Thursday, 24 May 2018

माँ!!!

हम दोनो को धड़कने एक साथ चल रहीं थीं।धड़धड़ -धड़धड़ -धड़धड .......
एक पल को तुम्हें सीने से लगाए मैं सोच में पड़ गई कि कहीं ये मेरा भ्रम तो नही ।ये कैसे हो सकता है ?
मैंने थोड़ी देर के लिए अपनी साँसे रोक ली और फिर से हम दोनो की धड़कने गिनने लगी ।इतने में मेरी साँसे फूलने लगी ।मैंने ज़ोर से एक साँस बाहर हवा में फेंकी और दूसरी अपने अंदर भर ली ।
इस क्रम में तुम थोड़ा हिले और फिर मुझसे लिपट कर सो गए ।मुझे अपनी हरकत पर हँसी आ रही थी ।भला साँस बंद करने से भी धड़कने रूकती है ।काउंटिंग शुरू ही करनी थी तो कुछ और सोच लेती ।

ख़ैर पागल लड़कियों का कुछ भरोसा नही होता ,अनुलोम -विलोम तो होता नही साँसो की गिनती चाहतीं हैं ।
मेरा दिमाग़ अब भी गुना भाग में लगा है ऐसे कैसे एक साथ धड़क -धड़क -धड़क ।हमदोनो की प्लस रेट तो अलग है ।
मेरी प्रति मिनट साठ से अस्सी के बीच होगी और तुम्हारी  एक सौ तीस -एक सौ चालीस के बीच ।ऐसा कैसे हो रहा है ।एक पल को तो इन गिनती के चक्कर में मेरी साँसे भारी होने लगीं थी ।

फिर मैंने इन साँसो के खेल से ध्यान हटाया ।सोचा हो सकता है मैं इसके प्रेम में हूँ श्याद इसलिए मेरी धड़कने तेज़ चल रहीं है ।इसके साथ चल रहीं है ।मेरी एक -एक धड़कन इसके साथ चलना जो चाहती है ।

क्या ?

हाँ सही तो सुना आपने ।मेरी एक -एक धड़कन इसके साथ चलना जो चाहती है ।
चाहे भी क्यों ना माँ जो हूँ मैं इसकी ।
“माँ “
मेरे सत्यार्थ की माँ ,मेरे इशु की माँ ,मेरे मीर मस्ताना मेरे राजा ,सोनू ,मोनु ,जान सबकी माँ ।बस माँ ।

हवा में इतने ऊपर लटके तुम्हें अपने सीने से लगाया जाने मैं क्या -क्या सोच रही थी ।था भी तो नही कुछ करने को ।गोद में तुम सामने टँगी तुम्हारी फ़ोल्डेबल क्रिब आसपास बेसुध पड़े सहयात्री ।

जाने कब आँखे मूँदे -मूँदे ,सोचते -सोचते तुम्हारे जन्म तक पहुँच गई ।तुम्हारा अचानक आ जाना हम तीनो के लिए कोस्टर राइड जैसा था ।ख़ुशी ,चिंता ,विश्वास ,उल्लास और प्रेम ।
तुम्हारे घर आने के बाद डॉक्टर का हर कुछ दिन पर कॉल आता कि सब ठीक है ना ।मैं कैसी हूँ ? डिप्रेसन की समस्या तो नही हो रही ?मेरा जबाब होता -ना।सब ठीक है ।

डिप्रेसन ? और वो भी तुम्हारे होने पर ?
हाँ ,डिप्रेसन ।श्याद मुझे हुआ हो और मालूम ना चला हो ।श्याद लाखों माताओं को होता हो और मालूम ना चलता हो ।

डॉक्टर ग़लत तो नही पूछती थी ।क्यों ना हो डिप्रेसन ?
अब तक जो दो दिल धड़क रहें थे वो फिर से एक हो गया ।जो अंदर भरा हुआ था वो ख़ाली हो गया ।जो मेरे ख़ून से सींचा जा रहा था ,जो मेरी साँसो से चल रहा था ।जो एक नाम के अंबेलिकल कॉड से जुड़ा था ,आज उसी कॉड से अलग होते समय दर्द इतना जैसे मेरा मर जाना ।

दुःख तो होता होगा ।बहुत होता होगा ।ऐसा जैसा किसी के जाने का दुःख ।तभी तो श्याद गाँव में रिवाज है बारह दिन तक कुछ ना करने का ,छूत लगने का ।पर श्याद तुम्हारे होने के असीम ख़ुशी और सुख में हम वो जाने का दुःख भूल जातें है ।
सच तो ये भी है ,ये जाना तुम्हारे साथ बहुत कुछ लेकर आता है ,ख़ुशी के आँसू ,असीम प्यार ,ढेर सारा आशीर्वाद और जीवन का चक्र ।

Tuesday, 22 May 2018

आज बात हॉलैंड की ।एक मिनट रुकिए मैं यूरोप वाले हॉलैंड की बात नही कर रही ।अमेरिका में भी एक हॉलैंड है ।है ये अमेरिका में पर इसकी ख़ूबसूरती यूरोप के हॉलैंड जैसी हीं है ।ऐसा मेरे एक दोस्त जो यूरोप हो आए है उन्होंने ने बताया ।

बात करते है इस हॉलैंड की तो जब यूरोप से डच लोग (नीदरलैंड के लोग )अमेरिका आए तो अपनी सुबिधा और प्रकृति अनुसार अमेरिका के अलग -अलग भाग में बस गए ।वैसे तो डच अमेरिका के हर भाग में थोड़े -बहुत संख्या में मिल जायेंगे पर किसी -किसी भाग में इन्होंने अपनी कॉलोनी बना ली है ।मतलब वहाँ इनकी संख्या ज़्यादा है ।आपको याद होगी मेरी वर्जिन्या ट्रिप ।

इसे ऐसे समझे ।जैसे हम भारतीय अमेरिका आ गए ।मैं बिहार की तो मैं और दूसरे बिहार के लोग साथ मिलकर अमेरिका के किसी एक भाग में जा बसते है ।ऐसे तो भारतीय अमेरिका के हर प्रांत में है पर इनकी संख्या न्यू जर्सी ,टेक्सस और कैलिफ़ोर्नीया के कुछ भाग में ज़्यादा है ।

हाँ तो फिर आते है हॉलैंड की तरफ़ ।ये मिशिगन राज्य में लेक मिशिगन के किनारे बसा हुआ है ।छोटी जगह है पर हर तरफ़ फूल हीं फूल ।ट्युलिप के फूल हॉलैंड की पहचान है इसलिए यहाँ ज़्यादातर ट्युलिप हीं आपको दिखेंगे ।मई महीने में यहाँ ट्युलिप फ़ेस्टिवल भी होता है ।जिसे देखने काफ़ी लोग आते हैं।

हमलोग भी पहुँच गए इस फ़ेस्टिवल में ।इंडीयाना मेरे ठिकाने से कुछ तीन साढ़े तीन घंटे की दूरी पर हॉलैंड शहर है ।दो दिन के लिए हम भी पहुँच गए वहाँ ।एक दिन में भी आप घूम कर आ सकते हैं पर ठीक से घूम नही पाईएगा ।भागमभाग हो जाएगी।

हमलोग क़रीब डेढ़ दो बजे यहाँ पहुँचे।अड्रेस “वेलधीर टूलिप गार्डन “का ही डाला था ।एंट्री फ़ी दस डॉलर पर पर्सन ।तीन छोटे -छोटे विंड्मिल और ट्युलिप से भरा खेत ।सत्यार्थ ने तो ऊधम मचा दी ।
फूल तोड़ने पर ढाई सौ डॉलर फ़ाइन था ।लगभग एक घंटे रुकने के बाद जैसे तैसे बाहर आए तो सत्यार्थ बाबू अपना एक जूता गिरा चुके थे ।
बाहर कुछ गिफ़्ट शॉप थे ,जिसमें लकड़ी के बने टूलिप और जूते बिक रहे थे ।साथ ही चीनीमिट्टी के ख़ूबसूरत बर्तन भी ।

यहाँ से फिर डाउंटाउन को निकले ।शाम को फ़ायर वर्क्स और कुछ प्रोग्राम थे जो बाद में मौसम ख़राब की वजह से कैसिल हो गए ।मौसम जो ख़राब हुआ कि हमलोग भाग कर होटेल आ गये ।हल्की धूप थी पर वो कँपाने वाली हवा की मत पूछिए ।सत्यार्थ की तो आँखो से पानी आने लगा था ।

दूसरे दिन मौसम अच्छा था ।सुबह हल्की बारिश हुई थी पर ठंड कम थी ।आज हमलोग  “विंड्मिल आईलैंड गार्डन “गए ।हॉलैंड की दूसरी पहचान विंड्मिल और लकड़ी के जूते भी हैं
एंट्री फ़ी यहाँ भी दस डॉलर पर पर्सन ।ट्युलिप से भरे बाग़ में दो विंड्मिल लगे थे ।एक विंड्मिल तो पुराना होने के बावजूद आज भी काम कर रहा था ।उसका अलग से आधे घंटे का टूर था ।अंदर जाने पर इसकी मदद से कैसे अनाज की कुटाई ,छटाई और पिसाई होती है एक महिला गाइड बताए जा रही थी ।
इसके बाद हम डाउंटाउन आ गए ।कुछ एक घंटा यहाँ बिताने के बाद हमलोग “हॉलैंड स्टेट पार्क “जो कि लेक मिशिगन के किनारे है वहाँ गए ,”हॉलैंड हॉर्बर लाइट “देखने ।ये इस शहर का पहला लाइट्हाउस है ।लाल रंग के होने के कारण इसे “बिग रेड “नाम से भी पुकारते है ।

और इस तरह हॉलैंड की यात्रा सम्पन्न हुई ।यात्री अपने घर को लौट आए ।
कुछ तस्वीरों के ज़रिए आप की भी यात्रा शुरू होती है अब ।




Saturday, 14 April 2018

राम और रेप !!!!

पिछले कुछ दिनो से सोशल मीडिया पर एक ही चर्चा है -“राम और रेप “
दोनों ही नया मुद्दा नहीं है ,न ही दोनों पर किसी भी सरकार ने कभी ढंग का कोई निर्णय लिया।सरकार की क्या बात करे? हमने ,हमारे समाज ने भी तो बस हो -हल्ला ही किया।मुद्दे दर मुद्दे भटकते रहे।या फिर भटकाए जाते रहे। 

राम ने स्त्री सम्मान के लिए जानवरों ,माफ़ कीजिये मेरा मतलब बंदरो ,रीछों से है की मदद से शक्तिशाली रावण का वध कर दिया।जबकि उसने तो बस उनकी पत्नी का अपहरण किया था। और हम... 

हम ना तो भगवान् है ना बन सकते है ,इसलिए तो आज कई स्त्रियों ,बच्चियों के शारीरिक दोहन को भी राम का रंग दे रहें हैं।हम उन कथित जानवरों से भी नीच है जिनका अपना कोई विवेक नहीं।जिन्हे बस खून की प्यास है। 
“ओह !राम ने सबको बाँट दिया”

वहीं कभी जाति का दायरा मिटाने  के लिए निचले तबके के लोगो ने ,अपने नाम में राम लगाना शुरू कर दिया था।शायद ये सोच कर कि ,राम सबके हैं।मूर्ख लोग धर्म के जाल को समझ ही नहीं पाए। 

धर्म ने इस कदर पागल बना रखा है कि ,इसकी मिशाल नीचे लगी तस्वीर है। 
तस्वीर राजापट्टी (सारण जिला ) के एक चौक की है।यहाँ बाबा साहेब जी की मूर्ति की स्थापना हुई।कुछ सवर्ण गवारों को ये बात हज़म नहीं हुई।उन्हें लगा उनके इलाके में किसी निचले तबके के इन्शान की मूर्ति कैसे ? अपने दल के साथ उन्होंने मूर्ति के सर को तोड़ने की कोशिश की।कालिख पोता।

नालायकों को कहाँ मालूम की वो खुद पर कालिख पोत रहें है।खुद का मस्तिक ,विवेक धर्म के नाम पर कूट रहे है। 
अच्छा है अम्बेडकर आप नहीं रहे ,वरना धर्म का ऐसा नंगा नाच देख कर आप खुद अपने मुँह पर कालिख पोत लेते।
ऐसे में आपके जयंती की क्या शुभकामनायें। 


Sunday, 28 January 2018

बिहार में सर्दी !!!

बिहार में सर्दी रानी जाते -जाते रह गईं।लगा था सरस्वती पूजा के बाद दिन खुलने लगेगा ,पर यहाँ तो छब्बीस जनवरी से सूर्य देवता लगभग ग़ायब से ही रहे हैं ।हर घर के लोग बाहर घूर लगाए बैठे हैं ।घर तो छोड़िए लोगों ने सड़कों को भी नही छोड़ा है ।
कल कुछ काम से बेतिया जाना हुआ ।सुबह के दस बज चुकें थे और चारों तरफ़ धुँध ही धुँध ।इस मौसम में भी कुछ किसान खेतों में गन्ना छील रहें हैं तो ,कुछ बच्चे बकरी ले कर निकल पड़े हैं ।मुझे थोड़ा अफ़सोस हुआ ।
भाई से पूछी ,ऐसे मौसम में गन्ना छीलने की क्या ज़रूरत ? क्या एक -दो दिन रुक कर ये लोग नही कर सकतें ?
भाई बोला -बहन किसान के लिए फ़सल से ज़्यादा कुछ महत्वपूर्ण नही होता ।फ़सल ही उसका जीवन है ।जब जीवन ही नही तो क्या ठंड क्या बारिश ।इनके गन्ने का नम्बर लगा होगा मिल में ,इसकी वजह से ये परिवार इस ठंड में खेत में लगा हुआ है ।

कुछ आगे जाने पर लोगों ने लगभग सड़क को ही घर -दुआर बना रखा था ।सच पूछिए तो इस बार मुझे आपने गाँव में गंदगी ज़्यादा दिख रही थी।लोगों ने सड़कों पर ही घास-फूस ,खर -पतवार फैला रखा था ।उनके मवेसी उसी पर लेटे हुए थे ।कही गोबर तो कहीं राख ।इनके बीच आग तापते लोग ।कई जगह तो ड्राईवर को गाड़ी मोड़ने में भी दिक़्क़त हो रही थी।लोगों ने खादर ,पतवार सड़क पर ही जमा कर रखा था ।

 ये सब देख कर मैंने भाई से कहा - अपने गाँव के लोग बहुत गंदगी में रह रहें हैं ।ऐसे में तो बीमारी फैल जाएगी।
भाई बोला गंदगी ?
 कहाँ दिख रहा है तुम्हें बहिन ? थोड़ा इनके नज़रिए से भी देखो ।ये जो तुम गंदगी कह रही हो ,ये सब जैविक चीज़ें हैं ।आसानी से सड़ गल के खाद बन जायेंगी ।फिर इन लोगों के काम आ जायेंगी ।साथ हीं इनसे कभी कोई बड़ी बीमारी नही होगी ।
“गंदगी तो तुम फैला रही हो डाइपर के रूप में " और हँसने लगा ।
वहीं दूसरी ओर तुम बताओ ,जिसको दुआर नही ।झोपड़ी का घर है ।मवेसी हैं ।इतनी ठंड में वो अपने जानवर कहाँ बाँधे ? जलावन कहाँ से लाए ? ये जो तुम खर -घास सड़क पर देख रही हो ,उसपर दिन में उनके मवेसी रहेंगे ,साथ ही उनके जलावन का इंतज़ाम भी हो जाएगा ।
इनके पास हीटर तो है नही जो जला कर ताप लिया ।अब ऐसे में थोड़ा राख फैल भी जाता है तो क्या हो गया ?

इस तरह अपनी तकलीफ़ और इन लोगों का दर्द देख कर सर्दी माता से नम्र निवेदन है -हे माई ! अब तो दया करो ।
कुछ तस्वीरें -

Monday, 27 November 2017

बेटी की शादी !!!

आज एक मित्र ने अपने सोसायटी में रहने वाले गार्ड की परेशानी लिखी ।परेशानी ये थी की -उनकी बेटी की शादी तय हो गई है ,पर पैसे की समस्या है ।मुझे ये पोस्ट पढ़ कर अपनी शादी के दिन याद आ गए ।कुछ समझ नही आता कैसे हो बेटी की इस समस्या का समाधान ।
मेरी कहानी कुछ यूँ रही -
मेरी माँ मेरी शादी के पीछे पड़ गई थी ।कारण मेरी पढ़ाई हो गई थी ।जॉब भी करने लगी थी ।ऐसे में आस -पड़ोस के लोग माँ को टोक देते ।सुन -सुनकर माँ भी इस बारे में सोचने लगी थी ।मेरा मन अभी एक -दो साल शादी का नही था ।या यूँ कहे मुझे शादी से बड़ा डर लगता था ।मैं टालते रहती ।ऐसे में माँ अपनी बी पी का बहाना करने लगती ।वहीं हर माँ की तरह ,कही मर गए तो बेटी की शादी भी नही देख पायेंगे आदि -आदि ।

फिर मेरे हाँ कहने के बाद असली समस्या शुरू हुई ।मेरे पिता जी नही है ।माँ ने ही दोनो भाई बहन को पाला है ।अब अरेंज मैरिज वो भी बिहार में ? लड़के के घर रोज़ दौड़ने की प्रैक्टिस करने वाला कौन था मेरे घर ? कौन गाँव -गाँव जाकर इतना लड़का ढूँढता ? जी हजुरी करता ।

ऐसा नही है कि मेरे रिश्तेदार नही ।सबलोग हैं ।सब लोग अच्छे नौकरी पेसा लोग हैं ।अब ऐसे में कौन मेरे लिए बार -बार छुट्टी लेकर लड़का ढूँढे ।मामा जी ,चाचा जी ने दो तीन लड़के बतायें ,पर बात वहीं ।लड़का पुणे ,बंगलोर ।परिवार किसी गाँव में ।लड़के के परिवार से तो मामा -चाचा मिलने जाने को तैयार थे ।लड़के से कौन इतनी दूर मिलने जाय ।फिर अपने यहाँ का देखा -देखौकि अलग से ।ऐसे में मेरा भाई (जो मुझसे छोटा है )एक लड़का को देखने गया ।बहुत बुरा लगा था मुझे उस दिन ।ख़ैर भाई को लड़का तो अच्छा लगा पर परिवार नही ।

ज़रा सोचिए सारे साधन थे मेरे पास ।बस एक पिता का ना होना ,मेरे छोटे से भाई को कितना ज़िम्मेदार बना गया ।
**कई बार मैं सोचती थी ,इससे अच्छा तो लव मैरिज कर लेती ।
हमलोग शादी को लेकर इतने भी परेशान नही थे ,कारण अभी तो शुरुआत ही की थी ।वहीं मेरे लिए रिश्तेदारों के बताए रिश्ते भी आ रहे थे ,पर कही कुंडली नही मिलती तो कही माँ को उस रिश्तेदारी में शादी नही करनी ।
फिर भी मैंने माँ और भाई से कहा तुमलोग इतना मत सोचो ।मैं किसी से भी शादी के लिए तैयार हूँ ।किसी से मतलब पेशा से है ।फिर तय हुआ शादी अगले साल करनी है तो ,अगले साल लड़का ढूँढे ।माँ को समझा कर मैं भाई फिर से मस्त हो गए ।माँ भी अगले साल का इंतज़ार करने लगी ।

इसी बीच भाई के एक दोस्त जो उससे बड़े थे ,हमारे फ़्लैट पर आए ।मेरे भाई के हर उम्र के दोस्त है ।उन्होंने अपनी बहन की शादी मेटरीमोनियल से तय की थी ।बहन को भी हमलोग जानते थे ।शादी तो पटना (घर ) से होनी थी ।बस उनकी सगाई दिल्ली में थी ,तो दीदी को कुछ मदद चाहिए थी ।उन्होंने ही भाई को कहा मेरा भी प्रोफ़ाइल बना दे ।

प्रोफ़ाइल बन गई ।आह ! क्या दिन थे वो ।ऑफ़िस से आने के बाद हम दोनो भाई बहन जीवन साथी की साइट खोल कर ख़ूब मज़े करते ।एक इक्सेल सीट बना लिया था ।भाई कहता चल बहिन ,ग्रूम -ग्रूम खेला जाय ।
रोज़ लड़का देखते ,मज़ाक़ उड़ाते ।जो अच्छा लगता उसका रिक्वेस्ट ऐक्सेप्ट करते ।फिर सीट में उनका नाम ,शहर का नाम ,शिक्षा ,जॉब ,परिवार वाला खाना भरते ।
खाना पकाने वाली आंटी को चाय बनाने को कह,हमलोग इसमें ही लग जातें ।जबतक खाना नही बनता।जीवन साथी हमारा मनोरंजन का साधन बन गया था ।समझ लीजिए फ़ेस्बुक हो ।

फिर दिवाली में जब घर गई ।माँ को बताया ऐसे लड़का ढूँढ रहें है ,उसने सिर पकड़ लिया ।बोली तुम दोनो का दिमाग़ खराब हो गया है ।दो फँसोगे एक दिन । ऐसे शादी -ब्याह कहीं होता है ब्राह्मण में ? क्या बाहर रहते हो न्यूज़ नही सुनते ? ऐसे शादी के लिए मेरी हाँ कभी नही होगी ।और भी बहुत कुछ ...

हमलोग ने माँ को समझाने के लिए जीवन साथी की साइट खोली।एक लड़का माँ को भी अच्छा लगा पर उसका घर राँची था ।माँ को तो ऐसे भी मन नही था ,बोली इतनी दूर बेटी की शादी नही करेंगे ।
तभी भाई को जाने क्या सूझा बोला -रुको सर्च करते हैं ।बिहार का कोई लड़का है क्या इस साइट पर ।और फिर हमें "शतेश "मिले ।मिले भी इतना पास की भले ये सात समुन्दर पार थे ,पर इनका घर जहाँ हम रहते वहाँ से 45 मिनट की दूरी पर ।इनसे भाई की बात हुई ।फिर माँ के ना हाँ के बीच भाई शतेश के घर पहुँच गया ।

शतेश के घर वाले हैरान ।एक 24/25 साल का लड़का अपनी बहन की शादी की बात करने आया है ।
शतेश के पापा बोले किसी बड़े -बुज़ुर्ग को बुला लाओ ।तुमसे क्या शादी की बात करे ?तुम्हें अनुभव ही कितना है ?

मेरे घरवाले ऐसी शादी की बात से डर रहे थे ।डर था कुछ गड़बड हुई तो उन्ही पर इल्ज़ाम होगा ।सब कुछ ना कुछ बहाना बना रहे थे ,ना आने का ।
फिर जब हमने माँ को मना लिया सब आए ।शतेश के घर भी गए ।
कुल मिला कर ये समझिए ,मेरी शादी सिर्फ़ और सिर्फ़ मेरे भाई ने की है ।माँ के मामा जी तब छपरा में मेजर थे ।उन्होंने ने काफ़ी मदद की ।
शादी की सारी तैयारी मैंने और भाई ने माँ के मामा जी की मदद से की ।
यक़ीन मानिए , भगवान की कृपा से मेरी शादी ,मेरी घर की सबसे अच्छे से अरेंज शादी हुई ।शतेश के पापा आज भी मेरे भाई से बहुत प्यार करते है ।उसकी मिशाल सबको देते रहते है ।

नोट :-कहानी संक्षेप में लिखी ।पर ये समझ लीजिए बेटी कि शादी खास कर बिहार में एक गम्भीर समस्या है ।किसी के पास साधन की कमी तो कहीं पिता की कमी ।आजकल "अगुआ "(शादी कराने वाला ) का लुप्त का ना होना और समस्या पैदा कर देता है ।सिर्फ़ पैसा ही नही आपको ख़ुद को लगाना होता है बेटी की शादी में ।
बेटी के योग्य या अयोग्य का इससे कोई सम्बंध नही ।योग्य भी हार मान किसी से शादी को राज़ी हो जाती है ।
ऐसे में महाराष्ट्र ,दिल्ली की तरह बिहार में भी शादी योग्य लड़के -लड़की की पत्रिका निकलनी चाहिए ।शादी का ख़र्च भी दोनो पक्षों को आपस में बाँट लेना चाहिए ।
**याद रखिए किसी की बेटी की शादी ही नही अपके बेटे की भी तो शादी है ।

Wednesday, 1 November 2017

बुरी आत्मा का प्रवेश !!!

31अक्टूबर ,हेलोवीन के दिन एक व्यक्ति के अंदर पापी दुष्टात्मा प्रवेश कर गई ।जहाँ एक तरफ़ लोग हेलोविन के उत्साह में डूबे थे ,दूसरी ओर एक पापी आत्मा काल का रूप ले रही थी ।उसने न्यू यॉर्क में अपनी गाड़ी से लोगों को कुचल डाला ।ट्रिक (हेलोविन का एक रिवाज )को उसने सचमुच भयावह बना डाला।मासूम लोग ये भी नही समझ पाए कि,ये ड्राइवर की सोची समझी चाल है या गाड़ी की ख़राबी ।जबतक कुछ समझ आता है ,कई लोगों की जान चली गई ।
जहाँ ये घटना हुई ,वो वर्ल्ड ट्रेड सेंटर से ज़्यादा दूर नही है ।
वहीं "वर्ल्ड ट्रेड सेंटर "जिसके "नाइन इलेवन" के ज़ख़्मों की निशानी अभी भी वहाँ मौजूद है ।आज भी हज़ारों मृतकों के नाम ,उस फ़ाउंटन के दीवारों पर आँसू बहा रहे होते है । पूछते है कि ,क्या ग़लती थी हमारी जो हम यहाँ हैं ।
हमें यहाँ नही होना था ।हम भी आपकी तरह इस ख़ूबसूरत दुनिया को जीना चाहतें थे ।
आज भी लोग यहाँ आ कर इमोशनल हो जातें हैं ।उस समय को याद करतें हैं ।उस वक़्त हमारी आत्मा तड़प उठती है ।हम अपना हाथ बढ़ाना चाहतें हैं ,आपके आँसुओं को पूछने के लिए ।आपको इस क्रूर दुनिया में रहने की हिम्मत देने के लिए।पर हमारे हाथ तो काट लिए गए ।
कैसा संयोग है ,कुछ ही सप्ताह पहले मैं ,शतेश और सत्यार्थ यहाँ गए थे ।वैसे हमलोग तो कई बार यहाँ आ चुकें हैं ,पर सत्यार्थ पहली बार आया था ।लोगों की भीड़ और फ़ाउंटन उसे आकर्षित कर रही थी ।फ़ाउंटन के मार्बल पर वो बार -बार हाथ मार रहा था ।मानो सत्यार्थ के अंदर बसे भगवान इन मार्बल पर ख़ुदे व्यक्ति के आँसू पोंछ रहे हों।सत्यार्थ के बार बार उछलने और हाथ मारने से हमलोग उस जगह से हट गए ।डर लग रहा था कि ,वो गिर ना जाय ।
फिर हमलोग जो मेमोरीयल हॉल बना है ,वहाँ गए ।इसकी मेमोरीयल की आकृति एक गिरते हुए हवाईजहाज़ की दी गई है ।इसके अंदर तमाम बड़े शोरूम और डब्लू टी सी मेट्रो स्टेशन भी  है ।अंदर में काफ़ी सुरक्षा व्यवस्था है ।
पहली बार मैंने यहाँ देखा कि,टॉलेट जाने की गाली के बाहर भी गार्ड तैनात थे ।गार्ड से आप डर के माहौल की उम्मीद ना करें ।वो जीतनी सुरक्षा के लिए होते हैं ,उतने ही मददगार भी । कुछ पूछना हो तो उनसे बेधकड पूछ सकतें है ,चाहे वो ट्रेन रूट की बात ही क्यों ना हो ।लोग बाग़ तस्वीरें निकालने में मशरूफ थे ।हमने भी कुछ तस्वीरें लीं और निकल पड़े टाइम स्क्वाइअर की तरफ़ ।
नोट:-पूरी इमारत सफ़ेद रंग की बनी है ।शायद शान्ति की उम्मीद हो ,या 9/11 की कफ़न की चादर ।
इसी बीच भारत में भी ऐन टी पी सी कांड हो गया ।लगता है सच में कलयुग आपने अंतिम चरण की ओर है ।

Wednesday, 11 October 2017

कब्रिस्तान !!!

वीकेंड हमारा घूमने के नाम फिक्स होता है। कही ना कही जरूर ही जाते है ,जबतक कोई मौषम की गड़बड़ी ना हो या अपनी तबियत की गड़बड़ी ना हो। इसी तरह दुर्गा पूजा वाले वीकेंड को, हमने ब्रज टेम्पल जाने का प्लान किया। सच बताऊँ तो मुझे अमेरिका का कंट्री साइड यानि छोटे -छोटे गाँव जवार के रास्ते और गाँव  ही ज्यादा पसंद आते है। हो सकता हो छोटे जगह से आने का असर हो। खैर मंदिर जाने का रास्ता बहुत ही सुन्दर है। उसकी तस्वीरों के साथ फिर कभी मिलूंगी। आज कब्रिस्तान की बात करनी है।
हुआ यूँ ,रास्ते में मुझे एक कब्रिस्तान दिखा। सुन्दर -सुन्दर फूल लगे थे उसमे। सड़क से बिल्कूल सटे। चलती गाडी से ही एक दो फोटो लेकर ,मैं कुछ सोचने लगी। सोच रही थी कि ,यहाँ अबतक की अंतिम यात्रा नही देखी। कैसी होती होगी ?क्या -क्या होता होगा ? फिल्मों में तो कई बार देखा है ,पर कभी किसी क्रिस्चन के फ्यूनरल को सच में नहीं देखा। 
हाँ एक बार डेज़ी से बातचीत में मालूम हुआ था कि ,ईसाई लोग दफ़ना ज्यादा पसंद करते हैं। लेकिन लोग अब खर्च और जगह की कमी को ध्यान में रखते हुए दाहसंस्कार भी कराने लगे हैं। पर जो रूढ़िवादी ईसाई हैं वो आज भी दफनाना ही पसंद करते है। 
विषय से ना भटकते हुए तपस्या कब्रिस्तान देखने और सोचने पर आओ। हाँ फिर बहुत कुछ सोच रही थी जो बाद में बताऊँगी। अभी हुआ यूँ कि ,खूबसूरत वन वे रोड से निकल कर हमलोग हाईवे पर आ गए। स्पीड लिमिट 50 की थी ,पर गाड़ियाँ रेंग रही थी। ऐसा भी नहीं था कि ,ट्रैफिक हो या कोई एक्सीडेंट दिख रहा हो जीपीस में। वही दूसरे लेन में कोई गाडी ही नहीं जा रही थी। मैं और शतेश हँस रहे थे कि हुआ क्या है ? लोग इतनी कम स्पीड में क्यों जा रहें ? दूसरी लेन में कोई जा क्यों नहीं रहा ? शतेश बोले ऐसे रेंगने से अच्छा दूसरी लेन में चल लेते है। फिर पता नहीं मुझे क्या सुझा मैंने कहा रहने दो। लोग इतने बेवकूफ तो नहीं  शायद आगे रोड बंद हो। काफी जगह रोड का काम भी चल रहा था। खैर हमलोग भी उसी लेन में रेंगते रहे। कुछ 20 मिनट आगे जाने के बाद एक मोड़ था ,जहाँ एक आदमी काले कोट में एक तख्ती लिए खड़ा था -फ्यूनरल ट्रैफिक। भगवान् कसम मैं थोड़ी शॉक्ड रह गई। ये क्या अभी यही सोच रही थी कि ,किसी की अंतिम यात्रा नहीं देखी यहाँ और ये देखो।
जो दूसरा लेन ख़ाली था ,उसपर आगे लाइन से गाड़ियाँ जा रही थीं। सबके ऊपर एक छोटा सा झंडा लगा था ,जिसपर फ्यूनरल लिखा था। मैं और शतेश उन गाड़ियों को देख बात करने लगे कि ,कितना शांत और सम्मान के साथ अंतिम यात्रा चली जा रही है। हमारी लेन की गाड़ियाँ मोड़ के  बाद तेज हो चुकीं थी। फिर कुछ 25 /30 गाड़ियों के बाद हमें एक बड़ी सी गाडी में कॉफिन (शव का बॉक्स ) धुँधला सा दिखा। उसके आगे कुछ गाड़ियाँ बेहद धीरे चल रहीं थी। मैंने शव को प्रणाम किया ,मुक्ति की प्रार्थना की और फिर सोच में डूब गई। शतेश भी चुप थे। शायद वो भी कुछ सोच रहे हों। 
*अब जो कुल मिला कर मेरी सोच थी वो ये रही -मुझे डेज़ी की बातें याद आ रही थी कि -कैसे क्या होता है ।यहाँ अंतिम यात्रा के लिए ज़्यादातर लोग पहले ही अपने लिए किसी फ्यूनरल होम से बात करके प्लॉट बुक कर लेते हैं ।अपनी अंतिम इक्षा की गति अपने घरवालों या किसी पेज पर लिख कर रखे रहते है कि ,उन्हें जलना है या दफनाना ।जो ऐसा नहीं कर पातें उनके परिवारजन या मित्र अपने हिसाब से जो ठीक लगे कर देतें हैं ।यहाँ कब्रिस्तान भी दो होतें हैं -एक ग्रेवयार्ड (जो चर्च के अधीन होता है या चर्च का हिस्सा होता है )दूसरा समेटरिज (ये प्राइवेट प्रॉपर्टी होती है )
ग्रेवयार्ड के भरने के बाद समेटरीज बनाई गई ।डेज़ी के अनुसार यहां भी प्रार्थना उसके बाद भोज होता है ।सब दो या तीन दिन में निपट जाता है ।ये परिवार और मरने वाले की ईक्षा के अनुसार होता है ।
पता नहीं आज मैं ये सब क्यों आपसब तक पहुंचा रही हूँ ।बस मुझे लगा जैसे मेरी जानने की ईक्षा थी शायद औरों को भी हो ।
नोट :- लोग यहां कब्रिस्तान भी घूमने जाते हैं ।कई फेमस कब्रिस्तान ने जाने की फी भी लगती है ,गाइड भी होते हैं ।अभी हैलोवीन आने वाला है तो यहाँ कुछ प्रोग्राम भी होते हैं । मेरा भी बड़ा मन था ,लूसियाना का सेंट लुइस सिमेट्री और विर्जिना का अर्लिंग्टन नेशनल सिमेट्री (सिविल वॉर के सैनिकों के साथ जॉन एफ कैन्डी का भी शव दफन है )देखे का ।गई दोनों जगह पर लूसियाना में उस दिन बारिश हो गई ।वर्जिनिया वाले का टिकट एक आदमी 49 डॉलर। मतलब दोनों का लगभग 100 डॉलर। शतेश मेरा मज़ाक उड़ाते हुए बोले की -श्मशान देखने में समय और इतने पैसा तपस्या ही बर्बाद करने का सोच सकती है। मैंने भी जोक को सीरियसली लिया और जाने से मना कर दिया। खैर अब नहीं देखा तो नहीं देखा। देखिये गूगल से ली हुई तस्वीर। 
पहली लुसियाना की :- जहाँ कब्र मिट्टी के ऊपर घर जैसे बने है।दूसरी सिविल वॉर के सैनिकों की।
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