Tuesday, 12 April 2022

लव इन द टाइम ऑफ़ कॉलरा !!!

एक किताब जिसे सालों पहले पढ़ी तो असमंजस में रही कि यह कैसा नायक है? यह कैसा प्रेम है?  कैसी कहानी है यह…यह तो देह के ज़रिए देह को संतुष्टि करने वाली बात है। यहाँ मन की तो बात ही नही। 

उस वक्त किताब के कुछ हिस्से ठीक नही लगे थे। ऐसे में उन दिनों किताब पर जो राय दी थी, उसमें नायक के प्रति रोष ज़्यादा था। प्रेम और दया कम महसूस हुई थी। इन दिनों मेमोरी में इसे देख फिर से इसके कुछ पन्ने पलटने का मन हुआ। 

किताब है, “लव इन द टाइम ऑफ कॉलरा”

इस किताब का नायक शारीरिक रूप से कुरूप और स्टोकर लगता है। उसके जीवन में प्यार कुछ ऐसे आता है कि बस वह प्रेम ही हो जाता है। वह पूरी तरह प्रेम में डूबा होता है कि एक दिन जबाब पाता है, “उसकी प्रेमिका के मन में अब उसके लिए प्रेम नही बचा।” उसकी हालत कॉलरा के मरीज़ों जैसी हो जाती और फिर शुरू होता है इंतज़ार का एक अजीब तरीक़ा। 

अपने लम्बे जीवन काल में वह 622 औरतों से सम्बंध बनता है। कई वन नाइट स्टैंड होते फिर भी उसके मन को सुकून नही मिलता। नायक के अनुसार यह देह को देह की ज़रूरत भर है। उसके मन का सम्बंध तो सिर्फ़ नायिका तक ही सिमटा है…वह अब भी उसके इंतज़ार में है। प्रेम में इंतज़ार ही प्रेमी का प्रेम है। 

ख़ैर, सालों पहले भी मुझे इंतज़ार का यह तरीक़ा ना रुचा, ना अब। हाँ, इस बार यह ज़रूर हुआ कि मैं नायक से उस क़दर रोष नही कर पाई जैसी पहली बार हुआ था। शायद इस तरह के प्रेम को समझने की अब भी बुद्धि विकसित नही हुई या फिर इस किताब को एक बार फिर उम्र के किसी और पड़ाव में पढ़ना होगा। 

किसी के इंतज़ार में इतना सिमट जाना कि देह, रोग और प्रेम में अंतर ही ना हो…क्या ऐसा इंतज़ार हो सकता है भला? क्या इतना इंतज़ार हो सकता है? क्या तब तक प्रेम बचा रह सकता है? क्या इंतज़ार प्रेम को धीरे-धीरे मार नही देता? 

प्रेम को समझना आसान को जटिल बनाना है। 

इस बार इसे पढ़ते हुए कई बार लगा कि लिखते वक्त लेखक ने इस उपन्यास में देह को प्रेम से अलग रखा है। तभी तो अविवाहित नायक सैकड़ों स्त्रियों से सम्बंध बनाने के बावजूद जीवन के 91वें वर्ष में जब नायिका से मिलता है तो खुद को वर्जिन कहता है। किताब पढ़ते हुए आप पाएँगे कि इन तमाम संबंधो के बीच भी नायक का  मन हमेशा नायिका के लिए व्याकुल-एकनिष्ट रहा है। 

इंतज़ार के इन पलों को काटने के लिए उसका तरीक़ा निर्मम और दैहिक ज़रूर रहा पर इन्हें पढ़ते वक्त मुझे, “अहमद फ़राज़” अचानक  याद आए। वाक़या है, नायक ने पहली बार नायिका के “हाँ” कहने पर गुलाब की सैंकड़ों पंखुड़ियाँ खा ली थी। कहीं वहीं गुलाब विरह के दिनों में उसके शरीर रूपी किताब में सुख तो नही रहें थे…उसके सूखे नुकीले छोटे-छोटे काँटे जब-तब उसे चुभते रहते… उन पंखुड़ियों की लालिमा उसके खून के साथ हृदय तक दौड़ रही होंगी… मन में उम्मीद की सुगंध बिखेर रही होगी…51 वर्ष, 9 महीने और चार दिन के एकतरफ़ा प्रेम में गुलाब, पंखुड़ी दर पंखुड़ी अलग होती गई होगी कि, वह आएगी या नही…उम्र की आख़िरी पड़ाव और आख़िरी पंखुड़ी पर अटका मन, अहमद फ़राज़ से कह उठा होगा- तुम तो शायर हो फ़राज़,  तुम्हीं लिख दो ना मेरे इंतज़ार के ये साल मेरे महबूब के नाम…कि उम्र के 91वें बरस, अब ना मिले तो शायद ख़्वाबों में मिलें…उसके प्रेम में खाए फूल मेरी कब्र की किताब पर मिले…कि,

अब के हम बिछड़े तो शायद कभी ख़्वाबों में मिलें 
जिस तरह सूखे हुए फूल किताबों में मिलें

ढूँढ उजड़े हुए लोगों में वफ़ा के मोती 
ये ख़ज़ाने तुझे मुमकिन है ख़राबों में मिलें 

तू ख़ुदा है न मेरा इश्क़ फ़रिश्तों जैसा 
दोनों इंसाँ हैं तो क्यों इतने हिजाबों  में मिले

और यह आख़िरी शेर तो जैसे फ़राज़ ने इनके अंतिम भेंट के लिए ही लिखी है कि, जब दो वृद्ध जवानी की उन्माद से इतर, झूर्रियों और झूलते-लटकते हाड़-मास के साथ आलिंगनवध थे…नदी, नाव और एक दूसरे में सिमटे दो लोग अपने पुराने दिनों को याद करते है…निर्वस्त्र नायिका अपने देह को ढाँपते हुए कहती है-  मुझे मत देखो, अपनी आँखें बंद कर लो…

कभी उन्माद से भरा नायक आज संयम और धीरज के साथ कहता है- पर मेरा प्रेम ज़रा भी कम ना हुआ…

अब न वो मैं हूँ न तू है न वो माज़ी है "फ़राज़"
जैसे दो शख़्स तमन्ना के सराबों में मिलें


Wednesday, 6 April 2022

लिस्नर !!


कल मैंने फ़िल्म, “हे सिनामिका” के बारे में लिखा था। इस फ़िल्म में नायक को ज़्यादा बोलने की आदत है। पर आजकल सुनना कौन चाहता है ? जीवन के भागदौड़ में किसी के पास किसी को सुनने की फुर्सत कहाँ? अगर किसी के पास फुर्सत भी है तो वो आपकी ही सिर्फ़ क्यों सुनेगा? उसके अपनी भी तो हज़ारों बातें होंगी, हज़ारों तकलीफ़ें होंगी। वह भी उसे सुनाना चाहता होगा।

दुनिया सोशल मीडिया पर जितनी वोकल है उतनी ही आम ज़िंदगी में अकेली। देखा तो होगा ही आपने घर -घर मोबाइल, हाथ-हाथ मोबाइल। पड़ोस में क्या हो रहा है वह भी कई बार फ़ेसबुक अपडेट से मालूम होता है। 

अभी एक -डेढ़ महीने पहले बाबा जी बता रहें थे कि, “ अब घूर कहाँ कोई लगावे… सब लोग अपना-अपना घर में हीटर तापेला।”

 घूर, सर्दियों में सबसे मज़ेदार मीटिंग स्थल होता। लोग दुनिया जहान की बातें आग को घेरे करते रहते। घंटा-घंटा कब बीत जाता पता ही नही चलता। घूर और घोनसार एक समय में रियल फेसबुक था। यहाँ रिएक्शन और कमेंट तुरंत सामने मिलता। वह सब सिमट कर अब एक कोने में फ़ोन के साथ जुड़ा है। 

इस तरह के माहौल ने हर चीज़ को बाज़ारवाद  से जोड़ दिया है। ऐसे में क्या आपको मालूम है कि, सिर्फ़ सुनने के लिए भी आप पैसे दे कर किसी को हायर कर सकते हैं? 

जी हाँ, सही पढ़ा आपने। पैसे देकर कर किसी को अपनी मन की बात सुनाना।

“ लिस्नर” एक जॉब प्रोफ़ाइल है जो लोगों की मन की बात सुनते हैं। ऐसे लोग आमतौर पर मेडिकल या कोर्ट ट्रायल के लिए पहले से ही काम कर रहे हैं लेकिन आजकल के तनाव और अकेलेपन के जीवन में इनकी डिमांड अब  ज़्यादा बढ़ गई है। ये लिस्नर पर घंटे के हिसाब से सुनने का काम करते हैं। ये बस आपको सुनते रहते हैं। कोई सुझाव या ज्ञान नही देते ना ही बीच में टोक-टाक। बस कुछ ऐसा कि बोल ले भाई/बहन, कर लें अपना मन हल्का। 

तो अगर आप सहनशील है, दूसरों की बातें घंटों सुन सकते है बिना प्रभावित हुए फिर आप एक गुड लिस्नर है। ऐसे में आप चाहे तो इस क्षेत्र में भी कैरियर ऑप्शन चुन सकते हैं। लेकिन, लेकिन इसके लिए अपनी भावनायें आपको घर पर छोड़ कर जानी पड़ेगी, नही तो दूसरों की उदासी, क्रोध, बेबसी, घुटन सब आप अनजाने में खुद के भीतर भर लाएँगे। "

एक Calvin एक अच्छा श्रोता बनने के लिए एक महान व्यक्ति की आवश्यकता होती है ."

Calvin Coolidge.

के लिए एक महान व्यक्ति की आवश्यकता होती है ."

Calvin Coolidgeलिस्नर के ऊपर बनी यह शॉर्ट फ़िल्म देखिए और सोचिए आने वाले समय में हम कहाँ जा रहें है…. 




Thursday, 24 March 2022

रॉयल्टी !!!

मुझे एक लेटर आया है अमेजन की तरफ़ से। इसमें मेरी मेरी किताब, “प्यार पर सवाल नही” की इस मन्थ की रॉयल्टी और टैक्स का स्टेटमेंट छप कर आया है। इस तरह के लेटर पहले भी आ चुके है पर आज इसे शेयर करने का कारण भारत में हो रहे रॉयल्टी  विवाद है। बीते कुछ दिनों से लेखक-प्रकाशक और रॉयल्टी की बातें खूब हो रही है जिसकी आँच पहले युद्ध और अब होली में कम होती दिख रही है। वहीं कुछ दोस्तों ने मुझसे पूछा भी कि तुमने इस पर कुछ भी नही लिखा जबकि तुम्हारी खुद चार किताबें आ गई है। 

बात तो सही है कि , “मनलहरी”, “ ऐसे भी कोई करता है भला” “आह वाली यात्रा” और “प्यार पर सवाल नही” यह चार किताबें मेरी आई है। पर यह चारों ही ई- बुक है। यानि किंडल बुक है। मेरी किताबें अब तक पेपरबैक में नही आई है। या फिर किसी ऐसे साइट पर जहाँ आपको रॉयल्टी  के लिए अलग से बात करनी पड़े। 

अमेजन से अब तक का मेरा अनुभव संतोषजनक रहा है। यहाँ पर किस देश में कितने लोगों ने मेरी किताब ली, किसने कितना पन्ना पढ़ा यहाँ तक मालूम चल जाता है। फिर किताब की रॉयल्टी, किताब के दाम के हिसाब से आपको खुद तय करना पड़ता। किस महीने कितनी किताब आपकी बिकी के साथ रॉयल्टी खुद ब खुद टैक्स काट के आपके एकाउंट में आ जाती है। साथ ही मेल और लेटर भी घर पर आता है जिसमें सारी डीटेल दी होती है।

मेरी पिछली किताब को आए एक साल हो गए पर मार्च के महीने में दो लोगों ने इसे लिया तो मुझे इसका मेल आ गया। और उसी ख़ुशी में मैंने होली पर इस किताब का कुछ अंश शेयर किया कि एक साल भी लोग किताब पढ़ रहे है। वरना तो मेरी मार्केटिंग स्किल तो बहुत बुरी है। किताब लिख लेती हूँ और प्रचार के नाम पर शुरू में एक दो पोस्ट भर। 

 ख़ैर अब मुद्दे पर आए तो मुझे अभी भी ठीक -ठीक मालूम ही नही कि कौन सा प्रकाशन भारत में किस लेखक को कितनी रॉयल्टी देता है। कहीं 10% दिखता है तो कहीं 20% और यह भी क्या फ़िक्स है या प्रसिद्ध लेखकों के लिए कुछ अलग क्लॉस है। 

मुझे दो-चार सेल्फ पब्लिशिंग बुक के मैसेज भी मिले थे कि इतना अमाउंट दे कर आप बुक सेल्फ पब्लिश करा सकतीं है। पर मेरी इस बारे में कभी बात ही नही हुई तो रॉयल्टी वाली बात ही नही आई। 

आज जिन वरिष्ठ लेखक से यह बात शुरू हुई और जिन्होंने यह मुद्दा उठाया, उन दोनों के ऊपर मैं क्या लिखूँ… मैंने तो खुद , नौकर की क़मीज़, दिवार में एक खिड़की और एक कविताओं का संग्रह भाई के किताबों के संग्रह से लेकर पढ़ी है। मानव कौल कि जो दो किताबें पढ़ी वह भी मुझे फ़्री pdf मिली थी। अब ऐसे में हिंदी की किताबें कितनी बिक रही है इसका अंदाज़ा मैं ठीक -ठीक लगा नही पा रही।

हाँ,  कुल मिला कर यह कह सकती हूँ कि किसी की इक्षा के विरुद्ध उसकी किताब को छापना ग़लत है। और यह भी कि अगर कोई अपने काम की जानकारी लेना चाहता है तो थोड़ी देर से ही सही पर उसे जबाब तो मिलना ही चाहिए। 


Saturday, 5 March 2022

दोनों के दिल हैं मजबूर प्यार से 
हम क्या करें मेरी जां तुम क्या करो…

इस ग़ज़ल को मैंने पहली बार पटना से बसंतपुर जाने वाली बस में सुना था। यह मुझे इतनी अच्छी लगी कि मुझसे रहा नही गया और पहली सीट पर बैठी मैं, बस के गेट से झूल रहे खलासी से पूछा , “ यह किस फ़िल्म का गीत है ?” 

खलासी कुछ मेरी ही उम्र का होगा। मेरे इस सवाल से बेफ़िक्री में लाज को घोल कर बोला, “ फ़िलीम के नाम मालूम नही, कसेट में भरवाए है गीत सब”

“अच्छा” कह कर मैं खिड़की से बाहर देखने लगी। थोड़ी देर में गाना ख़त्म हुआ। वह धीरे से आगे बढ़ा और री प्ले कर दिया। गाना फिर से बजता देख मैंने स्पीकर की तरफ़ देखा। वहाँ खड़ा वह कुछ ढूँढ रहा था। मैं फिर से गाने में खोई हुई खिड़की से बाहर देखने लगी। तभी वह एक कैसेट मेरी तरफ़ करते हुए बोला , “ मैडम, हेमे देख लीजिए, एही में ई गीतवा भरवाए हुए है।” 

कैसेट का कवर एक सफ़ेद काग़ज़ जो पीली-मटमैली पड़ गई थी वह थी। उसपर सुंदर अक्षरों में 1 से 10 तक के नम्बर लाल स्याही से लिखे हुए थे। हर एक नम्बर के आगे नीली स्याही से गीत के बोल लिखे थे। हाँ , शब्दों के माथे को ऐसा बांधा गया था जैसे कोई नदी बह रही हो… मैंने उन्हें देखा और कहा, इस पर सिर्फ़ गाने के नाम है और कैसेट उसकी तरफ़ बढ़ा दिया।

कुछ घंटों में मेरा पड़ाव आ गया और मैं उतर पड़ी। कुछ दिनों बाद भाई एक कैसेट लाया अपने दोस्त के यहाँ से। कैसेट पर लिखा था “अदा” यह जगजीत सिंग और लता जी की गाई ग़ज़लों का कलेक्शन था। मैंने जैसे कैसेट को पीछे पलटा मेरी आँखें ख़ुशी से चमक उठी। उस पर सबसे ऊपर लिखा था, 

“दोनो के दिल है” 

उन दिनों के अजब -ग़ज़ब खलासियों में एक संगीत प्रेमी खलासी का मिलना कितना सुखद था ना। आज यतिश जी की पोस्ट पर यह ग़ज़ल सुना तो उसकी याद आई। जाने अब खलासी नामक कोई प्राणी बस में होता भी है या नही ? होता भी होगा तो हनी सिंह या पवन सिंह में डूबा होगा ….

वैसे जिन्हें ना मालूम हो उनके लिए, खलासी बस में कंडक्टर के अलावा एक एक्स्ट्रा हेल्पिंग हैंड होता था। इनका काम समान चढ़ाना, उतारना, सवारियों को आवाज़ दे कर बुलाना, बस के गेट पर झूलते हुए आस -पास से गुजर रही गाड़ियों को दाएँ -बाएँ करवाना और गाने के कैसेट या अगर सी डी प्लेयर हो तो फ़िल्म बदलना।

 भला हो उस लड़के का जिसकी वजह से मुझे इतनी अच्छी ग़ज़ल सुनने को मिली। और कमाल यह कि इसी अल्बम की एक दूसरी ग़ज़ल मुझे इतनी भाई कि उसे कई दफ़ा रिपीट मोड़ में सुना। अब भी इन्हें सुनती हूँ पर आज बहुत दिन बाद सुना। ग़ज़ल है ; 

मैं कैसे कहूँ जाने जा …



Wednesday, 2 March 2022

बिछिया !!!

 और बिछिया टूट गया… मुझे ठीक से याद नही कि इसे कितने सालों पहले पहना था। दिमाग़ पर ज़ोर देती हूँ तो कुछ छह-सात की बात ध्यान में आती है। शादी के बाद कई तरह के श्रिंगार और आभूषणों में मुझे बिछिया, महावर और सिंदूर बहुत भाए। बिछिया पसंद तो बहुत आई पर हर बिछिया मुझे थोड़ा परेशान ही करती। कभी कोई चुभती तो कभी कोई उँगलियों से निकलने लगती। कोई बार-बार कपड़े में फँसने लगती। बड़ी मुश्किल से एक रिंग वाली, प्लेन बिछिया मुझे पसंद आई और उसे खूब पहना। पर वह भी किसी दिन उँगली से सरक कर कब गुम हो गई मालूम ही नही चला। यहाँ से जाने के बाद मम्मी ने टोका एक ही बिछिया पहनी हो ? मैंने सारी कहानी बताई। वो जाकर बाज़ार से दो जोड़ी और नग वाली छोटी बिछिया ले आई। देखने में सुंदर पर मेरे पैर को रुचे ही ना। मैं फिर से पुराने वाली एक बिछिया पर थी। मायके जाने की ख़ुशी में ध्यान ही नही रहा कि जोड़ा बिछिया पहन लूँ। एक ही बिछिया पहन कर माँ के पास चली गई। 

माँ, जो बच्चों को एक नज़र में ऊपर से नीचे तक देख लेती है उसकी परखी नज़र से मिनट में मेरी बिछिया पकड़ा गई। रात को मुझसे पूछती है, “ बऊवो, दूसरा बिछिया रास्ता में गिर गया क्या ?”

 मैंने खीज कर कहा और नही तो क्या “ ससुराल वाले तो ससुराल वाले, तुमने भी ना जाने किस खुशी में मुझे भारी गहनों से लाद दिया जबकि तुम्हें मालूम है मुझे गहने पसंद नही” माँ ने समाज की दुहाई दी। पर अगले ही दिन यह वाली बिछिया और पतली चेन की पायल ख़रीद लाई। पायल में छोटे -छोटे दिल, मेरे अनुसार पर माँ के अनुसार पान के पत्ते झूल रहे थे। 

यह बिछिया कुछ ऐसी जो पैर कि उँगली से ऐसी लिपटी जैसे, 'चंदन विष व्यापत नहीं लिपटे रहत भुजंग‘

 इसने मानो तीन फेरों में मेरे पैर रूपी पेड़ के जड़, तना और हृदय को लपेट लिया था। इतनी मुलायम और प्रेम से लिपटी की इतने सालों में मुझे इससे कोई शिकायत नही रही। यहाँ जिसकी भी नज़र मेरे पाँवों तक जाती इस बिछिया की तारीफ़ ज़रूर करता। 

शिवरात्रि थी। पैरों में महावर थे और यह टूटी बिछिया भी पर मुझे इसकी ख़बर तक ना थी। साथी की नज़र इसकी टूटन पर पड़ी तब मुझे अहसास हुआ कि जा…यह तो टूट चुका है। मैं थोड़ी उदास थी। साथी ने भी इससे जुड़ी पुरानी प्रेम भरी बातें याद दिला कर और उदास ही किया। कितनी यादें जुड़ी थी इससे…

समय कितना बलवान है ना धातु को भी कमजोर कर देता है। यह सोचते हुए आज नज़र पैरों तक गई, राम और अहिल्या की याद आई…क्या सच में किसी की पाषाण अवस्था किसी स्नेहस्पर्श से जीवित हो सकती है? अगर ऐसा है तो मेरी बिछिया तुम भी जीवित हो उठो…अगर नही तो सब मिथ्या है।

मेरी दादी कहती थीं, अंत गति में सिर्फ़ गोदना ही है जो जीव के साथ जाता है बाक़ी सब यही रह जाता है। मैंने हँसते हुए कहा था , “ दादी गोदना भी त देह के साथ जर जाई, ई कोई आत्मा पर थोड़े गोदवावल बा” 

दादी मेरी हँसने लगी और बोली , “ के देखले बा दुनिया में आत्मा …बियाह के बाद तूहो गोदना गोदवा लिहअ प्रियंका। देह जरी, माटी मिली। गंगा जी में समा जाई। साथे आपन करम आ गोदना ही जाई”

गोदना तो मैंने नही गोदवाया पर मैं चाहती हूँ कि यह बिछिया मेरे साथ अंतिम यात्रा में हो… यह मेरे आत्मा के साथ भ्रमण करती रहे काल दर काल…



Sunday, 20 February 2022

बेंजामिन हैरिसन !!!

आज अमेरिका में प्रेसिडेंट डे मनाया जा रहा है। यह हर साल फ़रवरी के तीसरे सोमवार को मनाया जाता है। इस दिन सार्वजनिक छुट्टी तो नही होती लेकिन स्कूल के अलावा कुछ दफ़्तर, शॉप्स आदि बंद रहते है।  

आज जहाँ हम लोग घूमने जा रहे हैं वहाँ चलने से पहले अमेरिका के एक राष्ट्रपति का थोड़ा इतिहास जाने ले।  

अब तक अमेरिका में 45 लोगों ने राष्ट्रपति का पद ग्रहण किया है। इस सूची से एक व्यक्ति , इंडियापोलिस से चुने गए थे। 

रिपब्लिकन पार्टी के “बेंजामिन हैरिसन ”

ये  संयुक्त राज्य अमरीका 23वे राष्ट्रपति थे। इनका कार्यकाल सन 1889 -1893 तक रहा। इनका जन्म 20 अगस्त 1833 में ओहायो में हुआ था पर बाद के दिनों में ये इंडियापोलिस आ कर बस गए। वकील होने के साथ -साथ बेंजामिन हैरिसन सिविल वॉर के जेनरल भी रहे। और ये आख़री सिविल वॉर जेनरल रहे जो अमेरिका के राष्ट्रपति बने थे। 

सेना में जाने की रुचि और राजनीति इन्हें विरासत में मिली थी। इनके दादा “विलियम हेनरी हैरिसन”   अमेरिकी सैन्य कमांडर और संयुक्त राज्य अमेरिका के नौवें राष्ट्रपति थे। पर इनका कार्यकाल सबसे कम समय के लिए रहा। बुख़ार और निमोनिया की वजह से इनकी मृत्यु शपथ लेने के एक महीने के भीतर ही हो गई थी। 

बेंजामिन हैरिसन का कार्यकाल भी कोई बहुत संतोषजनक नही रहा था। इनके कार्यकाल में पार्टी के भीतर व्याप्त भ्रष्टाचार के कारण इन्हें सबसे कम लोकप्रिय राष्ट्रपति में से एक गिना जाता है। 

तो चलिए आज हम इनके घर चलते है। इनके घर को अब म्यूज़ियम का दर्जा दे दिया गया है। इसका नाम “बेंजामिन हैरिसन प्रेज़िडेंशियल साईट” है। यहाँ जाने के लिए आपको इंडियापोलिस के डेलावेयर स्ट्रीट पर जाना होगा। इस घर रूपी म्यूज़ियम में इनकी कुछ चीजों को संग्रह किया गया है जैसे, बेड, लिखने-पढ़ने की मेज़, किताबों से भरी अलमारी, सुंदर सा डाईनिंग टेबल आदि। 

यहाँ जाने से पहले आपको टूर बुक करनी पड़ती है। एक साथ ज़्यादा लोगों को भीतर जाने की अनुमति नही। जगह भी उतनी नही की ज़्यादा लोग समा पाए। टूर गाइड साथ होता है पर आप चाहे तो खुद भी घुम सकते है। घर के बाहर एक सुंदर सा गार्डेन एरिया है। हम जब गए थे, ठंढ शुरू हो चुकी थी और यहाँ ठंड में हवा भी बहुत चलती है इसलिए हमने बाहर बहुत कम समय बिताया। इस म्यूज़ियम के भीतर भी नही जा पाए कारण कोविड की वजह से टूर बंद था। हमने बाहर से हीं कुछ तस्वीरें ली और लौट आए। 

नोट- पार्किंग आपको रोड साइड ही करनी पड़ेगी। घर ढूँढने के लिए थोड़ा ध्यान देना होगा। जी पी एस आस-पास जाकर बताने लगता है कि घर यहीं है पर सामने घर नही दिखता कारण लाइन से कुछ घरों के साथ बड़े-बड़े मेपल के पेड़ों की ओट में है यह। 



Friday, 18 February 2022

सिनेमा और स्त्रियाँ !!!

हृषिकेश मुखर्जी ने 1960 में “अनुराधा” बनाई।  सोफी बार्ट ने 2015 में “मैडम  वोभरी” और शकुन बत्रा 2022 में गहराइयाँ ले कर आए हैं। इन तीनों फ़िल्मों का काल अलग-अलग है पर कहानी मुझे कही-कही एक सी उलझी लगी। 

तीनों ही फ़िल्में अलग-अलग समय में एक स्त्री के अकेलापन, महत्वकांक्षा, भावनात्मक बिखराव, भटकाव और आत्मग्लानि के साथ डिप्रेशन को बखूबी दिखाती है। 

वैसे फ़िल्म के हिसाब से देखा जाए तो अनुराधा इन तीनों में बीस है। वहीं मैडम वोभरी को देखते वक्त मुझे अचानक अनुराधा की याद आई थी। दोनों ही फ़िल्म की कहानी कुछ एक सी है। समाजसेवी डॉक्टर, अकेलेपन की शिकार पत्नी और उसकी थोड़ी अच्छी जीवन शैली की इक्षा। अनुराधा पर तो बहुत कुछ लिखा जा सकता है पर इस वक्त इतना ही कि उस वक्त भारतीय फ़िल्में जो स्वीकार करती वहीं दिखाया गया। वहीं मैडम वोभरी, अपनी अकेलेपन का उपाय फ़्रांस के तरीक़े से निकालती है। अडलट्री, ग्लानि और अंत, आत्महत्या पर पूरी होती है। 

बात करें गहराइयाँ कि तो मुझे यह फ़िल्म ठीक ही लगी। प्लॉट कोई नया नही है। ऐसी  प्लॉट वाली फ़िल्में बंगला में खूबसूरत बनती है।  इस फ़िल्म की एडिटिंग थोड़ी अच्छी होती और सीन बाई सीन भागने की रफ़्तार कम तो बेहतर फ़िल्म बनती। रही बात इस फ़िल्म की अडल्ट सीन की तो इसे A सर्टिफिकेट मिला ही है। इतना हाय तौबा क्यों ?  

हिंदी फ़िल्मों में फूहड़ आईटम सोंग देखे सकते है। बच्चे उसकी नक़ल कर सकते है पर 18 साल के ऊपर के बच्चे ऐसी फ़िल्म देख कर बिगड़ जाएँगे… हाय रे सभ्यता का चोला। क्या इस मोबाइल- इंटरनेट के युग में आज का युवा इन सब बातों से अनभिज्ञ है ? 

ख़ैर, कहते है सिनेमा समाज का आईना होती है। ऐसे में आज के परिवेश में ठीक ही तो दिखाया गया है। अब एक-दो बार की मुलाक़ातों वालों प्यार में आप क्या उम्मीद करते है ? वह तो अट्रैक्शन और किसी दबी भावना का उफान ही होगा ना। रही बात कपड़ों की तो जिस देश में हिजाब पर बवाल चल रहा हो वहाँ दीपिका या अनन्या की कपड़ों की क्या ही बात पचती ? जबकि महानगरों में तो क्या, छोटे शहरों में भी हम कम ज़्यादा ऐसे ड्रेस सेंस देख ही रहे हैं। 

पता नही आपने गौर किया या नही, फ़िल्म के निर्देश-राइटर ने इसका क्लाइमेक्स जाने क्या सोच कर ऐसा लिखा - फ़िल्म का नायक अपनी मंगेतर को एक बार बोट से धक्का देने और आगे बढ़ जाने का सोचता है। ठीक उसी तरह की घटना उनके साथ घटती है। 

शायद उनके दिमाग़ में कर्म का सिद्धांत घुम रहा होगा।