Saturday, 23 July 2016


आतंकवादी सपने और मै !!!

आलसी तो मैं शुरू से रही इसमें कोई नई बात नहीं थी मेरे लिए।पर इस बार ब्लॉग की देरी की वजह मेरा दिमागी रूप से आलसी हो जाना था।इसी बीच एक दो दोस्तों का मसेज भी आया था कि, तपस्या खट्टी -मीठी क्यों सुना पड़ा है ? शतेश ने भी टोका आजकल लिख नहीं रही हो?मैंने कहा शुभ्रांशु जी तुम तो पढ़ते नहीं  मेरा ब्लॉग ,नोटिस कब कर लिया।वो बोले कमेंट नहीं करता इसका मतलब ये नहीं कि पढता नहीं जानेमन।तुम लिखती रहा करो।आज का ब्लॉग मेरी दिमागी परेशानी से जुड़ा है।मैं आपको पहले ही बता दूँ ,मुझे ना तो कभी डिप्रेशन की बीमारी हुई ना अभी तक पागल हुई हूँ और ना कभी नींद की कमी हुई।निद्रा माता कि कृपा है मुझ पर।जब चाहूँ चैन की नींद सो सकती हूँ।पर इन दिनों कुछ अजीब हो रहा था मेरे साथ।मै सोती तो ठीक ही थी ,पर अचानक डर के जग जाती थी।होता यूँ था ,मेरे सपने अब प्यार ,ख़ुशी ,किताबे या घूमने-फिरने तक नहीं रहे।इनपर भी आतंकवादी हमले शुरू हो गए थे।कहने का मतलब ये हुआ ,अब सपने में खून -खराबा देखने लगी था।सपने में मै लोगो से लड़ रही होती या फिर जान बचा के भाग रही होती।हर बार मै बच तो जाती ,पर मेरे शरीर का कोई अभिन्य अंग मेरे साथ ना होता।एक अपाहिज की जिदंगी ,और मै घबरा के जग जाती।पता नहीं मेरा मन इतना विचलीत क्यों था ?मैंने अपनी परेशानी शतेश को बताई।शतेश बोले अरे डरो मत मेरी शेरनी।कितनी बार कहा है रात को न्यूज़ पढ़ के सोना बंद करो।ऐसा भी होता है कि ,हम जो सोचते है वही हमारे सपने का हिस्सा बन जाता है।मैंने भी सोचा सही ही कह रहे है शतेश।इन दिनों कितना कुछ घट रहा है विश्व में।कभी बांग्लादेश ,कभी कश्मीर ,तो कभी फ़्रांस यहाँ तक की जहाँ हमलोग रहते है टेक्सास (डलास )में भी रँग भेद के कारण गोलीबारी और मौत।डरावने सपनो का सिलसिला लगभग रोज ही चल रहा था,पर एक रात तो हद ही हो गई।मैं डर के जगी और काफी देर तक सो नहीं पाई।अगले दिन मै सुबह जग गई थी।ये शतेश के लिए एक शॉक जैसा था।मुझसे पूछे -तपस्या सब ठीक है ना ? आज इतनी सुबह क्यों जग गई ? मुझे मालूम था कि ,आज शतेश के ऑफिस में इम्पोर्टेन्ट मीटिंग है।मैंने इस वजह से ज्यादा कुछ बताया नहीं।बस कहा -क्या तुम घर से मीटिंग नहीं कंडक्ट कर सकते ? आज वर्क फ्रॉम होम कर लेते।शतेश बोले -कोई परेशानी है क्या ,तो प्लीज बताओ।कुछ ज्यादा जरुरी है तो छुट्टी ही ले लूँगा।मैं दूध गरम करते हुए सोच रही थी कि ,अगर मै सपने की वजह से ऑफिस जाने से रोक रही हूँ ,तो ये हँस पड़ेंगे।मैंने कहा नहीं बस ऐसे ही कह रही थी।आप जाओ ऑफिस।शतेश के ऑफिस जाने के बाद बार -बार मेरे दिमाग में वही बेकार ,घटिया डरवाना सपना घूम रहा था।मेरा मन खूब रोने को कर रहा था।मैंने भाई को कॉल लगाया।पर शायद उसके गाँव में होने की वजह से नेटवर्क प्रॉब्लम आ रही थी।मैंने सोचा अच्छा ही हुआ ,उससे बात नहीं हुई।वरना वो और परेशान हो जाता।हमेशा की तरह ज्ञान देता।बहिन ये सब बेकार की बात है।डरो मत मेरी शेरनी का बच्चा।फिर मैंने अपने एक दोस्त को कॉल लगाया।वहाँ भी रिंग होके रह गया।मुझसे रहा नहीं गया।मैंने सोचा माँ या सासू माँ से ही बात कर लेती हूँ।मन कुछ हल्का हो जायेगा।मुझे मालूम है ,ये मेरी माँ के शाम की पूजा का टाइम है।कॉल से पूजा डिस्टर्ब होगी।मैंने सासू माँ को कॉल लगाया।उनसे बात करते वक़्त मै अपने आँसू रोकने की पूरी कोशिश कर रही थी।पर वो तो माँ है।बच्चों की तकलीफ़ पहली आवाज़ में ही समझ जाती है।उनका पूछना ही था कि ,तुम ठीक तो हो ना और मै रो पड़ी।ईतना रोई कि सासू माँ का भी गाला भर गया।मुझे वो हर तरह से समझाने लगी।कुछ नहीं होगा तुम बेकार डर रही हो।आप यकीन मानिये इस वक़्त भी मुझे वो याद रुला रही है।सासू माँ मेरी बहुत समझदार है ,पर कभी -कभार थोड़ी सुपरस्टिशउस चीज़े मानने लगती है।फ़ोन रखने के पहले वो बोली अच्छा सुनो -घर में धुप -अगरबत्ती रोज जलाया करो और एक हनुमान जी की तस्वीर घर में लगा लो।साथ ही कुछ दिन कोई लोहे की चीज़ अपने तकिये के नीचे रख कर सोया करो।मैंने उनको हाँ बोल के फ़ोन रख दिया।उधर शायद टेलीपैथी ने काम किया और मेरी माँ का फ़ोन आ गया।बोली लवली सब ठीक है ना ? मेरा मन तुमसे बात करने को कर रहा था।मै रो -धो तो पहले ही चुकी थी।अभी आराम से पर थोड़ी उदास होके माँ से बात कर रही थी।माँ की अलग कहानी शुरू -तुम मारपीट वाली मूवी कम देखा करो ,रोज सोने से पहले हाथ -पैर धो के सोअो ,बेड पे खाना छोड़ दो।माँ को मेरी ये आदतें मालूम है ,और वो इसी सबको लिंक कर रही थी।फिर और ज्ञान देने के बाद बोली -तुम्हे जब भी डर लगे मुझे कॉल कर लिया करो ,कभी भी किसी भी वक़्त।मेरा मन अब थोड़ा शांत था।मैंने न्यूज़ पढ़ना बंद कर दिया था।फेसबुक और व्हाट्सप्प को भी कम कर दिया।एक तो ये ये व्हाट्सप्प पे पचहत्तर ग्रुप जान के दुश्मन थे।स्कूल का ग्रुप अभी तक अपने-अपने रोमियो जूलियट की खोज में लगा है।वही कॉलेज वाले आज़ भी डिबेट के चक़्कर में पड़े हुए है।जब भी मसेज आये मतलब दंगा ,पॉलिटिक्स और आतंकवाद।कभी -कभार अगर मै हार भी मान लूँ तो नहीं ,ऐसे कैसे भाग सकती हो ? तुम तो डरपोक नहीं थी।अरे भाई मैंने मान लिया कि मैं डरपोक हूँ तो तुम्हे क्या प्रॉब्लम है? मुझे नहीं पड़ना बीते प्रेम कहनियों में या इंटेलेक्टुअल बातों में।वही दूसरी ओर फेसबुक ने तो गंध फैला रखी है।अगर भारत माता के भक्त है तो लाइक करे ,सैनिकों को लाईक करे ,भगवान् की ज्यादा लाइक आई या अल्लाह की ,बुरहान भगवान् या शैतान ,ज़ाकिर नाईक बैन और नो बैन ,आदिवासी महिलाओ से बलत्कार।प्यारे दोस्तों क्या मिलता है आपलोग को ऐसे पोस्ट से ?आप तो अपनी अधूरी जानकारी की तेजी दिखाने के चक़्कर में फेसबुक रँग देते ,पर कुछ मुझ जैसे पागल ,इमोशनल इंसान भी होते होंगे जो आपकी पोस्ट से अपनी -अपनी तरीके से आहात होते होंगे।अब आप कह सकते है तो, सोशल मीडिया यूज़ करना बंद कर दो ये तुम्हारी प्रॉब्लम है।फिर तो मै देवदास वाली स्टाइल में यही कहूँगी कि ,इस दुनियाँ में रहने के लिए मुझे क्या -क्या छोड़ना होगा ?वैसे भी ज़ालिम ,कमबख़्त टेक्नोलॉजी ऐसी चीज़ है जिससे आप कोस तो सकते है ,पर आसानी से पीछा नहीं छुड़ा सकते।ये अच्छा नहीं यही होता कि ,हम फेसबुक को अपनी तस्वीरो ,घूमने की जगहों ,खाने ,मूवी का ब्यौरा देने या कुछ अच्छी -भाईचारे , ज्ञान या हँसी मजाक वाले पोस्ट से भरे।अपनी खुद  के विचारों से भरे ना की भर्मित सूचनाओं से।यदि फिर भी आप सच में अपने घृणित पोस्ट से इत्तेफाक रखते है तो -उसी दिशा में कुछ करे।मसलन पॉलिटिशन बन के पॉलिटिक्स कि गंदगी को साफ़ करे ,सैनिक बनकर देश की सेवा करे ,कश्मीर से सिम्पैथी है तो ,कुछ साल कश्मीर रह कर वहाँ की सच्चाई जानने की कोशिश करे और उस दिशा में सुधार करे।ना कि सिर्फ पोस्ट करके आराम से बैठ जाए।हमें क्या जरूरत किसी धर्म गुरु की बातों में आने की।हमारे पास ख़ूबसूरत दिमाग है ,प्यारे -प्यारे रिस्ते -नाते है ,बस उसी को फॉलो करे।मुझे तो कभी -कभी ये सोच के डर लगता है कि ,आज से 20 साल बाद जब हमारे आने वाली जेनेरशन युवा होगी तो ,उसके मन के भाव क्या होंगे ? वो डर या खौफ़ से भरे हुए या फिर घृणा ,आक्रोश और मौत की खेल में डूबे हुए।इस वक़्त बुद्ध आपकी बहुत जरूरत है।कहाँ हो बुद्ध ? दुनिया को आपकी जरूरत हैं। 

Thursday, 7 July 2016

KHATTI-MITHI: फिर तुम्हारे साथ !!!

KHATTI-MITHI: फिर तुम्हारे साथ !!!: कविता चाहे जिस भाषा में हो ,आपके दिल को छू ही जाती है।ये कवी की कल्पना ही तो होती है ,कि कभी आपके हाथो में धुप मलने की ख़्वाइश हो या फिर कैन...

फिर तुम्हारे साथ !!!

कविता चाहे जिस भाषा में हो ,आपके दिल को छू ही जाती है।ये कवी की कल्पना ही तो होती है ,कि कभी आपके हाथो में धुप मलने की ख़्वाइश हो या फिर कैनवास पर रंग बनके बिछ जाने की।या फिर तुम होती तो ऐसा होता तुम होती तो वैसा होता।इन्हीं कवितओं की खूबसूरती बिखेर रहा है यू टुब।यू टुब पे आप अगर हिंदी कविता सर्च करते है ,तो आपको बहुत सी ऐसी कविताएँ मिलेंगी जो आपके दिल को छू जाएँगी।चाहे पाश की कविताएँ हो ,या रामधारी सिंह दिनकर की ,या फिर भवानीप्रसाद मिश्र हो या मानव कॉल की कविता या फिर विस्लावा सिम्ब्रोस्का की।करीब सात -आठ  महीनों से मैं इन कवितओं पर कुछ लिखना चाह रही थी ,पर हर बार ही रह जाता था।इन कविताओं को बड़ी ही खूबसूरती के साथ कुछ लेखक तो कुछ नायक-नायिका ,तो कोई पत्रकार या कोई डांसर पढ़ते है।मुझे  "स्वरा भाष्कर" (नायिका ) की पढ़ी हुई कविता बहुत पसंद आई थी।इन्ही कविताओं के संग्रह में मुझे "प्रेमचंद गाँधी "की कविता भी सुनने को मिली।वैसे मैंने इनकी कुछ ही कविता पढ़ी है। जिसमे "इस सिम्फोनी में ,अगर हर्फ़ों में ही है ख़ुदा और अंतिम कुछ भी नहीं होता शामिल है।बात आज की कविता की तो -ये कविता "फिर तुम्हारे साथ " कोई बहुत ही जबरदस्त  कविता तो नहीं ही है ,पर सुन कर अच्छा लगा।वो क्या है ना प्रेम एक ऐसी भावना है जो सबसे ऊपर।सारे ज्ञान से ऊपर है।ये एक ऐसा टॉपिक है ,जो किसी के चेहरे पर मुस्कान ला सकता है।वैसे कविता के भाव को हर कोई अलग -अलग अपनी समझ के अनुसार अपनाता है।मसलन किसी को वही प्यारी कविता दुःख और वेदना देती है ,तो किसी को ख़ुशी।आज जिस कविता की बात कर रही हूँ ,उसका सार कुछ यूँ है -क्या होता है ,जब दो जन जो एक दूसरे के बिना रह ही नहीं पाते थे ,अचानक बहुत सालो बाद मिलते है तो -

"एक अर्से के बाद देखा तुम्हे ,तुमसे जी भर के बातें की। 
दिल खोल कर आँखों में भर लिया मैंने तुम्हे ,थोड़ी कमज़ोर लग रही थी तुम 
लेकिन आँखों में वही चमक कायम थी ,जो मुझे खींचती है हर बार तुम्हारी ओर। 
आधा दिन गुजारा साथ हमने। 
तुम्हे ख़्याल ही नहीं रहा या जानबुझ कर ,तुमने दुपट्टा नहीं डाला इस दौरान। 
ना ही गीले बालों में कंघी की तुमने ,ना ख़ुशबूदार तेल लगाया 
याकि तुम्हे याद था ,मुझे अच्छे लगते है तुम्हारे लम्बे केशु ऐसे ही। 
एक बार फिर मैं चकित था तुम्हारे ज्ञान पर ,और तुम खुश थी मेरी कामयाबी पर। 
कितनी बार हँसे हम एक साथ ,कितनी बार गूंजे हमारे ठहाके कोई हिसाब नहीं 
मैं याद रखूँगा उस स्पर्श को ,जो चाय की कप के साथ दिया तुमने 
उस वक़्त की सिहरन याद रहेगी मुझे,
जैसे याद है! पहली बार तुमसे गले मिलना और मारे शर्म के एकदम से छूट जाना। "

Tuesday, 28 June 2016

KHATTI-MITHI: माहे रमज़ान और सूफियों की बातें !!!!!

KHATTI-MITHI: माहे रमज़ान और सूफियों की बातें !!!!!: मेरी एक दोस्त ने मुझसे कहा -तपस्या माहे रमज़ान खत्म होने को है ,और तुमने इसपर कुछ नहीं लिखा।बात तो सही कही उसने।तो चलिए इस बार रमज़ान से जुड़ी...

माहे रमज़ान और सूफियों की बातें !!!!!

मेरी एक दोस्त ने मुझसे कहा -तपस्या माहे रमज़ान खत्म होने को है ,और तुमने इसपर कुछ नहीं लिखा।बात तो सही कही उसने।तो चलिए इस बार रमज़ान से जुड़ी कुछ यादें ,कुछ सूफ़ी संतों की बातें लिखती हूँ।जहाँ मेरा बचपन बीता उस जगह पर मुसलमानो की संख्या भी अच्छी खासी है।हिन्दू ,मुस्लिम सब मिल कर रहते थे।अब भी मिल कर रहते है ,पर वो आत्मीय लगाव थोड़ा कम हो रहा है।कुछ तो बदलते परिवेश का असर है।कुछ "बजरंग दल" की महिमा है।खैर इस पाक़ महीने में नफ़रत कि क्यों बात की जाय ,जबकि बताने को और भी प्यारी यादें है।हाँ तो जब मैं छोटी थी ,घर के बाज़ार वाले सारे काम मुझे ही करने पड़ते थे।भाई उस वक़्त छोटा था।पिता जी भी नहीं थे।शाम को मैं सब्जी ,राशन पीठ पर लाद कर लाती,रखती और खेलने भाग जाती।रमज़ान के दिनों में बाज़ार की रौनक कुछ और ही होती।कैसे दुर्गा पूजा की शुरुआत से ही मूर्ति और पंडाल में रूचि बढ़ जाती है।वैसे ही रमज़ान के महीने की शुरुआत से ही हमलोग ईद का इंतज़ार करने लगते।रोजाना की तरह बाजार से जब सब्जी लेकर घर लौट रही होती -देखती दुकानों के आगे सफाई होती रहती।कोई झाड़ू लगा रहा है ,तो कोई पानी  छिड़क रहा होता।कही चटाई बिछ रहे है ,तो कही तिरपाल (बोरे से सीला चटाई जैसा ही ) लोग झुण्ड में बैठ कर भूजा ,पकौड़े ,समोसे ,सरबत आदि खा-पी रहे होते।घर आती तो कालोनी के अंसारी चाचा ने भी रोज़ा खोल लिया होता।घर पर मेरे और मेरे भाई के लिए कभी समोसा तो कभी भुजा वो भेज देते।इस तरह रमज़ान ईद तक पहुँच जाता।कई जगहों से खाने की दावत आती।जिसको लोग सेवई पीने की दावत भी कहते।मुझे सेवई के साथ एक खाश किश्म का जो हलवा बनता ,वो बड़ा पसंद था।अब तो दसन साल गुजर गए वो हलवा खाये।जाने कब नसीब हो ? इसके साथ घर पर भी कुछ लोग सेवई ,चीनी और ड्राई फ्रूट्स दे जाते।हम भाई बहन सेवई छोड़ ड्राई फ्रूट्स पे डट जाते।ड्राई फ्रूट्स उस वक़्त हमारे लिए लक्ज़री आईटम होता था।जैसे दुर्गा पूजा ,दिवाली के बीतने का दुःख होता वैसे ही रमज़ान और ईद के जाने का होता।बाजार भी फीका लगने लगता।मन उदास हो जाता।तो ऐसे में क्यों ना सूफी संतो की तरफ चले।मन को भी शांति मिलेगी।वैसे तो बचपन की यादो की वजह से मुस्लिम धर्म कभी अजनबी नहीं रहा मेरे लिए।ज्यादा रुझान भाई की सोहबत में बढ़ा।उसके साथ "निज़ामुद्दीन दरगाह या मेहरौली की दरगाह" पर जाना।उसके द्वारा लाई कुरआन को पढ़ने की कोशिश करना।पर जैसे मुझे गीता पढ़ना बोरिंग लगता वैसे ही कुरआन लगा।हो सकता है ,उस वक़्त मेरी समझ इनसबके लायक ना थी।हाँ मेरा सूफ़ी संतो में रूचि जरूर बढ़ी।इसका कारण संगीत प्रेम या इनमे छुपी प्रेम की भावनायें हो सकती है।सूफ़ी संत या चिस्ती लोग(अफ़गानिस्तान के एक शहर से ) जो भी हुए ,उनका एक ही मज़हब है -प्रेम ,त्याग ,मानवता और दया।हो सकता हो मेरा सूफ़ियों के प्रति रुझान का एक और कारण मेरा नारी मन भी हो।"निजामुद्दीन औलिया" के दरग़ाह पर जाने पर मुझे 'आमिर ख़ुसरो साहब 'के बारे में भी मालूम हुआ।पहले तो ये बता दूँ "दरग़ाह और मज़ार "एक ही है।दरग़ाह पर्शियन शब्द है ,वहीं मज़ार अरेबिक शब्द है।ऐसे तो कई सूफ़ी संतो का मज़ार है ,पर सबसे ज्यादा लोगो की तादात "ख़्वाजा मोईनुद्दीन चिस्ती "के दरग़ाह पर होती है।ये राजस्थान के "अजमेर" शहर में है।मोईनुद्दीन चिस्ती को "गरीब नवाज़" भी कहते है।दूसरी बारी आती है "निज़ामुद्दीन औलिया "की।इनका मज़ार "दिल्ली "में है।फिर बात आती है 'मुंबई "स्थित "हाज़ी अली "दरगाह की।इन सब दरगाहों पर हिन्दू ,मुस्लिम सब जाते है।सबकी दुआयें मालिक क़ुबूल करते है। वही कुछ मुस्लिम रूढ़िवादी विचारधारा के लोग मज़ार या दरग़ाह पर नहीं जाते।उनका मानना है कि ,उन्हें सिर्फ अल्लाह को पूजना है।खैर सबकी अपनी विचारधारा हो सकती है।जहाँ तक मेरा विचार है ,मुझे तो यहाँ जाके अच्छा ही लगा।काफी कुछ सिखने को मिला।सूफ़ियों में कई नामीगिरामी कवि हुए। जिन्होंने अपनी कविताओं ,गीतों के जरिये प्रेम बाँटने की कोशिश की। इस तरह वो ख़ुदा को भी पा लिए और खुद को भी।निज़ामुद्दीन औलिया के शिष्य आमिर ख़ुसरो इन सबमे उच्चा नाम है ,एक कवि ,एक कव्वाल के तौर पर।आमिर ख़ुसरो के कुछ दोहे -*ख़ुसरो दरिया प्रेम का ,उल्टी वा की धार। जो उतरा सो डूब गया ,जो डूबा सो पार।।
*ख़ुसरो पाती प्रेम की ,बिरले बाँचे कोय।वेद ,कुरान ,पोथी पढ़े प्रेम बिना का होय।।
*ख़ुसरो सरीर  सराय है ,क्योंसोवे सुख चैन। कूच नागरा साँस का ,बाजत है दिन रैन।।
ख़ुसरो ने बहुत सी कविताएँ लिखी मसलन छाप तिलक सब छीना रे ,मोसे नैना मिला के ,आज रँग है ये माँ रंग है री ,काहे को ब्याहे विदेश ,अरे लखिया बाबुल मोरे कुछ प्रमुख रचनाएँ है।
ऐसे ही एक सूफ़ी संत "मौलाना रूमी" जिनको सिर्फ रूमी भी कहते है।उन्होंने कहा है -*इश्क़ हरा देता है सबको ,मैं हारा हूँ।खारे इश्क़ से, शक़्कर सा मीठा हुआ हूँ।
*"बेवक़ूफ़ मंदिर में जाकर तो झुकते है ,मगर दिल वालो पर वो सितम करते है।
वो बस इमारत है असली हक़ीक़त नहीं है ,सरवरो (गुरु )के दिल के सिवा मस्जिद नहीं है।
वो मस्जिद जो औलिया(संत )के अंदर में है ,सभी का सजदागाह है ,खुदा उसी में है।"
वही संत 'वारिश साह" ने भी प्रेम और मानवता को ही अल्लाह का मार्ग बताया। उनकी प्रमुख कृति हीर -रांझणा है।
चाहे निज़ामुद्दीन हो ,ख़ुसरो हो ,रूमी हो ,वारिश शाह हो सबने प्रेम और त्याग से अल्लाह ,ईश्वर को पाया।हम इनकी कविताओं में "प्रेमी "भगवान या अल्लाह को समझे।वैसे किसी इंसान के प्रेम के सम्बन्ध में भी हम ये कहे तो बुरा ना होगा।आखिर ये भी तो प्रेम का एक दूसरा रूप है।क्यों ना इस बार ईद पर हमारी "ईदी' प्रेम देना और प्रेम लेना हो।हर जगह अमन चैन हो।लोगो के अंदर दया और मानवता हो।चलिए इस प्यारी सी ईदी के साथ आप सबको "माहे रमज़ान मुबारक़ हो"।आने वाला "ईद मुबारक़ हो"।

Wednesday, 22 June 2016

KHATTI-MITHI: ग्रैंड कैनियन ,डिज्नी ,यूनिवर्सल स्टूडियो ,हॉलीवुड...

KHATTI-MITHI: ग्रैंड कैनियन ,डिज्नी ,यूनिवर्सल स्टूडियो ,हॉलीवुड...: वेगास से हमलोग ग्रैंड कैनियन को चलते है।ग्रैंड कैनियन ,वेगास से लगभग 4 से 4 :30 घंटे की दुरी पर है।अगर आपको तेज ड्राइव का शौख़ है तो ,ये सड़क...