Thursday, 27 October 2016

KHATTI-MITHI: भक्ति -प्रेम का मिलन त्यौहार !!!

KHATTI-MITHI: भक्ति -प्रेम का मिलन त्यौहार !!!: हम जहाँ से है वहाँ दुर्गा पूजा ,दिवाली ,छठ पूजा और होली हमारा वैलेंटाइन डे होता है।माने वहाँ तब तो ऐसन कोई सुबिधा नही थी ,जहाँ प्रेमी युगल ...

भक्ति -प्रेम का मिलन त्यौहार !!!

हम जहाँ से है वहाँ दुर्गा पूजा ,दिवाली ,छठ पूजा और होली हमारा वैलेंटाइन डे होता है।माने वहाँ तब तो ऐसन कोई सुबिधा नही थी ,जहाँ प्रेमी युगल मिल के बतिया सके।चाय -कॉफी पी सके।बस दुरे से देख लिए ,मुस्कुरा लिए ,लड़की के घर के आस -पास साइकिल नाचा लिए हो गए खुश।इहाँ कहाँ कॉफी हॉउस चाहे पार्क।हाँ चाय की गुमटी कदम कदम पर मिल जाएगी।जहाँ दुनिया भर की पॉलिटिक्स होगी भाई।लेकिन का फायदा उ पॉलिटिक्स का जो ,नीतीशवा एगो पार्को ना बनवा पाया बसंतपुर में।अब ऐसे में माता रानी की ही कृपा होती थी/है।जैसे बड़े शहरों में वैलेंटाइन डे के पहले पचास गो डे होता है -चॉकलेट डे ,खेलवना दे (टेडी डे ),गुलाब दे (रोज़ डे ) औरि ये दे वो दे ,डे।वैसे ही दुर्गा पूजा के नाइन डे हमारे यहाँ।ना कुछ दे ना ले बस धार्मिक प्रेम होता।माने इंतज़ार होता, कब से नवरातन के दिया जरावे आहिहे हमार जान हो ? अच्छा ,अभी तक जान के मालूम भी नइखे कि उ केतना के जान हई।बस बेचारी जान ये शरीर से वो शरीर घूम रहल बारिन।माने कितनो की जान बनकर।जब लड़का सब में मार होता है ,तब मालूम होता है -अरे बाप रे ,पुजवा (पूजा )के चक्कर में केतना के माथा फुटल।खैर नवरातन के शुरआत से लडकियां मईया जी के मंदिर में दिया जलाने जाती है।ये कार्यक्रम 9 दिन चलता है।रोज शाम को सज-धज के ,हाथ में फूलडाली (जिसमे पूजा का सारा सामान रखा होता है )लेकर मंदिर की ओर रंगबिरंगी लड़कियों का झुण्ड चल पड़ता।उस वक़्त माहौल भक्ति- प्रेम का होता।कितना सरल और सस्ता प्रेम न कुछ दो ना लो।साला ये वैलेंटाइन डे -इसके चक्कर में हम गरीब प्रेमी कहाँ जाये ? एगो कार्डवो ख़रीदे तो दे नही पाते ,मन मसोस के रह जाते।कार्ड के आगे पीछे सारे दर्द भरे शायरी चिपका दिए ,पर का फायदा जो इ दरद पंहुचा ही नही पाया।दूना दुःख हुआ।पइसो बर्बाद और कार्ड देख के मन में औरि बौराने लगता।ना देम त वैलेंटाइन के का होई ? वो तो माता रानी की जय हो ,जो इनकी कृपा से अपनी रानी को 9 दिन देख पाते है।बिना किसी डर के,बिना रोक टोक के।एक दो बोल -बाल मार कर खुश हो लेते है।वैसे मेरे साथ भी इससे एक किस्सा जुड़ा हुआ है।मै भी मोहल्ले की लड़कियों के साथ दीया बारने जाने लगी।पहले जब छोटी थी ,तो ये सब बहुत अच्छा लगता था।बाजार की चमक धमक ,मंदिर में दीया जलना।पर जब से पटना पढ़ने गई ,तब से फूलडाली लेकर जाने में शर्म आने लगी।माँ से कहती की ईस बार रहने देते है।माँ मेरी अत्यधिक धर्मिक -कहती अरे देवी माँ के मंदिर में दीया नही जलेगा?जैसे मानो मेरे एक दीया नही जलाने से मंदिर अंधकारमय हो जायेगा।जाओ -रेखा ,पप्पी ,सीमा  इंतज़ार कर रही है।एक तो और समस्या थी मेरे साथ।गर्मी के दिन हो तो दो बार नाहा भी लो ,एक तो हल्की ठंढ  दूसरा शाम का वक़्त फिर से नहाओ, फिर जाओ उफ्फ! ऐसे में मेरा भाई हमेशा की तरह मेरा कवच,मेरा तारन हार बनके आया।बोला- माँ दीया जलाने जाना जरुरी है क्या ? माँ पूछी क्यों ? भाई बोला -वहाँ दुर्गा स्थान पर लफुए लड़को का झुण्ड घूमता रहता है।वहाँ पूजा थोड़े होता है।वैसे तो मेरा भाई बहुत शरीफ है ,पर क्या है ना ,है तो वो भी लड़का ही।घूम रहा होगा वो भी या देखा होगा कुछ ऐसा।अब तो बात श्रद्धा और इज़्ज़त पर आ गई।इज़्ज़त जीत गई और माँ ने कहा कोई बात नही ,मै किसी और को बोल दूँगी मेरे बदले दीया जला देगी।खैर तो इस तरह हमरा 9 दिन का आस्था पूर्वक वैलेंटाइन डे चलता रहता है।फिर बात आती है दिवाली की।दिवाली से घर की साफ़ -सफाई के साथ छठ पूजा की तैयारी शुरू हो जाती है।ईसी सिलसिले में लड़कियों को कई बार खरीदारी के लिए बाजार जाना होता है।बाजार में भी चहल -पहल हो जाती है ,और प्रेमियो की भी।अब तो कपडे खरीदे के लिये किसी विशेष दिन का इंतज़ार नही होता पर करीब 10 /15 साल पहले फिक्स होता।होली ,दुर्गा पूजा ,दिवाली या छठपूजा।हाँ स्कूल ड्रेस और जन्मदिन का कपड़ा अपवाद होता।सभी लड़के ,लड़कियाँ ,महिलायें त्योहारो पर खूब सजती।नए कपड़े पर इठलाती।उस वक़्त फेसबुक ,व्हाटअप तो था नही ,पर कपड़े तो दिखने थे ,मेकअप तो दिखाना था।बस फिर क्या ? एक घर से दूसरे घर घूमते रहो।सबसे मिलना भी हो जाता और खुद का प्रदर्शन भी।मेरे जैसी आलसी प्राणी के लिए तो फेसबुक ,इंस्टाग्राम वरदान साबित हुआ।अरे नही दो -चार बार इज़्ज़त मार भी साबित हुआ -जब ससुराल के कुछ अनजान देवर लोग ,मेरी सासु माँ को कहते -बड़की माई आज भाभी के फेसबुक पे देखनी ह।स्कर्ट पहिन के घुमत रहली ह।देखी ना फोटो भी लोड कर लेनी।अब क्या बोलू ? कमीनो तुमने देखा चलो ठीक।देख के डाउनलोड करके प्रचार करने में लग गए।वो तो भला हो सासू माँ का जो इन सब बातो पर ध्यान नही देती।बस मुझे प्यार से कहा तनी देख के फोटो लगावल करअ ।खैर कितना भोलापन होता था उस वक़्त।नए कपडे नही ,मानो नए "पर" होते।सब उड़ रहे होते प्रेम ,ख़ुशी ,उल्लास से।जिन भाभियो या चाचियों के पति परमेश्वर बाहर कमाने गए होते उनके लिए यही त्यौहार उनका तीज(करवा चौथ )होता।माँ लोगो के लिए यही त्यौहार उनका जितिया (बच्चे के लिए किया जाने वाला फास्टिंग )और बहनो के लिए राखी।वही छिटपुटिये या कभी -कभार सीरियस प्रेमी युगल का वैलेंटाइन।सभी प्रेम पूर्वक त्यौहार मानते।भगवान् से प्रार्थना है कि ,सबके दिलो में प्रेम के दीये जलते रहे ,माता रानी की कृपा बानी रहे ,छठी मईया अपनी ओर खिंचती रहे।घर वाले ये कहना कभी ना भूले की छठ बा "ऐसो त आ जा"।सबको "दिवाली" की "छठ पूजा" की भक्ति -प्रेम में डूबी शुभकामनाये !! 

Tuesday, 18 October 2016

KHATTI-MITHI: प्रेम और प्रीतम !!!!

KHATTI-MITHI: प्रेम और प्रीतम !!!!: बहस बहस बहस ! हर जगह,हर बार बस बहस ही बहस।कभी देश की सुरक्षा के नाम पर ,कभी पॉलिटिक्स को लेकर ,कभी फिल्मों को लेकर,कभी बुर्खा तो कभी तलाक...

प्रेम और प्रीतम !!!!

बहस बहस बहस !
हर जगह,हर बार बस बहस ही बहस।कभी देश की सुरक्षा के नाम पर ,कभी पॉलिटिक्स को लेकर ,कभी फिल्मों को लेकर,कभी बुर्खा तो कभी तलाक के नाम पर।हँसी तो मुझे राम मंदिर की जगह राम म्यूजियम बनने की बात पर आई।वो दिन दूर नही भईया जब लोग चिड़ियाघर और  गाँधी म्यूज़ियम की जगह ,राम जी या अल्लाह मियाँ  के चिड़ियाघर या म्यूज़ियम जायेंगे।भाई राम जी के चिड़ियाघर से मेरा तात्पर्य बिल्कुल हनुमान जी से नही था।वो तो मेरे फेवरेट भगवान् है।हाँ बाली -सुग्रीव ,जटायु आदि के बारे में कुछ कह नही सकती।बुरा ना मानो दिवाली है :) अमृता प्रीतम जी की एक कविता आज के हालातों के नाम। 
मेरा शहर एक लम्बी बहस की तरह है 
सड़कें - बेतुकी दलीलों सी…
और गलियां इस तरह
जैसे एक बात को कोई इधर घसीटता
कोई उधर
हर मकान एक मुट्ठी सा भिंचा हुआ 
दीवारें-किचकिचाती सी 
और नालियां, ज्यों मूंह से झाग बहती है
यह बहस जाने सूरज से शुरू हुई थी
जो उसे देख कर यह और गरमाती
और हर द्वार के मूंह से
फिर साईकिलों और स्कूटरों के पहिये
गालियों की तरह निकलते
और घंटियां हार्न एक दूसरे पर झपटते
जो भी बच्चा इस शहर में जनमता
पूछता कि किस बात पर यह बहस हो रही?
फिर उसका प्रश्न ही एक बहस बनता
बहस से निकलता, बहस में मिलता…
शंख घंटों के सांस सूखते
रात आती, फिर टपकती और चली जाती
पर नींद में भी बहस खतम न होती
मेरा शहर एक लम्बी बहस की तरह है….
अब बात अमृता जी की।कई बार अमृता जी के बारे में लिखने का सोचा ,पर हर बार ही रह जाता था ।मुझे अमृता जी की जीवनी काफी दिलचस्प लगती है।एक महिला जिसकी प्रेम कहानी को समझ पाना ,जैसे इंद्रधनुष को देखना।अलग -अलग रंग ,पर आपकी पहुँच और समझ से परे।अमृता जी का जन्म पंजाब के गुजरांवाला में हुआ था।बटवारे के बाद वो लाहौर से भारत आ गई थी।16 साल की उम्र में अमृता जी की शादी प्रीतम सिंह से हुई ,और वही से अमृता कौर "अमृता प्रीतम" बन गई।कुछ बरसो के बाद अमृता अपने पति से अलग हो गई।इन्होंने ने कभी अपने पति से तलाक नही ली।हो सकता हो तलाक या शादी  इनके लिए किसी सर्टिफिकेट से ज्यादा कुछ मायने ना रखते हो।कुछ  समय बाद इनकी प्रेम कहानी गीतकार "साहिर लुधियानवी"  जी के साथ शुरू हुई।प्रेम का आलम ये कि ,इनकी कविताओं में साहिर तो वही साहिर के गीतों में अमृता।प्रेम के बावजूद कही विश्वास की कमी की वजह से ये दोनों एक नही हो पाए।फिर अमृता जी के जीवन में ईमरोज का आना ,मानो इनके जीवन में रंगों का भर जाना।ईमरोज एक पेंटर है और वो अमृता जी कविताओ के लिए स्केच बनाया करते थे।अमृता और ईमरोज को साथ रहने के लिए  शादी की मुहर की जरुरत नही थी।वे दोनों साथ रहे पर कभी शादी नही की।ईमरोज अमृता के साथ अंत तक रहे।अमृता 31 ऑक्टबर 2005 को हमें अपनी कविताओं के साथ छोड़ गई। कभी -कभी मैं सोचती हूँ ,क्या अमृता को भी समाज का डर लगा होगा ? क्या उनको भी चरितहीन का दर्जा दिया गया होगा ?बावजूद इसके उन्होंने अपने जीवन को प्रेम से सींचा ,प्रेम किया और प्रेम पाया।विचार स्वछन्द ,जीवन स्वछन्द ,शरीर स्वछन्द ,लेखनी स्वछन्द।सच में अमृता आपकी लेखनी के साथ आपका जीवन भी साहस का परिचय देता है।क्या खूब लिखा है आपने - "परछाई पकड़ने वालो ,छाती में जलती आग की कोई परछाई नही होती "आपकी कई कविताये पसंद है मुझे ,उनमे से कुछ  -
*मेरी सेज हाजिर है 
पर जूते और कमीज की तरह 
तू अपना बदन भी उतार दे 
उधर मूढ़े पर रख दे 
कोई खास बात नहीं 
बस अपने अपने देश का रिवाज है……
* मैं तुझे फिर मिलूँगी
कहाँ कैसे पता नहीं
शायद तेरे कल्पनाओं
की प्रेरणा बन
तेरे केनवास पर उतरुँगी
या तेरे केनवास पर
एक रहस्यमयी लकीर बन
ख़ामोश तुझे देखती रहूँगी
मैं तुझे फिर मिलूँगी
कहाँ कैसे पता नहीं

या सूरज की लौ बन कर
तेरे रंगो में घुलती रहूँगी
या रंगो की बाँहों में बैठ कर
तेरे केनवास पर बिछ जाऊँगी
पता नहीं कहाँ किस तरह
पर तुझे ज़रुर मिलूँगी

या फिर एक चश्मा बनी
जैसे झरने से पानी उड़ता है
मैं पानी की बूंदें
तेरे बदन पर मलूँगी
और एक शीतल अहसास बन कर
तेरे सीने से लगूँगी

मैं और तो कुछ नहीं जानती
पर इतना जानती हूँ
कि वक्त जो भी करेगा
यह जनम मेरे साथ चलेगा
यह जिस्म ख़त्म होता है
तो सब कुछ ख़त्म हो जाता है

पर यादों के धागे
कायनात के लम्हें की तरह होते हैं
मैं उन लम्हों को चुनूँगी
उन धागों को समेट लूंगी
मैं तुझे फिर मिलूँगी
कहाँ कैसे पता नहीं

मैं तुझे फिर मिलूँगी!!
 

Wednesday, 28 September 2016

यदि देश की सुरक्षा यही होती है
कि बिना जमीर होना ज़िन्दगी के लिए शर्त बन जाए
आँख की पुतली में हाँ के सिवाय कोई भी शब्द
अश्लील हो
और मन बदकार पलों के सामने दण्डवत झुका रहे
तो हमें देश की सुरक्षा से ख़तरा है ।

हम तो देश को समझे थे घर-जैसी पवित्र चीज़
जिसमें उमस नहीं होती
आदमी बरसते मेंह की गूँज की तरह गलियों में बहता है
गेहूँ की बालियों की तरह खेतों में झूमता है
और आसमान की विशालता को अर्थ देता है

हम तो देश को समझे थे आलिंगन-जैसे एक एहसास का नाम
हम तो देश को समझते थे काम-जैसा कोई नशा
हम तो देश को समझते थे कुरबानी-सी वफ़ा
लेकिन गर देश
आत्मा की बेगार का कोई कारख़ाना है
गर देश उल्लू बनने की प्रयोगशाला है
तो हमें उससे ख़तरा है

गर देश का अमन ऐसा होता है
कि कर्ज़ के पहाड़ों से फिसलते पत्थरों की तरह
टूटता रहे अस्तित्व हमारा
और तनख़्वाहों के मुँह पर थूकती रहे
क़ीमतों की बेशर्म हँसी
कि अपने रक्त में नहाना ही तीर्थ का पुण्य हो
तो हमें अमन से ख़तरा है

गर देश की सुरक्षा को कुचल कर अमन को रंग चढ़ेगा
कि वीरता बस सरहदों पर मर कर परवान चढ़ेगी
कला का फूल बस राजा की खिड़की में ही खिलेगा
अक़्ल, हुक्म के कुएँ पर रहट की तरह ही धरती सींचेगी
तो हमें देश की सुरक्षा से ख़तरा है।
"पाश " की लिखी ये कविता आज के समय में कितनी सच्ची लगती है ना।चारो तरफ हो -हंगामा है ,सुरक्षा को लेकर।चाहे भारत हो या अमेरिका हर जगह एक ही शोर ,पर हमें खतरा किससे है ?अपने से या अपनों से ? खुद से या खुद के डर से ? भारत -पाक -अमेरिका -चीन सुन -सुन कर दिमाग में केमिकल लोच होने लगा है।समझ नही आता किसे मारे के,कहाँ मरे कहाँ माफ़ करे ?खैर पाश ! चाहे आपकी कविता ,"अब विदा लेता हूँ "हो या "मैंने एक कविता लिखनी चाही "हो या फिर "*सबसे खतरनाक होता है सपनो का मर जाना" ,सबने मुझे सोचने पर ,रोने पर विवश किया। अवतार सिंह संधू यानि हमारे पाश का जन्म पंजाब के जालंधर में 9 सितम्बर 1950 को हुआ था। आपके नाम का "संधू" हटा कर अगर "साधु"कर दिया जाय तो ,इसमें कोई आश्चर्य नही होगा।साधु कहने से मेरा मतलब किसी धर्म से नही इसकी प्रकृति से है।जैसे एक साधु हर बंधन से मुक्त होता है ,आपके विचार भी वैसे ही भय मुक्त ,बंधन मुक्त है।पाश की नक्सलवादी राजनीती से सहानुभूति थी।इन्होंने पंजाबी में कविताये लिखी ,कुछ पत्रिका का संपादन भी किया।कुछ पंजाबी में लिखी होने से पढ़ नही पाई ,पर इनकी कविताये जब भी पढ़ो प्रभावित करती है।39 साल की उम्र में ही आपकी हत्या कर दी गई।हत्या मनुष्य की होती है पाश , विचारो की नही।जीवन के बारे में लिखी आपकी इस कविता के साथ विदा लेती हूँ। 

Thursday, 15 September 2016

युगन युगन हम योगी !!!!

कबीर को पढ़ना और समझना दोनों ही असीम अनुभूति है।कबीर को थोड़ी और गहराई से समझने का सौभाग्य मुझे मिला।बहुत- बहुत धन्यवाद "दीपक" कबीर रूपी खजाना मुझे भेजने के लिए।किताब पढ़ते समय मुझे "कुमार गंधर्व जी" की याद आई।आह ! कबीर का चिंतन और "पंडित कुमार गंधर्व जी" की गंभीर आवाज ,सच में एक अलग ही आध्यात्म की अनुभूति,जहाँ से आप वापस आना ना चाहो।एक तरफ जहाँ कबीर एक स्वतंत्र चिंतक, दूसरी तरफ पंडित जी बिना किसी घराने के बंधक।सच में अलौकिक मिलाप।कबीर के बारे में आप सब जानते ही होंगे।पंडित कुमार गंधर्व के बारे में भी बहुत लोग जानते होंगे।आज कुमार जी के बारे में कुछ लिख रही हूँ।मैंने पंडित जी का सिर्फ नाम सुना था 6 /7 साल पहले।तब मेरा भाई सरोद सीख (वाद्य यंत्र )सीख रहा था।कभी पंडित जी को सुना नही।भाई ने एक- आध बार इनके बारे में बताया और सुनने को कहा।पर उस वक़्त मैं किसी और दुनिया में मशगूल थी।मेरे कहने का मतलब इस तरह की संगीत की ना तो समझ थी ना ही सुनने की ईक्षा।भाई को भी कभी चिढ़ाती तो कभी लड़ती क्या ये दिन भर आ -आ बजाते रहते हो ?धीरे -धीरे चिढ़ते -चिड़ाते मुझे भी मालूम नही कब "हिंदुस्तानी क्लासिकल "अच्छा लगने लगा।हालाँकि अभी भी इसमें मेरा ज्ञान काफी कम है ,पर मैं इसे अब घंटों सुन सकती हूँ।वो क्या है ना ,दावा कड़वी होती है पर असर तो जरूर करती है।यही हाल है हिंदुस्तानी क्लासिकल का।दिमाग और मन का टॉनिक है ये।हाँ तो बात कुमार जी की,-कुमार जी का असली नाम " शिवपुत्रा सिद्दरामैया कोमकलीमठ" था।इनका जन्म 8 अप्रैल 1924 को कर्नाटक के बेलगाम डिस्ट्रिक में हुआ।गाँव का नाम सुलेभावी। 5 साल की उम्र से ही इन्होंने संगीत की शिक्षा शुरू की। 10साल  की उम्र में इन्होंने पहला स्टेज परफॉर्मेन्स दिया।कहते है इनकी गायकी से प्रभावित होकर इनको "गंधर्व "की उपाधी दी गई।तभी से इनको "पंडित कुमार गंधर्व "कहा जाने लगा।सन 1947 में इनको टीवी (क्षय ) का रोग हो गया।डॉक्टर ने इनको गाने की मनाही कर दी।लगभग 6 साल की बीमारी में ,बिस्तर पर पड़े- पड़े ,इन्होंने हर तरह के संगीत को महसूस किया।चाहे वो चिड़ियाँ की चहक की हो ,हवा के झोंके हो या गली में यूँही गाते फकीरो के गीत या फिर लोक गीतों की धुन।सबको सुनते और गुनगुनाते रहते।डॉक्टर की दावा और पहली पत्नी "भानुमति" की सेवा से कुमार जी ठीक तो हो गए ,पर उनका एक फेफड़ा खराब हो गया था।अपनी इस कमजोरी को उन्होंने बेहतरीन गायन शैली के ईज़ाद से एक ताकत का रूप दिया।इसी क्रम में वो "निर्गुण भजन" की तरफ झुके।कबीर को उन्होंने अपनी बुलंद और अनोखी शैली से एक आद्यात्मिक संगीत का रूप दिया।मुझे तो अब इनकी गाई सारे निर्गुण ,लोकगीत अच्छे लगते है।चाहे वो" सुनता है गुरु ज्ञानी ,गगन में आवाज़ हो रही है हो" ,या" फिर उड़ जायेगा हंस अकेला" हो।इनसब में प्रिय मुझे " झीनी -झीनी- झीनी  बीनी चादरिया ,काहे का ताना काहे की बरनी "और "युगन -युगन हम योगी" है।युगन -युगन की कुछ लाइनें -
युगन  युगन हम योगी
अवधूता युगन युगन हम योगी
आवे ना जाये ,मिटे ना कबहूं
सब्द अनाहत योगी ,अवधूता युगन युगन हम योगी।
सब ही ठौर जमात हमारी ,सब ही ठौर पर मेला
हम सब मांय ,सब है हम माय
हम है बहुरी अकेला ,अवधूता युगन युगन हम योगी।
मतलब - हे !अवधूत (अदृश्य परमात्मा ,ओमकार ,योगी ) हम तो युगों -युगों से योगी है। ना मै आया हूँ ना मै मिटा (नष्ट )हुआ हूँ ,मै कभी ना खत्म होने वाले ध्वनि या संगीत का आनंद ले रहा हूँ ,मै तो सदा से योगी हूँ। हर तरफ मेरे ही समुदाय के मेरे ही लोग है ,मै सबसे मिलता हूँ ,मै सबमे हूँ और सब मुझमे ,फिर भी मै अकेला हूँ।हे ! अजान्य शक्ति मै तो युगों -युगों से योगी हूँ।
   

युगन युगन हम योगी !!!!

कबीर को पढ़ना और समझना दोनों ही असीम अनुभूति है।कबीर को थोड़ी और गहराई से समझने का सौभाग्य मुझे मिला।बहुत- बहुत धन्यवाद "दीपक" कबीर रूपी खजाना मुझे भेजने के लिए।किताब पढ़ते समय मुझे "कुमार गंधर्व जी" की याद आई।आह ! कबीर का चिंतन और "पंडित कुमार गंधर्व जी" की गंभीर आवाज ,सच में एक अलग ही आध्यात्म की अनुभूति,जहाँ से आप वापस आना ना चाहो।एक तरफ जहाँ कबीर एक स्वतंत्र चिंतक, दूसरी तरफ पंडित जी बिना किसी घराने के बंधक।सच में अलौकिक मिलाप।कबीर के बारे में आप सब जानते ही होंगे।पंडित कुमार गंधर्व के बारे में भी बहुत लोग जानते होंगे।आज कुमार जी के बारे में कुछ लिख रही हूँ।मैंने पंडित जी का सिर्फ नाम सुना था 6 /7 साल पहले।तब मेरा भाई सरोद सीख (वाद्य यंत्र )सीख रहा था।कभी पंडित जी को सुना नही।भाई ने एक- आध बार इनके बारे में बताया और सुनने को कहा।पर उस वक़्त मैं किसी और दुनिया में मशगूल थी।मेरे कहने का मतलब इस तरह की संगीत की ना तो समझ थी ना ही सुनने की ईक्षा।भाई को भी कभी चिढ़ाती तो कभी लड़ती क्या ये दिन भर आ -आ बजाते रहते हो ?धीरे -धीरे चिढ़ते -चिड़ाते मुझे भी मालूम नही कब "हिंदुस्तानी क्लासिकल "अच्छा लगने लगा।हालाँकि अभी भी इसमें मेरा ज्ञान काफी कम है ,पर मैं इसे अब घंटों सुन सकती हूँ।वो क्या है ना ,दावा कड़वी होती है पर असर तो जरूर करती है।यही हाल है हिंदुस्तानी क्लासिकल का।दिमाग और मन का टॉनिक है ये।हाँ तो बात कुमार जी की,-कुमार जी का असली नाम " शिवपुत्रा सिद्दरामैया कोमकलीमठ" था।इनका जन्म 8 अप्रैल 1924 को कर्नाटक के बेलगाम डिस्ट्रिक में हुआ।गाँव का नाम सुलेभावी। 5 साल की उम्र से ही इन्होंने संगीत की शिक्षा शुरू की। 10साल  की उम्र में इन्होंने पहला स्टेज परफॉर्मेन्स दिया।कहते है इनकी गायकी से प्रभावित होकर इनको "गंधर्व "की उपाधी दी गई।तभी से इनको "पंडित कुमार गंधर्व "कहा जाने लगा।सन 1947 में इनको टीवी (क्षय ) का रोग हो गया।डॉक्टर ने इनको गाने की मनाही कर दी।लगभग 6 साल की बीमारी में ,बिस्तर पर पड़े- पड़े ,इन्होंने हर तरह के संगीत को महसूस किया।चाहे वो चिड़ियाँ की चहक की हो ,हवा के झोंके हो या गली में यूँही गाते फकीरो के गीत या फिर लोक गीतों की धुन।सबको सुनते और गुनगुनाते रहते।डॉक्टर की दावा और पहली पत्नी "भानुमति" की सेवा से कुमार जी ठीक तो हो गए ,पर उनका एक फेफड़ा खराब हो गया था।अपनी इस कमजोरी को उन्होंने बेहतरीन गायन शैली के ईज़ाद से एक ताकत का रूप दिया।इसी क्रम में वो "निर्गुण भजन" की तरफ झुके।कबीर को उन्होंने अपनी बुलंद और अनोखी शैली से एक आद्यात्मिक संगीत का रूप दिया।मुझे तो अब इनकी गाई सारे निर्गुण ,लोकगीत अच्छे लगते है।चाहे वो" सुनता है गुरु ज्ञानी ,गगन में आवाज़ हो रही है हो" ,या" फिर उड़ जायेगा हंस अकेला" हो।इनसब में प्रिय मुझे " झीनी -झीनी- झीनी  बीनी चादरिया ,काहे का ताना काहे की बरनी "और "युगन -युगन हम योगी" है।युगन -युगन की कुछ लाइनें -
युगन  युगन हम योगी
अवधूता युगन युगन हम योगी
आवे ना जाये ,मिटे ना कबहूं
सब्द अनाहत योगी ,अवधूता युगन युगन हम योगी।
सब ही ठौर जमात हमारी ,सब ही ठौर पर मेला
हम सब मांय ,सब है हम माय
हम है बहुरी अकेला ,अवधूता युगन युगन हम योगी।
मतलब - हे !अवधूत (अदृश्य परमात्मा ,ओमकार ,योगी ) हम तो युगों -युगों से योगी है। ना मै आया हूँ ना मै मिटा (नष्ट )हुआ हूँ ,मै कभी ना खत्म होने वाले ध्वनि या संगीत का आनंद ले रहा हूँ ,मै तो सदा से योगी हूँ। हर तरफ मेरे ही समुदाय के मेरे ही लोग है ,मै सबसे मिलता हूँ ,मै सबमे हूँ और सब मुझमे ,फिर भी मै अकेला हूँ।हे ! अजान्य शक्ति मै तो युगों -युगों से योगी हूँ।