Sunday, 28 January 2018

बिहार में सर्दी !!!

बिहार में सर्दी रानी जाते -जाते रह गईं।लगा था सरस्वती पूजा के बाद दिन खुलने लगेगा ,पर यहाँ तो छब्बीस जनवरी से सूर्य देवता लगभग ग़ायब से ही रहे हैं ।हर घर के लोग बाहर घूर लगाए बैठे हैं ।घर तो छोड़िए लोगों ने सड़कों को भी नही छोड़ा है ।
कल कुछ काम से बेतिया जाना हुआ ।सुबह के दस बज चुकें थे और चारों तरफ़ धुँध ही धुँध ।इस मौसम में भी कुछ किसान खेतों में गन्ना छील रहें हैं तो ,कुछ बच्चे बकरी ले कर निकल पड़े हैं ।मुझे थोड़ा अफ़सोस हुआ ।
भाई से पूछी ,ऐसे मौसम में गन्ना छीलने की क्या ज़रूरत ? क्या एक -दो दिन रुक कर ये लोग नही कर सकतें ?
भाई बोला -बहन किसान के लिए फ़सल से ज़्यादा कुछ महत्वपूर्ण नही होता ।फ़सल ही उसका जीवन है ।जब जीवन ही नही तो क्या ठंड क्या बारिश ।इनके गन्ने का नम्बर लगा होगा मिल में ,इसकी वजह से ये परिवार इस ठंड में खेत में लगा हुआ है ।

कुछ आगे जाने पर लोगों ने लगभग सड़क को ही घर -दुआर बना रखा था ।सच पूछिए तो इस बार मुझे आपने गाँव में गंदगी ज़्यादा दिख रही थी।लोगों ने सड़कों पर ही घास-फूस ,खर -पतवार फैला रखा था ।उनके मवेसी उसी पर लेटे हुए थे ।कही गोबर तो कहीं राख ।इनके बीच आग तापते लोग ।कई जगह तो ड्राईवर को गाड़ी मोड़ने में भी दिक़्क़त हो रही थी।लोगों ने खादर ,पतवार सड़क पर ही जमा कर रखा था ।

 ये सब देख कर मैंने भाई से कहा - अपने गाँव के लोग बहुत गंदगी में रह रहें हैं ।ऐसे में तो बीमारी फैल जाएगी।
भाई बोला गंदगी ?
 कहाँ दिख रहा है तुम्हें बहिन ? थोड़ा इनके नज़रिए से भी देखो ।ये जो तुम गंदगी कह रही हो ,ये सब जैविक चीज़ें हैं ।आसानी से सड़ गल के खाद बन जायेंगी ।फिर इन लोगों के काम आ जायेंगी ।साथ हीं इनसे कभी कोई बड़ी बीमारी नही होगी ।
“गंदगी तो तुम फैला रही हो डाइपर के रूप में " और हँसने लगा ।
वहीं दूसरी ओर तुम बताओ ,जिसको दुआर नही ।झोपड़ी का घर है ।मवेसी हैं ।इतनी ठंड में वो अपने जानवर कहाँ बाँधे ? जलावन कहाँ से लाए ? ये जो तुम खर -घास सड़क पर देख रही हो ,उसपर दिन में उनके मवेसी रहेंगे ,साथ ही उनके जलावन का इंतज़ाम भी हो जाएगा ।
इनके पास हीटर तो है नही जो जला कर ताप लिया ।अब ऐसे में थोड़ा राख फैल भी जाता है तो क्या हो गया ?

इस तरह अपनी तकलीफ़ और इन लोगों का दर्द देख कर सर्दी माता से नम्र निवेदन है -हे माई ! अब तो दया करो ।
कुछ तस्वीरें -

Monday, 27 November 2017

बेटी की शादी !!!

आज एक मित्र ने अपने सोसायटी में रहने वाले गार्ड की परेशानी लिखी ।परेशानी ये थी की -उनकी बेटी की शादी तय हो गई है ,पर पैसे की समस्या है ।मुझे ये पोस्ट पढ़ कर अपनी शादी के दिन याद आ गए ।कुछ समझ नही आता कैसे हो बेटी की इस समस्या का समाधान ।
मेरी कहानी कुछ यूँ रही -
मेरी माँ मेरी शादी के पीछे पड़ गई थी ।कारण मेरी पढ़ाई हो गई थी ।जॉब भी करने लगी थी ।ऐसे में आस -पड़ोस के लोग माँ को टोक देते ।सुन -सुनकर माँ भी इस बारे में सोचने लगी थी ।मेरा मन अभी एक -दो साल शादी का नही था ।या यूँ कहे मुझे शादी से बड़ा डर लगता था ।मैं टालते रहती ।ऐसे में माँ अपनी बी पी का बहाना करने लगती ।वहीं हर माँ की तरह ,कही मर गए तो बेटी की शादी भी नही देख पायेंगे आदि -आदि ।

फिर मेरे हाँ कहने के बाद असली समस्या शुरू हुई ।मेरे पिता जी नही है ।माँ ने ही दोनो भाई बहन को पाला है ।अब अरेंज मैरिज वो भी बिहार में ? लड़के के घर रोज़ दौड़ने की प्रैक्टिस करने वाला कौन था मेरे घर ? कौन गाँव -गाँव जाकर इतना लड़का ढूँढता ? जी हजुरी करता ।

ऐसा नही है कि मेरे रिश्तेदार नही ।सबलोग हैं ।सब लोग अच्छे नौकरी पेसा लोग हैं ।अब ऐसे में कौन मेरे लिए बार -बार छुट्टी लेकर लड़का ढूँढे ।मामा जी ,चाचा जी ने दो तीन लड़के बतायें ,पर बात वहीं ।लड़का पुणे ,बंगलोर ।परिवार किसी गाँव में ।लड़के के परिवार से तो मामा -चाचा मिलने जाने को तैयार थे ।लड़के से कौन इतनी दूर मिलने जाय ।फिर अपने यहाँ का देखा -देखौकि अलग से ।ऐसे में मेरा भाई (जो मुझसे छोटा है )एक लड़का को देखने गया ।बहुत बुरा लगा था मुझे उस दिन ।ख़ैर भाई को लड़का तो अच्छा लगा पर परिवार नही ।

ज़रा सोचिए सारे साधन थे मेरे पास ।बस एक पिता का ना होना ,मेरे छोटे से भाई को कितना ज़िम्मेदार बना गया ।
**कई बार मैं सोचती थी ,इससे अच्छा तो लव मैरिज कर लेती ।
हमलोग शादी को लेकर इतने भी परेशान नही थे ,कारण अभी तो शुरुआत ही की थी ।वहीं मेरे लिए रिश्तेदारों के बताए रिश्ते भी आ रहे थे ,पर कही कुंडली नही मिलती तो कही माँ को उस रिश्तेदारी में शादी नही करनी ।
फिर भी मैंने माँ और भाई से कहा तुमलोग इतना मत सोचो ।मैं किसी से भी शादी के लिए तैयार हूँ ।किसी से मतलब पेशा से है ।फिर तय हुआ शादी अगले साल करनी है तो ,अगले साल लड़का ढूँढे ।माँ को समझा कर मैं भाई फिर से मस्त हो गए ।माँ भी अगले साल का इंतज़ार करने लगी ।

इसी बीच भाई के एक दोस्त जो उससे बड़े थे ,हमारे फ़्लैट पर आए ।मेरे भाई के हर उम्र के दोस्त है ।उन्होंने अपनी बहन की शादी मेटरीमोनियल से तय की थी ।बहन को भी हमलोग जानते थे ।शादी तो पटना (घर ) से होनी थी ।बस उनकी सगाई दिल्ली में थी ,तो दीदी को कुछ मदद चाहिए थी ।उन्होंने ही भाई को कहा मेरा भी प्रोफ़ाइल बना दे ।

प्रोफ़ाइल बन गई ।आह ! क्या दिन थे वो ।ऑफ़िस से आने के बाद हम दोनो भाई बहन जीवन साथी की साइट खोल कर ख़ूब मज़े करते ।एक इक्सेल सीट बना लिया था ।भाई कहता चल बहिन ,ग्रूम -ग्रूम खेला जाय ।
रोज़ लड़का देखते ,मज़ाक़ उड़ाते ।जो अच्छा लगता उसका रिक्वेस्ट ऐक्सेप्ट करते ।फिर सीट में उनका नाम ,शहर का नाम ,शिक्षा ,जॉब ,परिवार वाला खाना भरते ।
खाना पकाने वाली आंटी को चाय बनाने को कह,हमलोग इसमें ही लग जातें ।जबतक खाना नही बनता।जीवन साथी हमारा मनोरंजन का साधन बन गया था ।समझ लीजिए फ़ेस्बुक हो ।

फिर दिवाली में जब घर गई ।माँ को बताया ऐसे लड़का ढूँढ रहें है ,उसने सिर पकड़ लिया ।बोली तुम दोनो का दिमाग़ खराब हो गया है ।दो फँसोगे एक दिन । ऐसे शादी -ब्याह कहीं होता है ब्राह्मण में ? क्या बाहर रहते हो न्यूज़ नही सुनते ? ऐसे शादी के लिए मेरी हाँ कभी नही होगी ।और भी बहुत कुछ ...

हमलोग ने माँ को समझाने के लिए जीवन साथी की साइट खोली।एक लड़का माँ को भी अच्छा लगा पर उसका घर राँची था ।माँ को तो ऐसे भी मन नही था ,बोली इतनी दूर बेटी की शादी नही करेंगे ।
तभी भाई को जाने क्या सूझा बोला -रुको सर्च करते हैं ।बिहार का कोई लड़का है क्या इस साइट पर ।और फिर हमें "शतेश "मिले ।मिले भी इतना पास की भले ये सात समुन्दर पार थे ,पर इनका घर जहाँ हम रहते वहाँ से 45 मिनट की दूरी पर ।इनसे भाई की बात हुई ।फिर माँ के ना हाँ के बीच भाई शतेश के घर पहुँच गया ।

शतेश के घर वाले हैरान ।एक 24/25 साल का लड़का अपनी बहन की शादी की बात करने आया है ।
शतेश के पापा बोले किसी बड़े -बुज़ुर्ग को बुला लाओ ।तुमसे क्या शादी की बात करे ?तुम्हें अनुभव ही कितना है ?

मेरे घरवाले ऐसी शादी की बात से डर रहे थे ।डर था कुछ गड़बड हुई तो उन्ही पर इल्ज़ाम होगा ।सब कुछ ना कुछ बहाना बना रहे थे ,ना आने का ।
फिर जब हमने माँ को मना लिया सब आए ।शतेश के घर भी गए ।
कुल मिला कर ये समझिए ,मेरी शादी सिर्फ़ और सिर्फ़ मेरे भाई ने की है ।माँ के मामा जी तब छपरा में मेजर थे ।उन्होंने ने काफ़ी मदद की ।
शादी की सारी तैयारी मैंने और भाई ने माँ के मामा जी की मदद से की ।
यक़ीन मानिए , भगवान की कृपा से मेरी शादी ,मेरी घर की सबसे अच्छे से अरेंज शादी हुई ।शतेश के पापा आज भी मेरे भाई से बहुत प्यार करते है ।उसकी मिशाल सबको देते रहते है ।

नोट :-कहानी संक्षेप में लिखी ।पर ये समझ लीजिए बेटी कि शादी खास कर बिहार में एक गम्भीर समस्या है ।किसी के पास साधन की कमी तो कहीं पिता की कमी ।आजकल "अगुआ "(शादी कराने वाला ) का लुप्त का ना होना और समस्या पैदा कर देता है ।सिर्फ़ पैसा ही नही आपको ख़ुद को लगाना होता है बेटी की शादी में ।
बेटी के योग्य या अयोग्य का इससे कोई सम्बंध नही ।योग्य भी हार मान किसी से शादी को राज़ी हो जाती है ।
ऐसे में महाराष्ट्र ,दिल्ली की तरह बिहार में भी शादी योग्य लड़के -लड़की की पत्रिका निकलनी चाहिए ।शादी का ख़र्च भी दोनो पक्षों को आपस में बाँट लेना चाहिए ।
**याद रखिए किसी की बेटी की शादी ही नही अपके बेटे की भी तो शादी है ।

Wednesday, 1 November 2017

बुरी आत्मा का प्रवेश !!!

31अक्टूबर ,हेलोवीन के दिन एक व्यक्ति के अंदर पापी दुष्टात्मा प्रवेश कर गई ।जहाँ एक तरफ़ लोग हेलोविन के उत्साह में डूबे थे ,दूसरी ओर एक पापी आत्मा काल का रूप ले रही थी ।उसने न्यू यॉर्क में अपनी गाड़ी से लोगों को कुचल डाला ।ट्रिक (हेलोविन का एक रिवाज )को उसने सचमुच भयावह बना डाला।मासूम लोग ये भी नही समझ पाए कि,ये ड्राइवर की सोची समझी चाल है या गाड़ी की ख़राबी ।जबतक कुछ समझ आता है ,कई लोगों की जान चली गई ।
जहाँ ये घटना हुई ,वो वर्ल्ड ट्रेड सेंटर से ज़्यादा दूर नही है ।
वहीं "वर्ल्ड ट्रेड सेंटर "जिसके "नाइन इलेवन" के ज़ख़्मों की निशानी अभी भी वहाँ मौजूद है ।आज भी हज़ारों मृतकों के नाम ,उस फ़ाउंटन के दीवारों पर आँसू बहा रहे होते है । पूछते है कि ,क्या ग़लती थी हमारी जो हम यहाँ हैं ।
हमें यहाँ नही होना था ।हम भी आपकी तरह इस ख़ूबसूरत दुनिया को जीना चाहतें थे ।
आज भी लोग यहाँ आ कर इमोशनल हो जातें हैं ।उस समय को याद करतें हैं ।उस वक़्त हमारी आत्मा तड़प उठती है ।हम अपना हाथ बढ़ाना चाहतें हैं ,आपके आँसुओं को पूछने के लिए ।आपको इस क्रूर दुनिया में रहने की हिम्मत देने के लिए।पर हमारे हाथ तो काट लिए गए ।
कैसा संयोग है ,कुछ ही सप्ताह पहले मैं ,शतेश और सत्यार्थ यहाँ गए थे ।वैसे हमलोग तो कई बार यहाँ आ चुकें हैं ,पर सत्यार्थ पहली बार आया था ।लोगों की भीड़ और फ़ाउंटन उसे आकर्षित कर रही थी ।फ़ाउंटन के मार्बल पर वो बार -बार हाथ मार रहा था ।मानो सत्यार्थ के अंदर बसे भगवान इन मार्बल पर ख़ुदे व्यक्ति के आँसू पोंछ रहे हों।सत्यार्थ के बार बार उछलने और हाथ मारने से हमलोग उस जगह से हट गए ।डर लग रहा था कि ,वो गिर ना जाय ।
फिर हमलोग जो मेमोरीयल हॉल बना है ,वहाँ गए ।इसकी मेमोरीयल की आकृति एक गिरते हुए हवाईजहाज़ की दी गई है ।इसके अंदर तमाम बड़े शोरूम और डब्लू टी सी मेट्रो स्टेशन भी  है ।अंदर में काफ़ी सुरक्षा व्यवस्था है ।
पहली बार मैंने यहाँ देखा कि,टॉलेट जाने की गाली के बाहर भी गार्ड तैनात थे ।गार्ड से आप डर के माहौल की उम्मीद ना करें ।वो जीतनी सुरक्षा के लिए होते हैं ,उतने ही मददगार भी । कुछ पूछना हो तो उनसे बेधकड पूछ सकतें है ,चाहे वो ट्रेन रूट की बात ही क्यों ना हो ।लोग बाग़ तस्वीरें निकालने में मशरूफ थे ।हमने भी कुछ तस्वीरें लीं और निकल पड़े टाइम स्क्वाइअर की तरफ़ ।
नोट:-पूरी इमारत सफ़ेद रंग की बनी है ।शायद शान्ति की उम्मीद हो ,या 9/11 की कफ़न की चादर ।
इसी बीच भारत में भी ऐन टी पी सी कांड हो गया ।लगता है सच में कलयुग आपने अंतिम चरण की ओर है ।

Wednesday, 11 October 2017

कब्रिस्तान !!!

वीकेंड हमारा घूमने के नाम फिक्स होता है। कही ना कही जरूर ही जाते है ,जबतक कोई मौषम की गड़बड़ी ना हो या अपनी तबियत की गड़बड़ी ना हो। इसी तरह दुर्गा पूजा वाले वीकेंड को, हमने ब्रज टेम्पल जाने का प्लान किया। सच बताऊँ तो मुझे अमेरिका का कंट्री साइड यानि छोटे -छोटे गाँव जवार के रास्ते और गाँव  ही ज्यादा पसंद आते है। हो सकता हो छोटे जगह से आने का असर हो। खैर मंदिर जाने का रास्ता बहुत ही सुन्दर है। उसकी तस्वीरों के साथ फिर कभी मिलूंगी। आज कब्रिस्तान की बात करनी है।
हुआ यूँ ,रास्ते में मुझे एक कब्रिस्तान दिखा। सुन्दर -सुन्दर फूल लगे थे उसमे। सड़क से बिल्कूल सटे। चलती गाडी से ही एक दो फोटो लेकर ,मैं कुछ सोचने लगी। सोच रही थी कि ,यहाँ अबतक की अंतिम यात्रा नही देखी। कैसी होती होगी ?क्या -क्या होता होगा ? फिल्मों में तो कई बार देखा है ,पर कभी किसी क्रिस्चन के फ्यूनरल को सच में नहीं देखा। 
हाँ एक बार डेज़ी से बातचीत में मालूम हुआ था कि ,ईसाई लोग दफ़ना ज्यादा पसंद करते हैं। लेकिन लोग अब खर्च और जगह की कमी को ध्यान में रखते हुए दाहसंस्कार भी कराने लगे हैं। पर जो रूढ़िवादी ईसाई हैं वो आज भी दफनाना ही पसंद करते है। 
विषय से ना भटकते हुए तपस्या कब्रिस्तान देखने और सोचने पर आओ। हाँ फिर बहुत कुछ सोच रही थी जो बाद में बताऊँगी। अभी हुआ यूँ कि ,खूबसूरत वन वे रोड से निकल कर हमलोग हाईवे पर आ गए। स्पीड लिमिट 50 की थी ,पर गाड़ियाँ रेंग रही थी। ऐसा भी नहीं था कि ,ट्रैफिक हो या कोई एक्सीडेंट दिख रहा हो जीपीस में। वही दूसरे लेन में कोई गाडी ही नहीं जा रही थी। मैं और शतेश हँस रहे थे कि हुआ क्या है ? लोग इतनी कम स्पीड में क्यों जा रहें ? दूसरी लेन में कोई जा क्यों नहीं रहा ? शतेश बोले ऐसे रेंगने से अच्छा दूसरी लेन में चल लेते है। फिर पता नहीं मुझे क्या सुझा मैंने कहा रहने दो। लोग इतने बेवकूफ तो नहीं  शायद आगे रोड बंद हो। काफी जगह रोड का काम भी चल रहा था। खैर हमलोग भी उसी लेन में रेंगते रहे। कुछ 20 मिनट आगे जाने के बाद एक मोड़ था ,जहाँ एक आदमी काले कोट में एक तख्ती लिए खड़ा था -फ्यूनरल ट्रैफिक। भगवान् कसम मैं थोड़ी शॉक्ड रह गई। ये क्या अभी यही सोच रही थी कि ,किसी की अंतिम यात्रा नहीं देखी यहाँ और ये देखो।
जो दूसरा लेन ख़ाली था ,उसपर आगे लाइन से गाड़ियाँ जा रही थीं। सबके ऊपर एक छोटा सा झंडा लगा था ,जिसपर फ्यूनरल लिखा था। मैं और शतेश उन गाड़ियों को देख बात करने लगे कि ,कितना शांत और सम्मान के साथ अंतिम यात्रा चली जा रही है। हमारी लेन की गाड़ियाँ मोड़ के  बाद तेज हो चुकीं थी। फिर कुछ 25 /30 गाड़ियों के बाद हमें एक बड़ी सी गाडी में कॉफिन (शव का बॉक्स ) धुँधला सा दिखा। उसके आगे कुछ गाड़ियाँ बेहद धीरे चल रहीं थी। मैंने शव को प्रणाम किया ,मुक्ति की प्रार्थना की और फिर सोच में डूब गई। शतेश भी चुप थे। शायद वो भी कुछ सोच रहे हों। 
*अब जो कुल मिला कर मेरी सोच थी वो ये रही -मुझे डेज़ी की बातें याद आ रही थी कि -कैसे क्या होता है ।यहाँ अंतिम यात्रा के लिए ज़्यादातर लोग पहले ही अपने लिए किसी फ्यूनरल होम से बात करके प्लॉट बुक कर लेते हैं ।अपनी अंतिम इक्षा की गति अपने घरवालों या किसी पेज पर लिख कर रखे रहते है कि ,उन्हें जलना है या दफनाना ।जो ऐसा नहीं कर पातें उनके परिवारजन या मित्र अपने हिसाब से जो ठीक लगे कर देतें हैं ।यहाँ कब्रिस्तान भी दो होतें हैं -एक ग्रेवयार्ड (जो चर्च के अधीन होता है या चर्च का हिस्सा होता है )दूसरा समेटरिज (ये प्राइवेट प्रॉपर्टी होती है )
ग्रेवयार्ड के भरने के बाद समेटरीज बनाई गई ।डेज़ी के अनुसार यहां भी प्रार्थना उसके बाद भोज होता है ।सब दो या तीन दिन में निपट जाता है ।ये परिवार और मरने वाले की ईक्षा के अनुसार होता है ।
पता नहीं आज मैं ये सब क्यों आपसब तक पहुंचा रही हूँ ।बस मुझे लगा जैसे मेरी जानने की ईक्षा थी शायद औरों को भी हो ।
नोट :- लोग यहां कब्रिस्तान भी घूमने जाते हैं ।कई फेमस कब्रिस्तान ने जाने की फी भी लगती है ,गाइड भी होते हैं ।अभी हैलोवीन आने वाला है तो यहाँ कुछ प्रोग्राम भी होते हैं । मेरा भी बड़ा मन था ,लूसियाना का सेंट लुइस सिमेट्री और विर्जिना का अर्लिंग्टन नेशनल सिमेट्री (सिविल वॉर के सैनिकों के साथ जॉन एफ कैन्डी का भी शव दफन है )देखे का ।गई दोनों जगह पर लूसियाना में उस दिन बारिश हो गई ।वर्जिनिया वाले का टिकट एक आदमी 49 डॉलर। मतलब दोनों का लगभग 100 डॉलर। शतेश मेरा मज़ाक उड़ाते हुए बोले की -श्मशान देखने में समय और इतने पैसा तपस्या ही बर्बाद करने का सोच सकती है। मैंने भी जोक को सीरियसली लिया और जाने से मना कर दिया। खैर अब नहीं देखा तो नहीं देखा। देखिये गूगल से ली हुई तस्वीर। 
पहली लुसियाना की :- जहाँ कब्र मिट्टी के ऊपर घर जैसे बने है।दूसरी सिविल वॉर के सैनिकों की।
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Friday, 22 September 2017

ब्रह्मचारिणी माता का तप रूप !!!

दुर्गा पूजा का दूसरा दिन ।
यहाँ पर जीसस के देख रेख में सब सामान्य है ।पर भोले बाबा की नगरी में ,इन पावन दिनो में भी माँ के रूपों का हनन हो रहा है ।ऐसे में या तो भोलेनाथ समाधि में लीन है ,या उन्हें लगता है कि देवी ख़ुद समर्थ हैं ।ये पापी राक्षस कब समझेंगे की ,चाहे युग कोई भी क्यों ना हो ।नारी का अपमान विनाश का कारक होता है ।
आज "माँ ब्रह्मचारिणी "रूप में हैं तो क्या हुआ ? कभी तो काली रूप धरेंगी ।तब तुम अपना नाश देखना अधर्मियों ।
माँ के शांत स्वरूप को उनकी कमज़ोरी समझ रहें हैं ये लिजलीजे कीड़े ।
जब यहीं कोमल शरीर हज़ारों -हज़ार साल तप करके ।कभी फल -फूल तो कभी निर्जला व्रत करके ।अपने संयम और प्रेम से भोले अगड़भंगी को वश में कर सकती हैं ।फिर तुम जैसे गंजेडी -लफ़ंगो की क्या औक़ात ।
माँ आपके ब्रह्मचर्य को दुनिया अबला समझ रही है ।मुझे आपके महाकाली रूप का इंतज़ार है ।या तो आप सर्वनाश करें या फिर इस नफ़रत और घृणा से भरे समाज में प्रेम का संगीत घोलें ।

सबकी मनोकामना पूरी करने वाली माँ मेरी भी विनती सुन ले ।आपने माता सीता की प्रार्थना स्वीकार कर ,उन्हें राम को वर स्वरूप दिया ।पर मुझे किसी राम की इक्षा नही ।
मुझे तो बस इस दुनियाँ में अपने तरीक़े से स्वतंत्र जीने का वरदान दो ।अपने तरीक़े से राम या रावण चुनने की आज़ादी दो ।मुझे कोई डर -भय ना हो अपने इस नारी स्वरूप को लेकर ।
हे माँ ! मेरी  इस प्रार्थना को स्वीकार करो ।
https://youtu.be/LVIL0qPdo0U


Thursday, 21 September 2017

शैलपुत्री ,गिरिराज नंदनी !!!

दुर्गा पूजा शुरू हो चुकी हैऔर  मुझे बसंतपुर की याद आ रही है। कभी वहाँ के पंडाल की तो ,कभी दिन -रात बजने वाले भोंपू की।दिन -रात बजने वाले भक्ति गीतों से मानो भक्तिमय माहौल हो जाता ।उस वक़्त गीत भी अपने पारम्परिक मैया के गीत या पचरा बजते ।आज की तरह नही धिंचिक टाइप ।आवाज़ भी इतनी की जिससे किसी को परेशानी ना हो ।सच में बसंतपुर में हमेशा बसंत ही रहता ।कॉलोनी में बैठे -बैठे आते -जाते लोगों की झुण्ड को देखना। सुबह उठ कर फूलों की रखवाली करना।रोज हनुमान चालीसा पढ़ना।दस दिन स्कूल की छुट्टी और हमारी मौज ।एक ही दिन सारा होमवर्क करके आठ दिन खेलते रहते ।कितना उत्साह रहता नवमी का ।

यहाँ तो सब दिन एक ही जैसे ।त्योहार भी शांति से आकर चले जाते हैं ।मंदिर में सुविधानुसार शनिवार या रविवार को फ़ंक्शन होता है ।सज धज कर जनता वही इकट्ठा हो त्योहार मना लेती है ।बाक़ी अपने -अपने घरों में सब पूजा -पाठ कर ही लेते हैं ।यू ट्यूब से मैया के गीत सुनकर ख़ुश हो लेते है ।

आज दुर्गा पूजा का पहला दिन यानी "शैलपुत्री माता " का दिन है ।माँ के नव रूप में प्रथम ।शैलपुत्री नाम माँ का पर्वतराज हिमायल के पुत्री होने के कारण पड़ा ।माँ के इस रूप को पार्वती या हेमवती भी कहते हैं ।
कहा जाता है कि ,पार्वती जी सती का ही दूसरा रूप हैं ।
सती जब अपने पिता के अपमान से क्रोधित होकर आत्मदाह कर लेती हैं ।तो उनका अगला जन्म पार्वती के रूप में पर्वतराज हिमालय के यहाँ होता है ।
शैलपुत्री को प्राकृति भी माना जाता है ।पर्वत ,वायु ,वन ,भूमि सबका मिश्रित रूप ।
माता दुर्गा के इस रूप को कोटि -कोटि प्रणाम ।
साथ ही गिरिराज नंदनी की वंदना करते हुए अश्विनी भिंडे जी को सुने ।
https://youtu.be/3dQBbgns


Friday, 15 September 2017

जितिया व्रत और कथा !!!

तीज पर मैंने कई पोस्ट पढ़े कि,क्यों पुरुषों के लिए व्रत रखें? पर जितिया के लिए हर जगह सन्नटा था। संतान मोह होता ही कुछ ऐसा है। इसमें कुछ सही गलत नही लगता। बस हमारे बच्चें स्वस्थ रहें, ख़ुश रहें यही हर पल कामना होती है। हालाँकि ये व्रत भी पुत्र के लिए ही किया जाता है। पर कुछ माएँ अपवाद भी तो होती हैं। जैसे की मेरी माँ।
तो चलिए कहानी के शौक़ीन लोगों को व्रत कथा भी सुनाई जाए।
व्रत :-जितिया।
मनोकामना :- वंश वृद्धि ,संतान दीर्घायु हो।
पूजन :-शिव -पार्वती, गणेश के साथ जितबानन गोसाई की पूजा।
विधि:- निर्जला उपवास। नदी के तट पर कथा सुनना। पार्वती माँ की शृंगार सामग्री के साथ गणेश जी के लिए कुछ खिलौने, प्रसाद, दान -दक्षिणा और अगले दिन पारन।

कथा :- जितिया कथा में तीन कहानियाँ सुनाई जाती है। जब छोटी थी तो माँ के साथ नदी किनारे जाती। कहानियों से शुरू से ही लगाव की वजह से औरतों के बीच बैठ कर मैं भी कथा सुनती। एक साथ तीन -तीन कथा पंडित जी सुनाते। अगर कोई महिला बीच में बात करने लगती तो मोटकू पंडित जी ग़ुस्सा हो जाते। कथा छोड़ कहते “कथा सुने आएल बानी लोग की पंचायत करे ?” बतिया ली लोग हम जा तानी।
कुछ औरतें पंडित जी के प्रकोप से डर कर चुप हो जाती तो कुछ पंडित जी को छेड़ने लगती। हमारे यहाँ पंडित जी से मज़ाक़ या शादी-ब्याह में उनके नाम से गाली गाना कोई नई बात नही।
इधर मैं तबतक अपने दोस्तों के साथ नदी किनारे खेल कर आ जाती। कारण पंडित जी तो अभी प्रवचन लम्बा चलेगा।

वैसे जितिया के बारे में ये प्रचलित है कि, जिसको पुत्र होगा वही करेगा। मेरी माँ कथा के बाद पहले मेरा ही नाम लेती फिर भाई का। कई औरतें माँ को टोक भी देती “येजी पहले बेटा के नाम ली।”
"माँ मुस्कुरा कर कहती -मेरे लिए पहले लव्ली फिर चुलबुल।"

ख़ैर मेरी राम कहानी से आगे जितिया की कथा तक पहुँचते हैं ।
पहली कथा :-एक बार एक जंगल में चील और सियारीन घूम रहे थे, तभी उन्होंने कुछ महिलाओं को नदी के किनारे इस व्रत को विधि पूर्वक करते देखा और कथा सुनी। चील ने इस व्रत को ध्यानपूर्वक देखा और श्रद्धा पूर्वक व्रत का पालन किया। वही सियारीन का ध्यान बहुत कम था। उसने व्रत तो किया पर रात को भूख लगने के कारण, माँस खा लिया। व्रत के पुण्य से चील की संतानों को कभी कोई हानि नहीं पहुँची। वहीं सियारीन की सभी संताने एक एक कर मृत्यु को प्राप्त हो गाई।

दूसरी कथा :-महाभारत युद्ध के बाद अपने पिता की मृत्यु से अश्व्थामा बहुत क्रोध में था। बदले की भावना से उसने पांडवो के शिविर में घुस कर सोते हुए पांच लोगो को पांडव समझकर मार डाला।लेकिन वे सभी द्रोपदी की पाँच संताने थी।उसके इस अपराध के कारण अर्जुन ने उसे बंदी बना लिया।उसकी दिव्य मणि छीन ली।जिससे क्रोधित हो अश्व्थामा ने उत्तरा (अर्जुन की दूसरी पत्नी )की अजन्मी संतान को गर्भ में मारने के लिए ब्रह्मास्त्र चला दिया।
ब्रहमास्त्र को निष्फल करना असंभव था। तब भगवान श्री कृष्ण ने अपने सभी पुण्यों का फल उत्तरा की अजन्मी संतान को देकर, उसको गर्भ में ही पुनः जीवित किया। गर्भ में ही मरकर जीवित होने के कारण उसका नाम “जीवित्पुत्रिका" पड़ा बाद में यहीं “राजा परीक्षित” हुए। तब ही से इस व्रत को किया जाने लगा।

तीसरी कथा :-गन्धर्वों के राजकुमार का नाम जीयूतवाहन था। वे बड़े उदार और परोपकारी थे। जीयूतवाहन  के पिता ने वृद्धावस्था में वानप्रस्थ आश्रम में जाते समय इनको राजसिंहासन पर बैठाया। पर इनका मन राज-पाट में नहीं लगता था। वे राज्य का भार अपने भाइयों पर छोड़कर स्वयं वन में पिता की सेवा करने चले गए। वहीं पर उनका मलयवती नाम की राजकन्या से विवाह हो गया।
एक दिन जब वन में भ्रमण करते हुए जीयूतवाहन काफी आगे चले गए तो वहाँ उन्होंने एक वृद्धा को विलाप करते देखा। पूछने पर वृद्धा ने बताया कि मैं नागवंश की स्त्री हूँ। मुझे एक ही पुत्र है। पक्षीराज गरुड़ के सामने नागों ने उन्हें प्रतिदिन खाने हेतु एक नाग देने की प्रतिज्ञा की है। आज मेरे पुत्र की बलि का दिन है।

जीमूतवाहन ने वृद्धा से कहा, डरो मत माते। मैं तुम्हारे पुत्र के प्राणों की रक्षा करूंगा। आज उसके बजाय मैं स्वयं अपने आपको लाल कपड़े में ढाँक कर शिला पर लेट जाऊँगा। नियत समय पर गरुड़ आए और वे लाल कपड़े में ढाँके जीमूतवाहन को पंजे में दबोच उड़ चले। मृत्यु को पास देख कर भी गरुड़ का शिकार शांत चीत रहा तो गरुड़जी बड़े आश्चर्य में पड़ गए। उन्होंने जीयूतवाहन से उनका परिचय पूछा। जीयूतवाहन ने सारा किस्सा कह सुनाया। गरुड़जी उनकी बहादुरी और बलिदान से बहुत प्रभावित हुए। प्रसन्न होकर गरुड़जी ने उनको जीवनदान  दिया ।साथ हीं नागों की बलि न लेने का भी वरदान दे दिया ।इस प्रकार जीयूतवाहन के साहस से नाग-जाति की रक्षा हुई ।तभी से पुत्र की सुरक्षा हेतु जीयूतवाहन की पूजा की जाने लगी ।
तो अंत में बोलें :-ये अरियार ।
ता का बरियार ।
जाके कहिएय राजा रामचन्द्र जी से की -सत्यार्थ के माई जितिया कईले बाड़ीन ।
इम्पोर्टेंट :- इस व्रत कथा में भी बहुत डराया गया है की,खाने -पीने से संतान पर कष्ट आ सकतें हैं।मैंने पहली बार ये व्रत किया ।संतान मोह में या पहली बार की उमंग वश निर्जला व्रत तो कर लिया पर अगले दिन पारन के बाद बीमार पड़ गई ।माँ और एक दोस्त ने बताया ये व्रत लगता है ।मतलब इसके बाद थोड़ा बीमार पड़ सकतें है ।ख़ैर इसका नुक़सान तो मेरे सत्यार्थ को हुआ ।बीमार मैं हुई बेचारा कल पूरे दिन सिर्फ़ दूध पर ही रहा ।मैं कुछ बना ही नही पाई ।शतेश शाम को आकर उसके लिए खिचड़ी बनाए ।।शतेश ने व्रत के दिन छुट्टी ले रखी थी ,इसलिए अगले दिन पारन का खाना बना कर ऑफ़िस चले गए ।
निष्कर्ष :- अगले साल से मैं भगवान का नाम लेकर पानी पी लिया करूँगी तीज व्रत की तरह ।अगर माँ ही बीमार रही तो संतान कहाँ से स्वस्थ होगा ।