ।फिर क्या ?कथा गइल बन में सोचो अपना मन में ।
मालूम नहीं क्या सच था ।पर ये बात सिद्ध है हनुमान जी ऑलवेज रॉक्स ।बोलो जय बजरंग बलि की ।


Monday, 21 August 2017

पूर्ण सूर्यग्रहण !!!

अमेरिका में पूर्ण सूर्यग्रहण लगभग एक शताब्दी बाद होने वाला था। एक महीने से जोर -शोर से न्यूज़ चैनल वाले इसका प्रचार कर रहे थे। मानो ये अपने यहाँ की तरह कोई अपसगुन नहीं ,कोई दैविक दर्शन हो। लोग फ्लाइट बुक कर रहे हैं। जिस जगह पूर्ण सूर्यग्रहण है ,वहाँ के हॉटेलस में जगह नहीं हैं। और तो और सनग्लासेस की तो पूछिए मत। मतलब मार्केटिंग  के स्टूडेंट के लिए अमेरिका परफेक्ट है। कैसे मौका और सामान को चमका के बेचना है ,कोई इनसे सीखे। हम भी इसी फेरे में अमेज़ॉन से चश्मा आर्डर लिस्ट में डाल दिए थे।  बस कांड ये हुआ कि मुझे दिन का कन्फ्यूज़न हो गया। कल रात गूगल न्यूज़ पर कल  होने वाले सूर्यग्रहण का पढ़ कर लगा हो गइल। अब का होइ ?  एगो त अपने चश्मा  ऊपर से डायरेक्ट देख के बचलो आँख ना लालटेन बन जाओ।
इशु को खिला कर ,रात के डेढ़ बजे पिन होल बनाना शुरू किया। बन तो पाँच मिनट में गया ,पर साथ ही बचपन की कई यादें ताज़ा हो गई। सातवीं क्लास में थी ,जब प्रभात सर ने ग्रहण देखने का तरीका बताया था।
एक तो पिन होल दूसरा शीशे से रिफ्लेक्शन ,तीसरा एक्स -रे रिपोर्ट से देखना ।
 मेरे पास ना तो शीशा है ना ही एक्स -रे रिपोर्ट। तो ऑप्शन फर्स्ट ही काम आ सकता था।
एक तो यहाँ के डॉक्टर। सारी रिपोर्ट -जाँच अपने डेटा में रखते है ,मानो जाँच ना हो खजाना हो। आप उस जाँच पोर्टल से जुड़े होते है ।अपनी आई डी से लॉगिन कर देख सकते है ,पर हाथ में कुछ नहीं देते ।
अपने भारत का  ठीक हिसाब -किताब होता है। पैसा दियो हो ,ले जाओ अपने पार्ट पुर्जा का कागज़ -पत्तर।
इसी बहाने एक्स -रे को देखने चार लोग आते हैं , चकित होते। सब लोग उसे देख ,बिना डॉक्टरी के  डॉक्टर बन जाते। आहा ऊपर से सिम्पैथी अलग से मिलती। मज़ा आ जाता है ।
खैर विषय से ना भटकते हुए ,फिर पीछे से माँ की आवाज़ आती है -लवली ज़्यादा मत देखो आँख ख़राब हो जायेगा। कॉलनी में इसे देखते बड़े -बुज़ुर्ग अलग -अलग कयास लगाते। मसलन इस साल बाढ़ या सूखा पड़ेगा। भूकंप भी आ सकता है ,महामारी आदि -आदि। वहीँ कॉलोनी के बच्चे एक दूसरे को बता के खुश होते की मुझे भी दिखा मुझे भी।
इस तरह इधर ग्रहण खत्म होता उधर माँ का ग्रहण शुरू होता। चलो नहाओ ,राशन -पानी दान का छुओ। खाना तो बना नहीं होता या फिर पहले का खाना फेंक दिया गया होता। तो बस जल्दी से चूड़ा - दही का भोग लगाओ।
ग्रहण में पकाया हुआ खाना भले फेंक दे ,पर दूध -दही नहीं फेंकते। ये दैविक पदार्थ  होते हैं ,ऐसा सब कहते हैं।
तो इस तरह बचपन से निकल कर ,फिर से अपनी बालकनी से आज मैंने सूर्य ग्रहण देखा ।
तो चलिए देखिये कुछ तस्वीरें ,मेरी बनाई पिन होल के द्वारा ।हालाँकि मुझे थोड़ी देर से याद आया तस्वीर लेने का ,पर जो भी दिखा बहुत सुन्दर था ।हमारे यहां पार्शियल ग्रहण था ।
मज़ेदार किस्सा :- ग्रहण के समय अँधेरा हो गया ,मुझे लगा मेरी बालकनी में सूर्यदेव के दर्शन नहीं होंगे। इशु को छोड़ कर नीचे जा नहीं सकती थी। थोड़ी देर इंतज़ार के बाद नियमानुसार इशु को नहलाया ,खुद नाहा कर पूजा करने जा रही थी कि शतेश का कॉल आया -तपस्या तुमने देखा क्या ग्रहण ? जल्दी बाहर जाओ अभी दिख रहा है। भाग कर बालकनी में गई और सूर्यदेव के साथ इक्वल हॉफ की कृपा से देख पाई। अब समस्या ये की फिर से नहाऊँ क्या ? अब कौन फिर से बेटे को नहलाये ,खुद नहाये। बस हनुमान जी का नाम लेकर ,पानी छिड़क लिया। राशन की जगह पाँच डॉलर छू कर ग्रहण मुक्त हो गई ।