Friday, 17 May 2019

नीला फूल !!!

मनलहरी लिखने के दौरान कई प्रयोग किया मैंने। ये प्रयोग मेरे धीरज का था, ये प्रयोग मेरे कल्पनाओं के साथ था और ये प्रयोग मेरे चित्रकारी के साथ था। मैं वैसे कोई चित्रकार नही बस आड़ी-टेढ़ी रेखाएँ खींच लेती हूँ अपने आस-पास। कुछ इस तरह की की इनसे घिर कर मुझे क़ैद नही एक एकांत महसूस होता है। जहाँ सिर्फ़ होती है तपस्या दोंनो अर्थों में। एकांत की ये रेखाएँ मुझ मे प्रवाह करती हुई मेरे मस्तिक की कोशिकाएँ बन जातीं हैं फिर वे मुझे एक नए संसार का दर्शन करा लाती हैं जिनके दर्शन मात्र से हीं इस एकांत से प्रेम हो जाता है। एक हल्की हँसी आकर कब होंठों पर बिखर जाती है, ये तबतक मालूम नही होता जबतक होंठों के दोंनो किनारों पर खिंचाव महसूस ना कर बैठूँ।

ऐसे में इन मन की लहरों के साथ मैंने कुछ तस्वीरें बनाई थी किताब के कवर पेज के लिए। हालाँकि जो तस्वीरें बनी वो बस मुझ तक ही रह गई। किताब पर कुछ और ही चढ़ना लिखा था। आज यूँ ही जब इन तस्वीरों को देखा,  तो याद आई कितनी मुस्कुराहटे बिखरीं थी मेरी होंठों पर इनकी कल्पना कर के।

तस्वीर की व्याख्या तस्वीर देखने वाले आँखो से उसकी आत्मा करवाती है। भाव के अनुरूप तस्वीर अपना भाव बदलती है। तुलसी दास जी ने कहा है ना,” जाकी रही भावना जैसी, प्रभु मूरत देखी तिन तैसी।”

डोर सी खिले दो नीले फूल, मानो एकांत में अपनी प्रेम जड़े जमा रहे हो। एक रंग में रंगे,  एक दूसरे की आस में हवा में अपनी ख़ुश्बू बिखेरें चुपचाप कितनी बातें किए जा रहें हो। ऐसे में एक दिन हवा का तेज़ झोंका आता है और नीला फूल बिखर जाने से पहले अपना मौन तोड़ता है;

कई बार यूँ भी देखा है
ये जो मन की सीमा रेखा है
मन तोड़ने लगता है
अनजानी प्यास के पीछे
अनजानी आस के पीछे
मन दौड़ने लगता है 


और जिस तरह विद्या सिन्हा की नीली साड़ी जैसे हवा के झोंकें से उन हाँथों पर पड़ती है उसी उम्मीद में वो अनुरोध कर बैठता है;
एक बार तुम भी इसी हवा के झोंकों के नाम, मेरे हृदय  पर अपना सर रख दो। मेरी डोर टूट कर धरती का आलिंगन करें इससे पहले क्या एकांत प्रेम के अनुरोध को तुम समझ पाओगी? 
प्रेम में सब कह जाना मेरी बस का नही। आख़िर हूँ मैं एक नीला कमज़ोर फूल जो बस जनता है एकांत मौन प्रेम.....

Thursday, 16 May 2019

बत्ती गुम !!!

बंद शीशे के घर में रहने के इतने सालों बाद भी , आदत नही हुई बारिश में बेफ़िक्र रहने की। जब भी बारिश होती है ऐसा लगता है कि कुछ भींग तो नही रहा? कपड़े उड़ ना गए हो आँधी में,या फिर अब तो बिजली जाएगी ही जैसी बातें। ऐसा कुछ होता तो नही पर मन एक बार घर या दिल्ली घुम ज़रूर आता।

 बिजली देवी  की असीम कृपा से आज एक चिंता पुरी हुई,”बिजली जाने” की। और पुरी भी ऐसी की चाय तक नदारद। मन भनभना उठा, भाक साला इससे अच्छा तो दिल्ली ही था कम से कम चाय तो मिल जाता था। झमाझम बारिश के बीच मैंने दूध में में जैसे पत्ती डाली थी बिजली भूकभूकाई। उसकी भूकभूकी को नज़रअन्दाज़ कर मैंने अदरख और चीनी दूध में डाल, बारिश का वीडीयो बनाने बालकनी में पहुँची। इधर मैं बाहर उधर बिजली भी घर से बाहर। चाय बेचारा उफ़नते-उफ़नते रह गया।

शतेश बाबू का भी आगमन हो चुका था। अब बिना चाय के, बिना संगीत के और बिना वाक् के क्या हो तो हम गीतों की कड़ी अंताक्षरी खेलने लगे। सालों बाद हम दोंनो अंताक्षरी खेल रहे थे। आलम ये कि मैंने सारे चालू गाने गा डाले और शतेश एक से एक गीत चुन रहें थे। मुझे अच्छे गीत याद हीं नही आ रहें थे। पर गेम तो गेम है जैसे खेलो....

 शतेश पर मैं दबाव बनाए हुए थी। प्रेसर में लड़के को अच्छा करने की आदत है। हर बार बच जातें फिर “ह” “ल” और “स” ने इतना पानी-पानी किया कि एक-दो बार तो लगा मैं भी फँस गई पर धन्यवाद हो पवन गवैया का और हमारी बड़ज़ोरी की ल से “लगावेलू तू लिपिसटिक “ शतेश को मानना पड़ा।
लगभग 45मिनट से एक घंटे के खेल में शतेश राम “स” से फँस कर हार बैठे। उनके हारने के बाद मैंने जीत का गाना गया,” शादी करके  फँस गया अच्छा ख़ासा था कुँवारा”

खेल ख़त्म पर बिजली रानी अब भी नदारद थीं। बारिश बंद हो चुकी थी तो हम वाक् को निकल पड़े। यहाँ अंधेरा अब लगभग साढ़े आठ- नव बजे के आस-पास होता है। वापस आने के बाद भी कहीं कोई चमक नही। अलबत्ता आज मालूम हुआ कि हमारे अग़ल -बग़ल कौन -कौन रहता है। जैसे बारिश में बिल में पानी भर जाने से सारे जानवर इधर-उधर पसरे होते ठीक वहीं आलम था आज हम जीवों का।

तीन घंटा से ऊपर हो गया बिजली माई का कोई पता नही। अब ये नही तो गैस बंद, गैस बंद तो खाना बंद। ऐसे में  हम पहुँचे पिज़्ज़ा के ढाबा। बिजली के ना होने से ट्राफ़िक लाईट भी करिया बक्सा जैसा झुल रहीं थी। अच्छा हुआ बड़ा ज्ञान देतीं रहती है, हरिहर -लाल होती हैं बात-बात पर। आज सब अपनी मर्ज़ी से सामने वाले का मिज़ाज भाँप कर गाड़ी बढ़ा रहें थे। नियम वहीं जो पहले आया पहले जाएगा।
पिज़्ज़ा  रेडी था,  लिया और घर आ कर कैंडिल लाईट डिनर हुआ।
हाय रे कैंडिल लाईट डिनर ! लाईका के हंगामा और ठंडाते पिज़्ज़ा को जैसे -तैसे ग्रहण किया।
वैसे बिजली  जाने का भी अपना ही सुख है। कभी -कभी इसे जाना चाहिए......
चलिए कुछ तस्वीरें



Monday, 13 May 2019

बिरहा गायक हीरालाल यादव जी!!!

पद्मश्री हीरालाल यादव जी की निधन की ख़बर सुनकर मन भ्रमित सा हुआ। भ्रमित होने का कारण उनकी मृत्यु नही है। मृत्यु तो जीवन का सत्य है इससे कैसा भ्रम।
फिर भी भ्रम की स्थिति इसलिए पैदा हुई कि, अरे इतनी जल्दी। पिछले बुधवार को हीं तो मैंने पहली बार इनका गया बिरहा सुना। 

हुआ यूँ कि, हमेशा की तरह खाना पकाते समय मैं गाने बजा रही थी। मेरा मन उस दिन भजन का था तो भजन वाली प्लेलिस्ट लगा ली। जसराज जी के बाद, किशोरी अमोनकर फिर छन्नूलाल लाल मिश्रा और फिर ओसमान मीर के  “ कैलाश के निवासी” के साथ मेरा घर भक्तिमय रस से भर रहा था। सत्यार्थ को उलझाने में उलझे शतेश का ध्यान ओसमान मीर के भजन पर गया। मेरे पास आए और पुछे ये कौन गा रहा है, बड़ा अच्छा गा रहा है। गाँव पर जो बिरहा होता था उसकी याद आ गई।

मैंने उन्हें इनके बारे में बताया और साथ हीं कहा कि इन्होंने रामलीला फ़िल्म भी गाना गया है। “मोरारी बापू” के प्रोग्राम में भी भजन गातें है। शतेश ने सिर्फ़ मोरारी बापू का नाम सुना है, कभी उनका रामायण पाठ या भजन नही सुना तो अच्छा कह कर मेरे सवाल का जबाब देने लगे। मैंने पुछा था, बिरहा के जैसा कैसे गा रहें हैं? लय ताल तो अलग से हैं इनके।

वो बोले; बिरहा में भी फ़िल्मी धुनो पर भजन या कोई प्रसंग गया जाता है। मैंने कभी ऐसे ठीक से बिरहा नही सुनी थी। चलते- फिरते कहीं बजते हुए सुन लिया। ऐसे में कैलाश के निवासी पुरा होते हीं मैं बिरहा की खोज में लग गई। खोजने कि वजह ये हुई की, शतेश को किसी बिरहा गायक का नाम हीं याद नही आ रहा था अभी।

ऐसे में मुझे हीरालाल जी मिले। मैंने उस दिन इनके द्वारा गाया, शंकर जी की लीला और जौनपुर कांड सुना। अच्छा लगा मुझे सोचा,  किसी दिन इनके बारे में और जानकारी इक्कठा कर इनके बिरहा और ओसमान मीर के भजन को मिला कर लिखूँगी और संयोग देखें आज इनके नही रहने की ख़बर मिली। 

महामाया ने क्या जाल रची मुझे इनतक पहुँचाने की। उम्र के इस पड़ाव पर बीमार, बुढ़ा गायक अस्पताल के बेड पर पड़ा क्या सोचता होगा?
शायद यहीं की उसकी आवाज़ हर एक संगीतप्रेमी तक पहुचें। 
हीरालाल जी आपको सादर नमन। 

Tuesday, 7 May 2019

अक्षय तृत्या !!!!

अक्षय तृत्या बीत जाए इससे पहले मैं आप सबको ले चलती हूँ क़िस्सों की दुनियाँ में। तो हमेशा की तरह बरहम बाबा और दुआरा पर की माई के साथ हनुमान जी की जय बोलें और पंक्ति में बैथ जाएँ।
वैसे तो इससे जुड़ी मैंने दो-चार कहानियाँ सुन रखी है पर आज परशुराम जी और बाँके बिहारी जी के क़िस्से से जुड़ी याद बताती हूँ।

ऐसा माना जाता है कि अक्षय तृत्या के दिन ही परशुराम जी का जन्म हुआ। जिन्हें ज़्यादा जानकारी नही और नाम में राम से तुक्का लगा रहें है तो बिलकुल सही जा रहें है। ये भगवान विष्णु के हीं छठे अवतार हैं। इनके बाद राम आए। यानी राम सातवें अवतार हुए। तो क्या राम नाम इनसे लिया गया है, जैसे मेरे पड़ोस के लोग सुनासुनी नाम रख लिया करतें थे।  जैसे मेरे पड़ोस में भाई के नाम को कई लोगों ने आगे बढ़ाया पर मेरा तो बस पुछे मत। लोग ठीक से तपस्या कह लेते वहीं बहुत था मेरे लिए।

फिर विषयान्तर हुआ। ये मेरी भटकने की आदत भी ना। ख़ैर मुद्दे की बात ये रही कि राम का नाम, परशुराम से लिया गया या ओरिजनल था मुझे इसकी कोई जानकारी नही। हाँ परशुराम का जन्म तो हो गया पर इनसे जुड़ी कथाओं में सबसे मनोरंजक जो मुझे लगी वो ये है,

परशुराम मुनि जमदग्नि और रेणुका के चौथे बेटे थे। एक दिन रेणुका पूजा के लिए जल लेने नदी के किनारे गई। वहाँ उसने गंधर्वराज चित्ररथ को अप्सराओं के साथ नदी तट पर विहार करते देखा। गंधर्वराज और अप्सराओं की क्रीणा देखने में वह इतनी खो गईं कि पूजा के लिए समय पर जल लेकर नहीं पहुँच पाई। मुनि डेर हों जाने पर अपनी दिव्यादृष्टि चलाई और सीसी टीवी पर सब फूटेंज आ गया। क्रोधित हो गये मुनि राज। किसी को भी क्रोध आएगा। मैं यहाँ पूजा पर बैठा हूँ और धर्मपत्नी वहाँ रास-रंग देख रही है। ऐसे में क्रोधित मुनि ने  अपने बेटों को माँ का सिर लाने को कहा। सबने पिता को मना कर दिया परन्तु परशुराम ने अपने फरसे से माँ का काम तमाम कर दिया। वहीं फरसा जो शिव जी ने इन्हें गिफ़्ट किया था। बाद बाक़ी शिव जी ग़ुस्साए भी इनपर कि मेरे गिफ़्ट से ये सब काम बरदस्त नही होगा मुझे।

इधर मुनि अपने दूसरे बेटों को आज्ञा ना मानने के एवज़ में मौत की सज़ा दे चुकें थे पर परशुराम पर बहुत ख़ुश थे। उन्हें वर माँगने को कहा। परशुराम भले ही क्रोधित व्यक्ति रहे हो पर कहते है ना जो खिसियाता है उसके मन मे छल नही होता तो बात सही हुई। परशुराम ने आपनी माता और भाईयों को जीवित होने का वरदान माँगा। साथ ही ये  भी माँगा कि इन्हें ये सब बातें याद ना रहें।

दूसरा क़िस्सा:- आज के दिन बाँके बिहारी के दर्शन की पूजा की भी मान्यता है। अब आपको तो मालूम होगा हीं बाँके बिहारी, कृष्ण का हीं दूसरा नाम है। पर इस नाम ने मुझे बचपन में बहुत कनफ़्यूज किया था। मैंने बिना किसी से पुछे ,जाने ये मान बैठी थी कि कृष्णा का कोई दूसरा रूप बाँके बिहारी हैं , जो मथुरा की जगह बिहार में जन्मे हैं। जैसे अपनी सीता माइयाँ। 

काफ़ी बाद में मुझे “अमीन चाचा “ जो माँ के सहकर्मी और मेरे धार्मिक या फिर क़िस्से कहानियों के गुरु रहे। उन्होंने मुझे सही जानकारी दी। उन्होंने ने हीं मुझे परशुराम जी वाली कथा भी सुनाई थी। 
अच्छा उनकी आदत थी कोई क़िस्सा सुनाने से पहले टेस्ट लेते की उसके बारे में मालूम है या नही? अगर है तो कितनी? 

ऐसे में एक गरमी की शाम वो मुझसे पुछ बैठे, अच्छा प्रियंका( मेरे दादा-दादी द्वारा दिया नाम) ये बताओ कृष्ण को बाँके बिहारी क्यों कहते हैं? 
मैंने जैसा ऊपर लिखा है वैसा ही जबाब उन्हें दिया और फिर उनकी हँसी छूट गई। बोले भक बुडबक किसने कहा तुमसे .....
और फिर आज इतना ही बोलिए बाँके बिहारी की जय। आपको मालूम हैं तो बताइए क्यों कहते है कृष्ण को “बाँके बिहारी”

Thursday, 2 May 2019

मालिनी रजुरकर !!!

मालिनी रजुरकर जी की गायकी से मेरा परिचय पहली दफ़ा भाई ने करवाया था। उसके बाद तो ऐसा हुआ कि,शायद ही किसी रोज मैंने इन्हें ना सुना हो उन दिनो। इस बीच मैं माइग्रेन से पीड़ित रहने लगी। दिल्ली में कई अस्पताल के चक्कर लगाए। इनमे प्राइवेट अस्पताल से लेकर एम्स और गंगाराम तक शामिल थे। सबको लगता था एसिडीटी और आँख के पवार में कुछ झोल है। मेरी परेशानी से दुःखी भाई ने कहा, बहिन सुन ; राग केदार, राग सोहनी या भैरवी सुनने से भी सिरदर्द में काफ़ी आराम मिलता है। सुना करो, कुछ आराम मिले। फिर शादी हुई। यहाँ आई। आकर रोग के बारे में सही जानकारी मिली तब तक मैं हर सिर दर्द में केदार और सोहनी की आदी हो गई थी।

इनमे जो मुझे सबसे प्रिय लगता वो मुकुल शिवपुत्र और महिलाओं मे मालिनी जी हीं थीं। अब हालत ऐसी कि बिना सिर दर्द के भी कभी मैं मैं इनको सुनती तो शतेश पुछने लगते “तबियत तो ठीक है तपस्या” आज भी शतेश इन रागों को सुनकर एक बार मेरी तबियत का ज़रूर पुछ लेते हैं।

मज़े की बात तो ये है कि इनमे से किसी -किसी के बोल भी इन्हें याद हो गए है और मुझे कभी रिझाने के लिए इनका प्रयोग भी करते है। ऐसे में मैं भी कहाँ पीछे रहने वाली, मालिनी जी द्वारा हीं गया,” ऐसा तो मोरा साइयाँ निपट अनाड़ी भए” दे मारती हूँ। ख़ैर मेरी और शतेश की बात तो चलती हीं रहती है। आज मालिनी जी की बात करती हूँ।

राजस्थान में जन्मी मालिनी जी ग्वालियर घराना की गायकी करतीं है। हालाँकि इन्होंने अपने को घराने में बाँध कर नही रखा। ये सिखती रही ,प्रयोग करतीं रही। गणित की शिक्षिका होने की वजह से शायद इन्हें गायकी में भी 100 मे 100की आदत रही। पर इससे दुखद क्या हो सकता है कि ऐसे विदुषी को सिर्फ़ संगीत नाटक अकादमी अवार्ड तक समेट दिया गया। क्यों इनका स्थान पद्दम अवार्ड्स में नही आता? क्या ईमानदारी से अपनी कला को प्रस्तुत करने का नतीजा यहीं होता है?
या फिर किसी भी अवार्ड के लिए योग्यता के साथ थोड़ी चमक-धमक होनी हीं चाहिए? या कुछ अवार्ड जीते जी सुख नही दे सकतें?
हो सकता है मालिनी जी को इनसबसे इतना फ़र्क़ ना पड़ता हो तभी तो उन्होंने ऐसी शांतप्रिय -संगीतमय जीवनशैली चुनी हो पर फिर भी संगीत और कला के सम्मान में क्या भारत अपनी बेटी को इतना नही दे सकता? ख़ास कर उन बेटियों को जो कठीन परिस्थि में भी उठी और आगे बढ़ी। एक ऐसी शैली को जीवित रखना जो शायद गुमनाम हो रहा हो ये भी तो कम बड़ी उपलब्धि नही आज के समय मे।



Monday, 29 April 2019

पिक्चर रॉक मिशिगन!!!!!

आज की यात्रा “पिक्चर रॉक” मिशिगन की। अमेरिका -कनाडा बोर्डर के नज़दीक, अपर पेनिनसुला में स्थित ये सुंदर पहाड़ आपको कल्पनाओं की दुनियाँ में ले जाएँगे। ख़ूबसूरती ऐसी की लेक सूपेरीयर भी इसके आगे फीका लगा मुझे। वैसे ये पहाड़ इसी लेक के किनारे हीं स्थित है। लेक सूपेरीयर विश्व का सबसे लंबा फ़्रेश वाटर लेक है, साथ ही ये अपनी गहराई के लिए भी प्रसिद्ध है।

पिक्चर रॉक को देखने के लिए आपको या तो बोट या फिर कायाक का सहारा लेना होगा। कायाकिंग आप तभी करें जब आप किसी ग्रूप के साथ हों या फिर आपके साथ एक्सपर्ट हों, ऐसा यहाँ लिखा गया है। वैसे तो यहाँ आप पुरे साल जा सकतें हैं, पर ठंड में झील के जम जाने से बोट टूर वैगरा बंद हो जाती है।

यहाँ जाने के लिए बोट, आप “पिक्चर रॉक लेक सोर “ के पास से लें सकतें है। दो-तीन हीं क्रूज चलतीं हैं और वो भी सिर्फ़ तीन राउंड। सुबह11बजे ,2बजे और शाम के 5 बजे आख़री क्रूज। पुरा टूर ढाई से तीन घंटे का होता है। अगर आपके साथ बच्चें हैं तो कुछ खाने-पीने का समान साथ रख लें। साथ ही एक पतला जैकेट या स्वेटर, कारण बीच-बीच में ठंडी हवाएँ चलनी लगतीं है। बोट पर आपको सिर्फ़ पानी और कोक ही मिलेगा वो भी ख़रीदना होगा।

हमने सुबह 11बजे का क्रूज लिया था। क्रूज के लिए भी आपको थोड़ा पहले जाना होगा नही तो टिकेट बिक जाती हैं। ओनलाइन टिकेट बुकिंग का साधन नही है। हमने तो फ़ोन करके टिकेट बूक किया था। टिकेट की क़ीमत पर पर्सन 38डोलर और दो साल तक के बच्चे का एक डोलर।

इस रॉक की ख़ासियत ये है कि, ये आपको एक पेंटिंग सी दिखती है। कई सारे मिनरलस जैसे लोहा ,कौपर, मैग्निज, लिमोनाइट की वजह से इनका रंग लाल, नारंगी, भूरा, काला और सफ़ेद का मिश्रण है।आपको गाइड बताते जाता है कि, ये इस आकृति का पहाड़ है ये उस आकृति का पर मैं तो जाने क्या -क्या कल्पना कर रहीं थी। मुझे तो जाने क्या-क्या दिख रहा था।

इसकी दूसरी तरफ़ एक 1868ई का बना लाईट हाउस है जो हरिकेन में टूट गया था पर फिर से इसकी मरम्मत हुई।साथ ही लेक के किनारे को ही कहीं -कही बीच का रूप दे दिया गया है। ट्रेल और ट्रैकिंग भी कई लोग कर रहें थे।

इस ट्रिप पर भी हमने एक जोड़े को शादी करते देखा। पहाड़ की चोटी पर शादी करते जोड़े को देख गाइड ने मज़ाक़ में कहा भी कि, यहाँ कई लोग शादी के लिए आतें है ताकी उनकी शादी इस पहाड़ सी मज़बूत और सुंदर बनी रहे पर पहाड़ भी तो नेचुरल कौज से टूटते हीं रहते हैं।

Wednesday, 24 April 2019

इंटरव्यू!!!

आजकल इंटरव्यू बहुत चल रहें है। कोई आम खाते-खाते खेतों में पहुँच जाता है तो कोई चाय के साथ धान की बात करता है। वैसे आम मुझे बहुत पसंद है पर धान वाली बात ज़्यादा दिल तक पहुँची। कारण बस ये है कि, धान की बात करने वाला मानो मेरे आस-पास की बात कर रहा हो। उसकी कई बातें मेरी जुड़ी यादें हों जैसे। बस एक हीं चीज़ खटकी इस इंटरव्यू की वो ये कि, जो इंटरव्यू ले रहें थे, बीच में ऐसे हीं उठ खड़े होते है। हो सकता हो ये इंटरव्यू को सहज बनाने का तरीक़ा हो पर मुझे कुछ ख़ास पसंद नही आया।

इंटरव्यू देने वाला मेरे गाँव-जावर के पास का हीं है। अपने गाँव के बारे में जो भी बातें वो बता रहा था, वो भले पुरानी हो पर अब भी बहुत कुछ ज़्यादा नही बदला। बगहा अनुमंडल के बेलवा गाँव का एक लड़का जो अपनी मेहनत से देश-दुनियाँ में नाम कमा रहा है। उसने सच हीं कहा कि उसके गाँव की धरती सोना है। धान छिड़क देने पर भी उग आतीं है। मैं ख़ुद इसकी गवाह हूँ,  गौनाहा थाना के सहोदर माता के मंदिर जाते समय। फ़रवरी तक जहाँ हर जगह धान की कटाई कब की हो चुकी होती है, यहाँ धान के नहें पौधे लहलहा रहें थे।

उसने कहा कि उसके घर के पास से हिमालय दिखता है। मेरे भी घरवाले कहते हैं कि मेरे घर की छत से भी बारिश के बाद हिमालय दिखता है। एक दो बार मैंने भी देखने की कोशिश की पर मुझे नही दिखा। शायद ना मौसम की मर्ज़ी थी ना हिमालय की।

इंटरव्यू की एक और बात जो मुझे ख़ुद से जुड़ी हुई लगी वो ये कि,  पिछले साल हीं मैंने योगिनंदा जी और लहरी महराज के बारे में पढ़ा । मैं चकित थी कि, ऐसा हो सकता है क्या, जैसा की योगी की आत्मकथा में लिखा है। फिर और ढूँढना शुरू किया, कुछ और पढ़ा पर ज़्यादा कुछ मिला नही किताब से इतर। अंत में यहीं मालूम हुआ की,

-एक  क्रिया योगी अपनी जीवन उर्जा को मानसिक रूप से नियंत्रित कर सकता है। आधे मिनट का क्रिया योग एक वर्ष के प्राकृतिक आध्यात्मिक विकास के एक वर्ष के बराबर होता है।

-क्रिया योग ईश्वर-बोध, यथार्थ-ज्ञान एवं आत्म-साक्षात्कार प्राप्त करने की एक वैज्ञानिक प्रणाली है।

-क्रिया साधना को ऐसा माना जा सकता है कि जैसे यह “आत्मा में रहने की पद्धति” की साधना है”।

-लाहिरी महाशय ने योगानन्द को कहा कि, “यह क्रिया योग जिसे मैं इस उन्नीसवीं सदी में तुम्हारे जरिए इस दुनिया को दे रहा हूं, यह उसी विज्ञान का पुनः प्रवर्तन है जो भगवान कृष्ण ने सदियों पहले अर्जुन को दिया; और बाद में यह पतंजलि और ईसा मसीह, सेंट जॉन, सेंट पॉल और अन्य शिष्यों को ज्ञात हुआ।” 

पीएस:- इंटरव्यू में वो सब दिखा जो एक इंसान की यात्रा हो सकती है। कोई अपनी जड़ें इतनी आसानी से नही भुलता। उम्र का एक ऐसा दौर आता है जब इंसान जीवन-मृत्यु की खोज में ,अध्यात्म की खोज में लग जाता है।
ख़ैर पुरी इंटरव्यू मैंने मनोज वाजपई की हाथों को देख कर निकाल दी:)