पीले सरसों ,गुनगुनी धूप,और नए मौसम का आगमन।
पीले कपड़े, पीली चूड़ियाँ, पीली सिंदूर से सजी महिलाएँ बसंत के स्वागत में खिली सी। गुलाल उड़ाते लोग, शुभ काम की शुरुआत, ओम के साथ अक्षर ज्ञान आरंभ और बेटी -बहु की विदाई। यह सब नजारा माता सरस्वती के आगमन और उनके आशीर्वाद की तैयारी का है।
अमेरिका में क्या सरसों, क्या गुलाल क्या क्या बसंत… बेटी विदा हो के यूँ आई की माँ बेचारी सगुन-संदेश भी नहीं पीठा पाती। पहनी ही पीली चूड़ियाँ पहन कर इस बार भी बसंत का स्वागत करूँगी, प्रिय माता जो पधार रहीं हैं।
द्वार पर गेंदे के दो-चार फूल मुस्काने लगे हैं। बेटा हाथ में झाल, डमरू लेकर ठोकता-बजाता रहता है। मन बरसों से सितार की तरफ़ भागता है पर परदेश में सितार और संगीत दोनों मिल का पत्थर हैं।
परदेश के सुख बहुत हैं पर ऋतुओं का सम्मोहन भारत में ही हैं। खेतों में पसरी सरसों मानों धरती हल्दी लगाये सगुन के इंतज़ार में हो। चने और मटर की छिम्मियाँ और हल्के सफेद-बैगनी,गुलाबी फूल मन को मिठास से भर जातें। माता के चरणों से उड़ते गुलाल सारे वातावरण को गुलाबी कर देते की इसी बीच किसी मीठे कंठ से सरस्वती वंदना फूट पड़ती;
हे माता सरस्वती शारदाविद्या दानी, दयानी, दुःख हरिणी,जगत जननी, ज्वालामुखीमाता सरस्वती शारदा
कीजे सुदृष्टिसेवक जान अपना इतना वरदान दीजेतान, ताल, और अलाप, बुद्धि अलंकार शारदाहे माता सरस्वती शारदा
पूजा में जब घर गई थी ,तब माहौल सरस्वती पूजा का कम दिखावा का ज्यादा लगा।पूजा के नाम पर साउंड बॉक्स से जय श्री राम ,जय श्री राम नाम की चीख कान फाड़ रहे थे।किसी महान गायक ने सिर्फ "श्री राम "नाम के चिल्लाने की कैसट बनाई है ,जो मार्किट में खूब चल भी रहा है।मैंने अपने मुहल्ले के एक लड़के से पूछा ये क्या भजन है ?वो बोला दीदी ये सब मुस्लमान लोगो को चिढ़ाने के लिए हर जगह बजाया जा रहा है।मैंने उसे समझाने की कोशिस की।बाद बाकी मुझे मालूम नही मालूम उसने कितना समझा या उस बच्चे के मन में ऐसी भावनाये भरता कौन है। खैर पंडाल में पूजा के बाद बच्चे गायब थे।बस सरस्वती माँ की मूर्ति और कुछ पूजा सामग्री बिखरी हुई थी।माँ के चरणों में कुछ किताबे रखी हुई थी।किताबो से याद आया ,बचपन में मै और मेरा भाई जब सरस्वती पूजा करते थे ,हमलोग अपने लगभग सारी किताब सरस्वती माँ की चरणों में रख देते।इसके दो कारण रहे -एक तो जो भी किताब रखो माँ सरस्वती उसका सारा ज्ञान दे देंगी और दूसरा विसर्जन तक पढ़ना ना पड़े।ज्ञान तो बीना पढ़े मिलता नही था ,हाँ दो दिनों की किताबो से छुट्टी जरूर मिल जाती थी।वही माँ कहती की ,आज जो पढ़ोगे वो सारा याद हो जायेगा।अब मालूम नही ये हकीक़त है या माँ का हमें पढ़ाने पर मजबूर करने का तरीका।दूसरे दिन माँ सरस्वती की विदाई के वक्त सारी औरतें उन्हें खोइछा (चावल ,हल्दी ,दुभ ,फूल ,पैसे )देती और फिर माँ की विदाई हो जाती।माहौल ऐसा होता मानो घर से मिट्टी की मूरत नही बेटी जा रही हो। हम बच्चे विसर्जस के समय माँ सरस्वती की जयघोष करते -माँ सरस्वती भूल ना जाना अगले बरस तुम जल्दी आना 😊इसी के साथ आप सबको वसंत पंचमी की बहुत बहुत शुभकामनाये। माता सरस्वती सबको स्वस्थ दिमाग का मालिक बनाये। ज्ञान का प्रकाश विश्व में फैलता रहे।माता सरस्वती के चरणों में मेरा वंदन !

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